अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 4
ऋषिः - भृगुराथर्वणः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - पुरोविराड्जगती
सूक्तम् - इन्द्रशौर्य सूक्त
74
आ त्वा॑ विशन्तु सु॒तास॑ इन्द्र पृ॒णस्व॑ कु॒क्षी वि॒ड्ढि श॑क्र धि॒येह्या नः॑। श्रु॒धी हवं॒ गिरो॑ मे जुष॒स्वेन्द्र॑ स्व॒युग्भि॒र्मत्स्वे॒ह म॒हे रणा॑य ॥
स्वर सहित पद पाठआ । त्वा॒ । वि॒श॒न्तु॒ । सु॒तास॑: । इ॒न्द्र॒: । पृ॒णस्व॑ । कु॒क्षी इति॑ । वि॒ड्ढि । श॒क्र॒ । धि॒या । इ॒हि॒ । आ । न॒: । श्रु॒धि । हव॑म् । गिर॑: । मे॒ । जु॒ष॒स्व॒ । आ । इ॒न्द्र॒ । स्व॒युक्ऽभि॑: । मत्स्व॑ । इ॒ह । म॒हे । रणा॑य ॥५.४॥
स्वर रहित मन्त्र
आ त्वा विशन्तु सुतास इन्द्र पृणस्व कुक्षी विड्ढि शक्र धियेह्या नः। श्रुधी हवं गिरो मे जुषस्वेन्द्र स्वयुग्भिर्मत्स्वेह महे रणाय ॥
स्वर रहित पद पाठआ । त्वा । विशन्तु । सुतास: । इन्द्र: । पृणस्व । कुक्षी इति । विड्ढि । शक्र । धिया । इहि । आ । न: । श्रुधि । हवम् । गिर: । मे । जुषस्व । आ । इन्द्र । स्वयुक्ऽभि: । मत्स्व । इह । महे । रणाय ॥५.४॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
मनुष्य सदैव उन्नति का उपाय करता रहे।
पदार्थ
(इन्द्र) हे राजन् ! (सुतासः) यह निचोड़े हुए रस (त्वा) तुझमें (आ) यथाविधि (विशन्तु) प्रवेश करें, (कुक्षी) दोनों कुक्षियों को (पृणस्व) तू भर और (विड्ढि=विध) शासन कर, (शक्र) हे शक्तिमान् (धिया) [अपनी अनुग्रह] बुद्धि से (नः) हमारे पास (आ+इहि=एहि) आ। (हवम्) पुकार (श्रुधि) सुन, (इन्द्र) हे राजन् ! (मे) मेरी (गिरः) वाणियों को (जुषस्व) स्वीकार कर और (स्वयुग्भिः) अपनी युक्तियों से (इह) यहाँ पर (महे) बड़े (रणाय) रण [जीतने] के लिये (आ) यथानियम (मत्स्व) हर्षित हो ॥४॥
भावार्थ
राजा अनेक श्रेष्ठ विद्याओं के रस से अपने आत्मा को सन्तुष्ट करे और न्यायपूर्वक प्रजा की रक्षा करता हुआ शत्रुओं को जीतकर आनन्द भोगे ॥४॥ सायणभाष्य में (विड्ढि) के स्थान में [वृड्ढि=वर्धय] है ॥
टिप्पणी
४–आ+विशन्तु। प्रविशन्तु। सुतासः। षुञ् अभिषवे–क्त। आज्जसेरसुक्। पा० ७।१।५०। अभिषुताः सोमाः। पृणस्व। म० २। तर्पय। कुक्षी। प्लुषिकुषिशुषिभ्यः क्सिः। उ० ३।१५५। इति कुष निष्कर्षे–क्सि। दक्षिणोत्तरकुक्षिद्वयम्। आत्मानमित्यर्थः। विड्ढि। विध विधाने=शासने तुदादिः। लोटि छान्दसः श विकरणस्य लुक्। हेर्ध्यादेशे ढत्वष्टुत्वजश्त्वानि। त्वं विध विधानं शासनं कुरु। शक्र। स्फायितञ्चिवञ्चिशकि०। उ० २।१३। इति शक्लृ शक्तौ–रक्। शक्नोतीति। हे शक्तिमन्। हे समर्थ। धिया। ध्यै चिन्तने–क्विप्। सम्प्रसारणं च। धीः, कर्मनाम निघ० २।१। प्रज्ञानाम–निघ० ३।९। प्रज्ञया। बुद्ध्या। श्रुधि। श्रु श्रवणे। विकरणस्य लुक्। श्रुशृणुपृकृवृभ्यश्छन्दसि पा० ६।४।१०२। इति हेर्धिरादेशः। अन्येषामपि दृश्यते। पा० ६।३।