अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 122/ मन्त्र 3
आ यद्दुवः॑ शतक्रत॒वा कामं॑ जरितॄ॒णाम्। ऋ॒णोरक्षं॒ न शची॑भिः ॥
स्वर सहित पद पाठआ । यत् । दुव॑: । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । आ । काम॑म् । ज॒रि॒तॄ॒णाम् ॥ ऋ॒णो: । अक्ष॑म् । न । शची॑भि: ॥१२२.३॥
स्वर रहित मन्त्र
आ यद्दुवः शतक्रतवा कामं जरितॄणाम्। ऋणोरक्षं न शचीभिः ॥
स्वर रहित पद पाठआ । यत् । दुव: । शतक्रतो इति शतऽक्रतो । आ । कामम् । जरितॄणाम् ॥ ऋणो: । अक्षम् । न । शचीभि: ॥१२२.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
सभापति के लक्षण का उपदेश।
पदार्थ
(यत्) क्योंकि, (शतक्रतो) हे सैकड़ों बुद्धियों वा कर्मोंवाले ! [सभापति] (जरितॄणाम्) स्तुति करनेवालों की (दुवः) सेवा को (कामम्) अपनी इच्छा के अनुसार (आ) सब ओर से (आ) पूरी रीति पर (ऋणोः) तू पाता है, (न) जैसे (अक्षम्) धुरा (शचीभिः) अपने कर्मों से [रथ को प्राप्त होता है] ॥३॥
भावार्थ
जैसे धुरा पहियों के बीच में रहकर सब बोझ उठाकर रथ को चलाता है, वैसे ही सभापति राज्य का सब भार अपने ऊपर रखकर प्रजा को उद्योगी बनावें और प्रजा भी उसकी सेवा करती रहे ॥२, ३॥
टिप्पणी
३−(आ) समन्तात् (यत्) यतः (दुवः) अ० २०।६८।। परिचरणम् (शतक्रतो) बहुप्रज्ञ। बहुकर्मन् (आ) अभितः। पूरणतः (कामम्) यथेष्टम् (जरितॄणाम्) स्तावकानाम् (ऋणोः) म० २। प्राप्नोषि (अक्षम्) धूः (न) इव (शचीभिः) कर्मभिः ॥
विषय
'प्रज्ञा, वाणी व कर्म'
पदार्थ
१. हे (शतक्रतो) = सैकड़ों प्रज्ञाओं व कौवाले प्रभो! आप (जरितॄणाम्) = स्तोताओं को (यत्) = जो (दुवः) = धन [दुवस् wealth] तथा (कामम्) = चाहनेवाले पदार्थों को (आऋणो:) = सर्वथा प्राप्त कराते हैं, यह सब (शचीभिः) = [कर्म नि० २.१, बाणी १.११: प्रज्ञा ३.९] कर्म, वाणी व प्रज्ञा के हेतु से (अक्षं न) = दो पहियों के बीच में वर्तमान अक्ष के समान हैं। जैसे दो पहियों के बीच में अक्ष होता है, उसी प्रकार यहाँ प्रज्ञा व कर्म के बीच में वाणी है। दोनों पहिये तथा अक्ष साथ-साथ धूमते हैं, उसी प्रकार प्रज्ञा, वाणी व कर्म साथ-साथ चलते हैं। प्रत्येक कर्म पहले विचार के रूप में होता है [प्रज्ञा], फिर उच्चारण के रूप आता है [वा] और अन्तत: आचरण [कर्म] का रूप धारण करता है। २. प्रभु हमें जो भी धन प्राप्त कराते हैं या हमें जो काम्य पदार्थ देते हैं, वे सब इसलिए कि हम 'प्रज्ञा, वाणी व कर्म' को सुन्दर बना सकें। इन सब धनों व काम्य पदार्थों का अतियोग व अयोग न करते हुए हम यथायोग करेंगे तो हम 'प्रज्ञा, वाणी व कर्म' इन सबको सुन्दर बना ही सकेंगे।
भावार्थ
हम प्रभु के स्तोता बनें। प्रभु हमें धनों व इष्ट पदार्थों को प्राप्त कराएँगे। उनके यथायोग से हम 'प्रज्ञा, वाणी व कर्म' को पवित्र बना पाएंगे। 'प्रज्ञा, वाणी व कर्म' को पवित्र बनानेवाला यह व्यक्ति 'कुत्स' कहलाता है-सब वासनाओं का संहार करनेवाला। यही अगले सूक्त का ऋषि है -
भाषार्थ
(शतक्रतो) हे सैकड़ों अद्भुत कर्मोंवाले प्रभो! आप ही (जरितर्णिांम्) स्तोताओं की (दुवः) सेवाओं को, और (यद् कामम्) जो उनका काम्य मोक्ष है—इन दोनों को (आ ऋणोः) परस्पर सम्बद्ध करते हैं, (न) जैसे कि बढ़ई (शचीभिः) अपनी कारीगरी के कर्मों द्वारा (अक्षम्) रथ के दो चक्रों में धुरी डालकर उन्हें (आ ऋणोः) परस्पर सम्बन्ध कर देता है।
