Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 2 के सूक्त 16 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 16/ मन्त्र 1
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - प्राणः, अपानः, आयुः छन्दः - एदपदासुरीत्रिष्टुप् सूक्तम् - सुरक्षा सूक्त
    89

    प्राणा॑पानौ मृ॒त्योर्मा॑ पातं॒ स्वाहा॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्राणा॑पानौ । मृ॒त्यो: । मा॒ । पा॒त॒म् । स्वाहा॑॥१६.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्राणापानौ मृत्योर्मा पातं स्वाहा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्राणापानौ । मृत्यो: । मा । पातम् । स्वाहा॥१६.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 16; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    आत्मरक्षा के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (प्राणापानौ) हे प्राण और अपान ! तुम दोनों (मृत्योः) मृत्यु से (मा) मुझे (पातम्) बचाओ, (स्वाहा) यह सुन्दर वाणी [आशीर्वाद] हो ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, प्राणायाम, पथ्य भोजन आदि से प्राण अर्थात् भीतर जानेवाली श्वास और अपान, अर्थात् बाहिर आनेवाली श्वास की स्वस्थता स्थापित करें और बलवान् रहकर चिरंजीव होवें ॥१॥

    टिप्पणी

    १–प्राणापानौ। अन जीवने–अच् वा घञ्। प्राणश्च अपानश्च तौ। हे उच्छ्वासनिश्वासौ। हे अन्तर्मुखश्वासबहिर्मुखश्वासौ। मृत्योः। अ० १।३०।३। मृङ्–त्युक्। प्राणत्यागात्। मरणात्। मा। माम्। पातम्। युवां रक्षतम्। स्वाहा। सु+आङ्+ह्वेञ् आह्वाने–डा। वाङ्नाम–निघ० १।११। स्वाहेत्येतत् सु आहेति वा स्वा वागाहेति वा स्वं प्राहेति वा स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा–निरु० ८।२०। सुवाणी। आशीर्वादः। सुदानम् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    दीर्घजीवन

    पदार्थ

    १. (प्राणापानौ) = हे प्राण और अपान! [प्राक् ऊर्ध्वमुखः अनिति चेष्टत इति प्राणः, अप आवमुखः अनिति इति अपान:] आप दोनों (मा) = मुझे (मृत्यो:) = मृत्यु से (पातम्) = बचाओ। 'अपान' दोषों को दूर करता है और प्राण शक्ति का सञ्चार करता है। इसप्रकार प्राणापान की क्रिया से हम मृत्यु का शिकार नहीं होते। २. (स्वाहा) = 'स्वा वाग् आह' [तै० २.१.२.३]। मेरी वाणी सदा यही प्रार्थना करनेवाली हो। मैं सदा अपने को इसीप्रकार आत्मप्रेरणा दूँ कि प्राणापान कि शक्ति के वर्धन से मैं मृत्यु को अपने से दूर रक्षंगा।

    भावार्थ

    प्राणापान की शक्ति के वर्धन से हम दीर्घजीवी बनें। ये प्राण और अपान हमें मृत्यु व रोगों से बचाते हैं।

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (प्राणापानौ) हे प्राण और अपान ! (मा) मेरी (पातम्) रक्षा करो (मृत्योः) मृत्यु से, (स्वाहा) सु + आह, यह ठीक कहा है।

    टिप्पणी

    [प्राण-अपान= श्वास-प्रश्वास; या श्वासवायु और अपान वायु, गुदावायु। इन दोनों के स्वस्थ रहते मृत्यु नहीं होती। स्वाहा= "स्वाहेत्येतत् सु आहेति वा" (निरुक्त ८।३।२१)।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Prayer for Divine Protection

    Meaning

    May the vital energies of prana and apana protect and promote me with life and resistance against death. This is the voice of the soul.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Subject

    Prāņa-apāna, Dyāvā-prthvī, Sūrya-Agni-Visvambhara

    Translation

    O in-breath and out-breath, may both of you protect me from death. Svāhā. (hail)

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Let the inhaling and exhaling vital breath guard me from death. What a beautiful utterance.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Guard me from death, Inhaling and Exhaling! This is well said.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १–प्राणापानौ। अन जीवने–अच् वा घञ्। प्राणश्च अपानश्च तौ। हे उच्छ्वासनिश्वासौ। हे अन्तर्मुखश्वासबहिर्मुखश्वासौ। मृत्योः। अ० १।३०।३। मृङ्–त्युक्। प्राणत्यागात्। मरणात्। मा। माम्। पातम्। युवां रक्षतम्। स्वाहा। सु+आङ्+ह्वेञ् आह्वाने–डा। वाङ्नाम–निघ० १।११। स्वाहेत्येतत् सु आहेति वा स्वा वागाहेति वा स्वं प्राहेति वा स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा–निरु० ८।२०। सुवाणी। आशीर्वादः। सुदानम् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top