१३७। इति सांहितिको दीर्घः। शृणु। हवम्। अ० १।१५।२। ह्वेञ् आह्वाने–अप्। आह्वानम्। अवाहनम्। गिरः। गॄ शब्दे–क्विप्। गृणाति=अर्चति। निघ० ३।१४। वाचः। वाक्यानि। जुषस्व। सेवस्व। स्वीकुरु। स्वयुग्भिः। स्व+युजिर् समाधौ, यद्वा०। युज संयमने–क्विप्। युज्यते समाधत्ते, यद्वा, योजयति नियमयतीति युक्। स्वयुक्तिभिः। आत्मीयैः समाधिमद्भिः संयोगवद्भिर्वा मित्रैः। मत्स्व। मदी हर्षे। छान्दसम् आत्मनेपदम्। हृष्टो भव। महे। मह पूजायां–क्विप्। महते। रणाय। रमणाय। आनन्दाय। यद्वा। युद्धजयाय ॥
विषय
आत्मशासन व संग्राम-विजय
पदार्थ
१. हे (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (सुतास:) = ये उत्पन्न हुए सोमकण (त्वा आविशन्तु) = तुझमें प्रवेश करें। (कुक्षी पुणस्व) = तू अपनी दोनों कोखों को इनसे प्रीणित करनेवाला हो। (विडि) = [विध शासने] तू अपने पर शासन करनेवाला बन । प्रभु कहते हैं कि (शक्र) = सोमपान के द्वारा शक्तिशाली बने हुए इन्द्र ! तू सोमपान के द्वारा तीन बनी हुई (धिया) = बुद्धि से (न: आयाहि) = हमारे समीप प्राप्त हो। (हवं श्रुधि) = हृदयस्थ मेरी वाणी को सुन। (मे गिरः) = मेरी वेदज्ञानरूपी वाणियों को (जुषस्व) = प्रीतिपूर्वक सेवन कर और (इह) = इसी जीवन में (महे रणाय) = महान् संग्राम के लिए काम-क्रोधादि शत्रुओं को पराजित करने के लिए (स्वयुग्भि:) = आत्मतत्त्व से मेलवाली इन इन्द्रियों से (मत्स्व) = आनन्द का अनुभव कर। इन्द्रियों को बाह्य विषयों से हटाकर अन्तर्मुख करने पर ही इन संग्रामों में विजय सम्भव होती है।
भावार्थ
हम सोम का रक्षण करें। हृदयस्थ प्रभु की वाणी को सुनें। इन्द्रियों को निरुद्ध करने का प्रयत्न करें। कामादि के साथ होनेवाले महान् संग्राम में पराजित न हों।
भाषार्थ
(इन्द्र) हे ऐश्वर्यसम्पन्न रार्य ! (त्वा) तुझमें (सुतासः) अभिषुत जल (आ विशन्तु) आ प्रविष्ट हों। (कुक्षी पृणस्व) दोनों कोखों को ( पृणस्व) पूरित कर ले, भर ले, (विड्ढि) और बढ़। (शत्) हे शक्तिशालिन्! (धिया) निजकर्म के साथ (नः) हमारी ओर (आ इहि) आ । (हवम्, श्रुधि) मेरे आह्वान को सुन। (मे गिर: जुषस्व) मेरी वाणियों का प्रीतिपूर्वक सेवन कर (इन्द्र) हे ऐश्वर्यसम्पन्न ! (स्वयूग्भिः) अपने सहयोगियों के साथ (इह) इस पृथिवी में (मत्स्व) हर्ष को प्राप्त हो, ( महे रणाय ) मेघ के साथ महायुद्ध के लिए।
टिप्पणी
[मन्त्र में कविता के शब्दों में वर्णन हुआ है। "श्रुधि हवम्" और "गिरः जुषस्व", तथा "कुक्षी" और "मत्स्व" द्वारा इन्द्र चेतन है, और अन्य वर्णनों द्वारा दृश्यमान सूर्यरूप में अचेतन भी प्रतीत होता है। निरुक्त में कहा है कि "अचेतनेष्वपि चेतनावद्धि स्तुतयो भवन्ति। तथाभिधानानि" (७।२।