अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 64/ मन्त्र 2
इ॒ध्मेन॑ त्वा जातवेदः स॒मिधा॑ वर्धयामसि। तथा॒ त्वम॒स्मान्व॑र्धय प्र॒जया॑ च॒ धने॑न च ॥
स्वर सहित पद पाठइ॒ध्मेन॑। त्वा॒। जा॒त॒ऽवे॒दः॒। स॒म्ऽइधा॑। व॒र्ध॒या॒म॒सि॒। तथा॑। त्वम्। अ॒स्मान्। व॒र्ध॒य॒। प्र॒ऽजया॑। च॒। धने॑न। च॒ ॥६४.२॥
स्वर रहित मन्त्र
इध्मेन त्वा जातवेदः समिधा वर्धयामसि। तथा त्वमस्मान्वर्धय प्रजया च धनेन च ॥
स्वर रहित पद पाठइध्मेन। त्वा। जातऽवेदः। सम्ऽइधा। वर्धयामसि। तथा। त्वम्। अस्मान्। वर्धय। प्रऽजया। च। धनेन। च ॥६४.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
भौतिक अग्नि के उपयोग का उपदेश।
पदार्थ
(जातवेदः) हे पदार्थों में विद्यमान ! [अग्नि] (इध्मेन) इन्धन [जलाने के पदार्थ] से और (समिधा) समिधा [काष्ठ आदि] से (त्वा) तुझे [जैसे] (वर्धयामसि) हम बढ़ाते हैं। (तथा) वैसे ही (त्वम्) तू (अस्मान्) हमें (प्रजया) प्रजा [सन्तान आदि] से (च च) और (धनेन) धन से (वर्धय) बढ़ा ॥२॥
भावार्थ
जैसे-जैसे मनुष्य हवन और शिल्प कार्यों में भौतिक अग्नि का उपयोग करते हैं, वैसे-वैसे ही उनके सन्तान आदि और धन की वृद्धि होती है ॥२॥
टिप्पणी
२−(इध्मेन) इन्धनसाधनेन (त्वा) त्वाम् (जातवेदः) हे पदार्थेषु विद्यमान (समिधा) काष्ठादिना (वर्धयामसि) वर्धयामः। प्रवृद्धं कुर्मः (तथा) तेन प्रकारेण (त्वम्) (अस्मान्) अग्निप्रदीपकान् (वर्धय) समर्धय (प्रजया) सन्तानादिना (च) (धनेन) सुवर्णादिना (च) ॥
भाषार्थ
(जातवेदः) हे उत्पन्न पदार्थों में विद्यमान अग्नि! (इध्मेन) इन्धन द्वारा, और (समिधा) समिधाओं द्वारा (त्वा) तुझे (वर्धयामसि) हम बढ़ाते हैं। (तथा) उसी प्रकार (त्वम्) तू (अस्मान्) हमें (वर्धय) बढ़ा, (प्रजया च) प्रजा द्वारा (च धनेन) और धन द्वारा।
टिप्पणी
[आचार्यकुल के ब्रह्मचारियों में सत्कार्यों के सम्बन्ध में श्रद्धा और मेधावृद्धि द्वारा पढ़ने में समुन्नति देखकर आचार्यकुल में ब्रह्मचारी (प्रजा) अधिकाधिक प्रविष्ट होकर संख्या बढ़ाते, और राज्य तथा प्रजाजनों द्वारा उन्हें धन की सहायता मिलती रहती है।]
विषय
यज्ञ से 'प्रजा व धन' की प्राप्ति
पदार्थ
१. हे (जातवेदः) = सब धनों के जन्मदाता यज्ञाग्ने! हम (त्वा) = तुझे (इप्मेन) = ईंधन के साधनभूत (समिधा) = काष्ठ से (वर्धयामसि) = बढ़ाते हैं। २. जैसे हम तुझे समिधा से बढ़ाते हैं तथा उसी प्रकार (त्वम्) = तू (अस्मान्) = हमें प्रजया उत्तम सन्तानों से (च) = तथा (धनेन च) = धन से भी (वर्धय) = बढ़ा।
भावार्थ
अग्निहोत्र से उत्तम सन्तान व धन की प्राप्ति होती है।
विषय
आचार्य और परमेश्वर से ज्ञान और दीर्घायु की प्राप्ति।
भावार्थ
हे (जातवेदः) ज्ञानवन् गुरो ! (इध्मेन समिधा) जिस प्रकार अच्छी प्रकार प्रदीप्त होने वाले काष्ठ से अग्नि की दीप्ति को बढ़ा दिया जाता है उसी प्रकार हम (इध्मेन) प्रदीप्त होने वाले (सम्-इधा) संगति लाभ करके ज्ञान द्वारा प्रदीप्त आत्मा से (त्वा वर्धयामसि) तुझे बढ़ाते हैं, तेरे ही गौरव की वृद्धि करते हैं। (तथा) उसी प्रकार (त्वम्) तू (अस्मान्) हमको (प्रजया) उत्तम सन्तान और (धनेन) धन से (वर्धय) बढ़ा।
टिप्पणी
(च०) ‘दीर्घवायु’, ‘कृणोतु में’ इति सायणाभिमतः क्वचित्।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। अग्निर्देवता। अनुष्टुभः। चतुर्ऋचं सूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
Fullness and Growth
Meaning
O Jataveda, omnipresent fire, we raise you and your presence in us, kindling and feeding you with faith and fuel. So, pray you too promote and advance us with wealth and progeny.
Translation
O cognizant of all. I augment you with the quick-burning firewood. So, may you make us prosper with progeny and wealth.
Translation
We strengthen this Jatavedas with the inflaming fuel and let this fire in the same way strengthen us with off spring and wealth.
Translation
Oh! Lord of learning, or the preceptor, just as the fire is enkindled by the fuel, so do I increase your grandeur by my enlightened soul. Similarly may Thou make us prosperous with progeny and wealth.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(इध्मेन) इन्धनसाधनेन (त्वा) त्वाम् (जातवेदः) हे पदार्थेषु विद्यमान (समिधा) काष्ठादिना (वर्धयामसि) वर्धयामः। प्रवृद्धं कुर्मः (तथा) तेन प्रकारेण (त्वम्) (अस्मान्) अग्निप्रदीपकान् (वर्धय) समर्धय (प्रजया) सन्तानादिना (च) (धनेन) सुवर्णादिना (च) ॥
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