अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 64/ मन्त्र 4
ए॒तास्ते॑ अग्ने स॒मिध॒स्त्वमि॒द्धः स॒मिद्भ॑व। आयु॑र॒स्मासु॑ धेह्यमृत॒त्वमा॑चा॒र्याय ॥
स्वर सहित पद पाठए॒ताः। ते॒। अ॒ग्ने॒। स॒म्ऽइधः॑। त्वम्। इ॒द्धः। स॒म्ऽइत्। भ॒व॒। आयुः॑। अ॒स्मासु॑। धे॒हि॒। अ॒मृ॒त॒ऽत्वम्। आ॒ऽचा॒र्या᳡य ॥६४.४॥
स्वर रहित मन्त्र
एतास्ते अग्ने समिधस्त्वमिद्धः समिद्भव। आयुरस्मासु धेह्यमृतत्वमाचार्याय ॥
स्वर रहित पद पाठएताः। ते। अग्ने। सम्ऽइधः। त्वम्। इद्धः। सम्ऽइत्। भव। आयुः। अस्मासु। धेहि। अमृतऽत्वम्। आऽचार्याय ॥६४.४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
भौतिक अग्नि के उपयोग का उपदेश।
पदार्थ
(अग्ने) हे अग्नि ! (एताः) यह (ते) तेरे लिये (समिधः) समिधाएँ [काष्ठ आदि सामग्री] हैं, (त्वम्) तू (इद्धः) प्रज्वलित होकर (समित्) मिलनेवाला (भव) हो। (आयुः) जीवन और (अमृतत्वम्) अमरपन को (अस्मासु) हममें (आचार्याय) आचार्य [की सेवा] के लिये (धेहि) धारण कर ॥४॥
भावार्थ
जो मनुष्य अग्नि में काष्ठ आदि का उत्तम उपयोग करते हैं, वे पूर्ण आयु भोग कर और आचार्य आदि की सेवा करके सुखी होते हैं ॥४॥
टिप्पणी
४−(एताः) दृश्यमानाः (ते) तुभ्यम् (अग्ने) (समिधः) काष्ठादिपदार्थाः (त्वम्) (इद्धः) प्रज्वलितः सन् (समित्) इण् गतौ-क्विप् तुक् च। संगन्ता (भव) (आयुः) जीवनम् (अस्मासु) (धेहि) धारय (अमृतत्वम्) अमरणम् (आचार्याय) आचार्यं सेवितुम् ॥
भाषार्थ
(अग्ने) हे अग्नि! (एताः) ये (ते) तेरे लिये (समिधः) समिधाएँ हैं, इनके द्वारा (त्वम्) तू (इद्धः) संदीप्त होकर (समिद् भव) हमें संदीप्त कर, कान्तिमान् कर। (अस्मासु) हम ब्रह्मचारियों में (आयुः) दीर्घ और स्वस्थ आयु (धेहि) स्थापित कर। और (आचार्याय) आचार्य के लिये (अमृतत्वम्) दीर्घजीवन प्राप्त कर।
टिप्पणी
[यज्ञों और अग्निहोत्र के द्वारा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से व्यक्ति कान्ति-सम्पन्न होता, और दीर्घ तथा स्वस्थ आयु प्राप्त करता है। ब्रह्मचारी निज आचार्य के लिये भी दीर्घ और स्वस्थ आयु चाहते हैं।]
विषय
'आयुः अमृतत्वम्' आचार्याय
पदार्थ
१. हे (अग्ने) = यज्ञाग्ने ! (एता:) = ये (ते) = तेरे लिए (समिधः) = समिधाएँ हैं। (त्वम्) = तू (इद्धः) = प्रज्वलित किया हुआ समित (भव) = सम्यक दीप्सिवाला हो [बृहत् शोच]।२.हे समिद्ध अग्ने! (अस्मास) = हममें (आयुः धेहि) = दीर्घजीवन को धारण कर तथा (अ-मृत त्वम्) = नीरोगता को धारण कर। यह दीर्घजीवन व नीरोगता (आचार्याय) = समन्तात् ज्ञान के चरण व सदाचार के ग्रहण के लिए हो। हम इस जीवन को जान-प्रधान बना पाएँ।
भावार्थ
हम अग्निकुण्ड में यज्ञाग्नि को समिद्ध करें। यह यज्ञाग्नि हमें नीरोगता व दीर्घजीवन दे। यह नीरोग दीर्घजीवन 'ज्ञान व सदाचार' के ग्रहण के लिए हो।
विषय
आचार्य और परमेश्वर से ज्ञान और दीर्घायु की प्राप्ति।
भावार्थ
हे (अग्ने) अग्ने ! परमेश्वर ! (ते) तेरे (एताः) ये सब (सम्-इधः) महान् तेज, दीप्तियां हैं। (त्वम्) तू ही (इद्धः) प्रदीप्त, देदीप्यमान होकर (समिद् भव) समिद्, खूब प्रज्वलित, हृदय में प्रकाशित हो। (अस्मासु आयुः धेहि) हममें दीर्घ आयु प्रदान कर और (आचार्याय अमृत्वम्) आचार्य को अमृतता प्रदान कर। अर्थात् आचार्य चिरकाल तक हमें विद्या प्रदान करे। हम दीर्घायु होकर उसके ज्ञान को निरन्तर जीवित रक्खें।
टिप्पणी
(द्वि०) ‘त्वामिद्धं सोसमिद्भवः’, ‘त्वामिद्धसो-‘, ‘त्वाविद्धंसो’ ‘त्वामिद्वांसो’, ‘त्वामिद्वंसो-‘ ‘ताभिर्वसो समिद्भव’ इति नाना पाठाः। त्वाम्। इत्। हंसः। समित्। भव इति पदपाठः क्वचित्। ‘त्वमिन्द्रः’ इति क्वचित्। (च०) ‘धेह्यमृतमाचा–’, ‘घेह्यमृतं त्वमा-’, इति पाठाः। ‘तामिर्धक्षः’ इति ह्विटनिकामितः। तामिर्वसो समिद्भव इति ह्विटन्यनुमितः। ‘अमृतत्वंचार्ये’ इति ह्विटनिकामितः।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। अग्निर्देवता। अनुष्टुभः। चतुर्ऋचं सूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
Fullness and Growth
Meaning
O leading light, Agni, these are the fuel offerings we present to you. Thereby be lighted and enlighten us. Bear and bring life, health and full age for us, bless us with that, and bring us the light of immortality, for us and for the teacher.
Translation
O fire-divine, thes are your fuel-sticks, Kindled up may you become lustrous. May you set long life in us and grant immortality to our precepton.
Translation
Those are, the fuels for this fire and let it being ablaze be thoroughly inflaming. Let it be means to give us life and to vouch a safe immortality to our Acharya, the preceptor.
Translation
Oh! Effulgent God, these are Thy powers of brilliance. Being well-lit, shine in the heart and grant us long life and immortality to our preceptor.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४−(एताः) दृश्यमानाः (ते) तुभ्यम् (अग्ने) (समिधः) काष्ठादिपदार्थाः (त्वम्) (इद्धः) प्रज्वलितः सन् (समित्) इण् गतौ-क्विप् तुक् च। संगन्ता (भव) (आयुः) जीवनम् (अस्मासु) (धेहि) धारय (अमृतत्वम्) अमरणम् (आचार्याय) आचार्यं सेवितुम् ॥
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