६) । जुषस्व=जुषी प्रीतिसेवनयोः (तुदादिः)। कुक्षी =सूर्य की दो कुक्षी हैं उत्तरायण तथा दक्षिणायन; दोनों अयनों में सूर्य अभिषुत जल को कुक्षियों में भरता रहता है । मत्स्व = मदी हर्षे (सायण) । स्वयुग्भिः= इन्द्र के सहयोगी अर्थात् साथी हैं, अन्तरिक्षवायु तथा आदित्यरश्मियाँ। अभिषुत जल है रश्मियों के ताप द्वारा वाष्पीभूत सामुद्रिक जल। यह वायुरूपी सीढ़ी द्वारा अन्तरिक्ष में पहुंचता है।] [विशेष-- दो कुक्षियाँ वस्तुतः जुगाली करनेवाले पशुओं में होती हैं। कुक्षि है उदर, पेट। पशु जब घास को चर्वित करते हैं, चबाते हैं, तो वह अर्ध-चर्वित घास पहिले एक कुक्षि में जाता है, जिसे हम "जग्धाशय" कह सकते हैं। जुगाली करते समय वह अर्ध-चर्वित घास शनैः-शनैः पाकाशय में पहुँचता रहता है। जग्धाशय को कुक्षि इसलिए कहते हैं कि अर्ध-चर्वित घास कुत्सित अवस्था में वहाँ पहुँचता है। कु=कुत्सितरूप में + क्षि = क्षीण हुआ, घास प्रथम जग्धाशय में पहुँचता है, तत्साम्यात् पाकाशय को भी कुक्षि कहते हैं। परन्तु इन्द्र के सम्बन्ध में जो दो कुक्षियाँ हैं, उनका स्पष्टीकरण भी कर दिया है ।]
विषय
राजा को उपदेश ।
भावार्थ
हे ( इन्द्र ) राजन् ! (त्वा) तेरे समीप, तेरे राष्ट्र में ( सुतासः ) समस्त राष्ट्र के उत्पन्न पदार्थ ( आ विशन्तु ) आकर संगृहीत हों। (कुक्षी) जिस प्रकार मनुष्य भोजन से अपनी कोख भर लेता है उसी प्रकार तू अपने दोनों कोश=धान्यकोश और द्रव्यमय कोश (पृणस्व) पूर्ण करले, और ( धिया ) अपनी धारणावती बुद्धि द्वारा हे (शक्र) शक्तिशाली राजन् ! तू (विड्ढि) प्रजा के सब कार्यों को जान । और इस प्रकार ( नः ) हमारे पास ( आ, इहि ) आ हम तक पहुँच । तू ( हवं ) हम प्रजाओं की वाणी, पुकार को ( श्रुधि ) श्रवण कर, ( मे ) मेरी, मुझ प्रजा के प्रतिनिधि की ( गिरः ) वाणियों को ( जुषस्व ) प्रेम से सेवन कर । हे इन्द्र राजन् ! ( स्वयुग्भिः ) अपने सहयोगी सेनापति और मन्त्रियों सहित तू ( महे ) बड़े भारी ( रणाय ) आनन्दजनक राष्ट्रशासन के लिए और युद्धोद्योग के लिए ( मत्स्व ) सदा तैयार रह, सदा प्रसन्न रह ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भृगुराथर्वण ऋषिः । इन्द्रो देवता। आद्यया आह्वानमपराभिश्च स्तुतिः । १ निचृदुपरिष्टाद् बृहती, २ विराडुपरिष्टाद् बृहती, ५–७ त्रिष्टुभः । ३ विराट् पथ्याबृहती । ४ जगती पुरो विराट् । सप्तर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
The Ruler
Meaning
Indra, let the maturest wealth of homage distilled and offered reach you. Fill the treasures of the state full to their capacity. O mighty leader of performance, carry on the governance and come to us here, be with us with your best of thoughts and actions. Listen and respond to our call of invocation. Listen to my words of prayer, accept and approve. Come here with the cooperative best of your friends and carry on the ruling process for the social order and its glory.
Translation
May our expressed devotions approach you from all sides. O resplendent self, may you fill both sides of your belly (with them). Make us prosper, O mighty one. May you listen to my invocation. May my words of praise please you. May you enjoy yourself along with your companions for great pleasing accomplishments (and victories).
Translation
These waters produced by rain return back to Indra. The electricity and this fill up its stomach. This powerful electricity attains all this and through its operations makes them accessible by us. This makes our words audible to others and has the thundering sound in it. By its useful operations it becomes for our great happiness.
Translation
O king, mayest thou obtain all the objects produced in thy state. Just as a person fills full both sides of the belly with food, so fill thy treasure with cash and kind. O mighty king, know all the acts of thy subjects through thy intellect come unto us. Listen to our call. Accept affectionately my supplications O King, with thy general and ministers ever remain ready for a big battle. [1]
Footnote
[1] Us and our refer to the subjects. My refers to a representative of the people.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
४–आ+विशन्तु। प्रविशन्तु। सुतासः। षुञ् अभिषवे–क्त। आज्जसेरसुक्। पा० ७।१।५०। अभिषुताः सोमाः। पृणस्व। म० २। तर्पय। कुक्षी। प्लुषिकुषिशुषिभ्यः क्सिः। उ० ३।१५५। इति कुष निष्कर्षे–क्सि। दक्षिणोत्तरकुक्षिद्वयम्। आत्मानमित्यर्थः। विड्ढि। विध विधाने=शासने तुदादिः। लोटि छान्दसः श विकरणस्य लुक्। हेर्ध्यादेशे ढत्वष्टुत्वजश्त्वानि। त्वं विध विधानं शासनं कुरु। शक्र। स्फायितञ्चिवञ्चिशकि०। उ० २।१३। इति शक्लृ शक्तौ–रक्। शक्नोतीति। हे शक्तिमन्। हे समर्थ। धिया। ध्यै चिन्तने–क्विप्। सम्प्रसारणं च। धीः, कर्मनाम निघ० २।१। प्रज्ञानाम–निघ० ३।९। प्रज्ञया। बुद्ध्या। श्रुधि। श्रु श्रवणे। विकरणस्य लुक्। श्रुशृणुपृकृवृभ्यश्छन्दसि पा० ६।४।१०२। इति हेर्धिरादेशः। अन्येषामपि दृश्यते। पा० ६।३।१३७। इति सांहितिको दीर्घः। शृणु। हवम्। अ० १।१५।२। ह्वेञ् आह्वाने–अप्। आह्वानम्। अवाहनम्। गिरः। गॄ शब्दे–क्विप्। गृणाति=अर्चति। निघ० ३।१४। वाचः। वाक्यानि। जुषस्व। सेवस्व। स्वीकुरु। स्वयुग्भिः। स्व+युजिर् समाधौ, यद्वा०। युज संयमने–क्विप्। युज्यते समाधत्ते, यद्वा, योजयति नियमयतीति युक्। स्वयुक्तिभिः। आत्मीयैः समाधिमद्भिः संयोगवद्भिर्वा मित्रैः। मत्स्व। मदी हर्षे। छान्दसम् आत्मनेपदम्। हृष्टो भव। महे। मह पूजायां–क्विप्। महते। रणाय। रमणाय। आनन्दाय। यद्वा। युद्धजयाय ॥
बंगाली (3)
पदार्थ
(ইন্দ্র) হে রাজন! (সুতাসঃ) এই সার রস (ত্বা) তোমাতে (আ) যথা বিধি (বিশন্তু) প্রবেশ করুক। (কুক্ষী) উভয় কুক্ষিকে (পৃণস্ব) তুমি পূর্ণ কর এবং (বিটি) শাসন কর (শত্রু) হে শক্তিমান (ধিয়া) স্বীয় বুদ্ধি দ্বারা (নঃ) আমাদের নিকট (আ-ইহি) আগমন কর (হবং) আহ্বান (শ্রুধি) শ্রবণ কর। (ইন্দ্র) হে রাজন (মে) আমার (গিরঃ) বাণীকে (জুষস্ব) গ্রহণ কর ও (স্বয়ুভিঃ) স্বীয় যুক্তি দ্বারা (ইহ) এখানে (মহে) বড় (রণায়) যুদ্ধের জন্য (আ) যথা বিধি (মত্ত্ব) আনন্দিত হও।।
भावार्थ
হে রাজন! এই সার রস তোমাতে যথাবিধি প্রবেশ করুক। উভয় কুক্ষিকে তুমি পূর্ণ কর। তুমি শাসন কর। হে শক্তিমান! স্বীয় বুদ্ধি দ্বারা িআমাদের নিকট আগমন কর। আমাদের আহ্বান শ্রবণ কর। হে রাজন! আমাদের বাণীকে গ্রহণ কর। স্বীয় যুক্তি দ্বারা একানে প্রবল সংগ্রামে জয় লাভ করিয়া যথাবিধি আনন্দিত থাক।।
मन्त्र (बांग्ला)
আ ত্বা বিমান্তু সুতাস ইন্দ্ৰ পূণস্ব কুক্ষী বিঢ়ি শত্রু ধিয়েহ্যা নঃ৷ শ্রুধী হবং গিরো মে জুষস্বেন্দ্র স্বয়ুগিথর্মৎস্বেহ মহে রলায়।।
ऋषि | देवता | छन्द
ভৃগুরাথবর্ণঃ। ইন্দ্রঃ। জগতীপুরোবিরাট্ ত্রিষ্টুপ্
भाषार्थ
(ইন্দ্র) হে ঐশ্বর্যসম্পন্ন সূর্য ! (ত্বা) তোমার মধ্যে (সুতাসঃ) অভিষুত জল (আ বিশন্তু) এসে প্রবিষ্ট হোক (কুক্ষী) দুই উদরকে (পৃণস্ব) পরিপূর্ণ করো, ভর্তি করো, (বিডি্ঢ) এবং বর্ধিত/সমৃদ্ধ হও। (শক) হে শক্তিশালী ! (ধিয়া) নিজকর্মের সাথে (নঃ) আমাদের দিকে (আ ইহি) এসো। (হবম্, শ্রুধি) আমার আহবান শ্রবণ করো। (মে গিরঃ জুষস্ব) আমার বাণীসমূহের প্রীতিপূর্বক সেবন করো (ইন্দ্র) হে ঐশ্বর্যসম্পন্ন ! (স্বয়ুগ্ভিঃ) নিজের সহযোগীদের সাথে (ইস) এই পৃথিবীতে (মৎস্ব) হর্ষ প্রাপ্ত হও, (মহে রণায়) মেঘের সাথে মহাযুদ্ধের জন্য।
टिप्पणी
[মন্ত্রে কবিতার শব্দে বর্ণনা হয়েছে। "শ্রুধি হবম্" এবং "গিরঃ জুষস্ব", এবং "কুক্ষী" ও "মৎস্ব" দ্বারা ইন্দ্র চেতন, এবং অন্যান্য বর্ণনার দ্বারা দৃশ্যমান সূর্য রূপে অচেতনও প্রতীত হয়। নিরুক্তে বলা হয়েছে "অচেতনেষ্বপি চেতনাবদ্ধি স্তুতয়ো ভবন্তি। তথাভিধানানি" (৭।২।৬)। জুষস্ব=জুষী প্রীতিসেবনয়োঃ (তুদাদিঃ)। কুক্ষী= সূর্যের দুই উদর হলো উত্তরায়ণ ও দক্ষিণায়ন; দুই অয়নে সূর্য অভিষুত জলকে উদরের মধ্যে ভর্তি করতে থাকে। মৎস্ব=মদী হর্ষে (সায়ণ)। স্বয়ুগ্ভিঃ= ইন্দ্রের সহযোগী অর্থাৎ সাথী, অন্তরিক্ষ বায়ু ও আদিত্যরশ্মি। অভিষুত জল হল রশ্মিসমূহের তাপ দ্বারা বাষ্পীভূত সামুদ্রিক জল। ইহা বায়ুরূপী সিঁড়ি দ্বারা অন্তরিক্ষে পৌঁছায়।] দুটি উদর বস্তুতঃ চর্বনকারী পশুদের মধ্যে থাকে। কুক্ষি হলো উদর, পেট। পশু যখন ঘাস চর্বিত করে, তখন সেই অর্ধ-চবিত ঘাস প্রথমে এক কুক্ষিতে যায়, যাকে আমরা "জগ্ধাশয়" বলতে পারি। চর্বনের সময় সেই অর্ধ-চর্বিত ঘাস ধীরে ধীরে পাকাশয়ে পৌঁছাতে থাকে। জগ্ধাশয় কে কুক্ষি এইজন্য বলা হয় যে অর্ধ-চর্বিত ঘাস কুৎসিত অবস্থায় সেখানে পৌঁছায়। কু= কুৎসিত রূপে + ক্ষি =ক্ষীণ হওয়া, ঘাস প্রথম জগ্ধাশয়ে পৌঁছায়, তৎসাম্যাৎ পাকাশয়কেও কুক্ষি বলে। কিন্তু ইন্দ্রের সম্বন্ধে যে দুই কুক্ষি রয়েছে, তার স্পষ্টীকরণও করে দেওয়া হয়েছে।]
मन्त्र विषय
মনুষ্যঃ সদৈবোন্নতিপ্রয়ত্নং কুর্য্যাৎ
भाषार्थ
(ইন্দ্র) হে রাজন্ ! (সুতাসঃ) এই নিঃসৃত/নিষ্পাদিত রস (ত্বা) তোমার মধ্যে (আ) যথাবিধি (বিশন্তু) প্রবেশ করুক, (কুক্ষী) দুই কুক্ষি (পৃণস্ব) তুমি পূরণ করো এবং (বিড্ঢি=বিধ) শাসন করো, (শক্র) হে শক্তিমান্ (ধিয়া) [নিজের অনুগ্রহ] বুদ্ধি দ্বারা (নঃ) আমাদের কাছে (আ+ইহি=এহি) এসো। (হবম্) আহ্বান (শ্রুধি) শ্রবণ করো, (ইন্দ্র) হে রাজন্ ! (মে) আমার (গিরঃ) বাণী-সমূহ (জুষস্ব) স্বীকার করো এবং (স্বয়ুগ্ভিঃ) নিজের যুক্তির দ্বারা (ইহ) এখানে (মহে) বৃহৎ (রণায়) রণ [জয়ের] জন্য (আ) যথানিয়মে (মৎস্ব) হর্ষিত হও॥৪॥
भावार्थ
রাজা অনেক শ্রেষ্ঠ বিদ্যার রস দ্বারা নিজের আত্মাকে সন্তুষ্ট করুক এবং ন্যায়পূর্বক প্রজাদের রক্ষা করে শত্রুদের জয় করে আনন্দ ভোগ করুক ॥৪॥ সায়ণভাষ্যে (বিড্ঢি) এর স্থানে [বৃড্ঢি=বর্ধয়] আছে ॥
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