टिप्पणी
[दुवः=दुवस्यति परिचरणकर्मा (निघं০ ३.५)। शचीभिः=कर्मनाम (निघं০ २.१)।]
विषय
ऐश्वर्यवान् राष्ट्र, गृहस्थ और राजा।
भावार्थ
(शचीभिः अक्षं न) वहन करने वाली शक्तियों से प्रेरित होकर ‘अक्ष’ धुरा जिस प्रकार दूर स्थान पर स्थित पहुंचाता और अभिमत फल को प्राप्त कराता है उसी प्रकार, हे (शतक्रतों) सैकड़ों प्रजाओं और कर्मों में कुशल विद्वन् ! तू (जरितॄणाम्) विद्वान्, यथार्थ गुणों के प्रवक्ता पुरुषों की (दुवः) परिचर्या, सेवा को प्राप्त कर उनके (कामं) अभिलषित इच्छा के अनुकूल पदार्थ को (आ ऋणोः) प्राप्त कराता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
शुनःशेप ऋषिः। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Devata
Meaning
Lord of a hundred blissful acts of the yajna of creation, who by the prayers and pious actions of the celebrants come into their vision and experience like the axis of a wheel, you fulfill their love and desire wholly and entirely.
Translation
O possessor of hundred powers. You like an axle accept whatever is the service offered by admirers and with your power and wisdom fulfil the wish of them.
Translation
O possessor of hundred powers. You like an axle accept whatever is the service offered by admirers and with your power and wisdom fulfill the wish of them.
Translation
It is surely the divine quality and grandeur of the Sun that it takes back the light, which it had spread throughout the interspace of the created world and when it loosens the rays from the high pedestal where they had collected, thereby weaves out night and day like a cloth for the whole creation in a uniform manner.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(आ) समन्तात् (यत्) यतः (दुवः) अ० २०।६८।। परिचरणम् (शतक्रतो) बहुप्रज्ञ। बहुकर्मन् (आ) अभितः। पूरणतः (कामम्) यथेष्टम् (जरितॄणाम्) स्तावकानाम् (ऋणोः) म० २। प्राप्नोषि (अक्षम्) धूः (न) इव (शचीभिः) कर्मभिः ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
সভাপতিলক্ষণোপদেশঃ
भाषार्थ
(যৎ) কারণ, (শতক্রতো) হে শত বুদ্ধি বা কর্মের অধিকারী! [সভাপতি] (জরিতৄণাম্) স্তুতিকারীদের (দুবঃ) সেবা (কামম্) নিজের ইচ্ছা অনুসারে (আ) সর্ব দিক থেকে (আ) সম্পূর্ণ রীতি অনুসারে (ঋণোঃ) তুমি প্রাপ্ত হও, (ন) যেমন (অক্ষম্) ধুরা/অক্ষ (শচীভিঃ) নিজের কর্ম দ্বারা [রথকে প্রাপ্ত হয়] ॥৩॥
भावार्थ
ধুরা/অক্ষ যেমন চাকার মাঝখানে থেকে সমস্ত বোঝা/ভার বহন করে রথকে চালনা করে, তেমনই সভাপতি রাজ্যের সমস্ত ভার নিজের উপর রেখে প্রজাদের উদ্যোগী করুক এবং প্রজারাও তাঁর সেবা করুক ॥২,৩॥
भाषार्थ
(শতক্রতো) হে শত অদ্ভুত কর্মসম্পন্ন প্রভু! আপনিই (জরিতর্ণিাংম্) স্তোতাদের (দুবঃ) সেবাকে, এবং (যদ্ কামম্) যা তাঁদের কাম্য মোক্ষ—এই উভয়কে (আ ঋণোঃ) পরস্পর সম্বদ্ধযুক্ত করেন, (ন) যেমন ছুতোর (শচীভিঃ) নিজ কারীগরীর কর্ম দ্বারা (অক্ষম্) রথের দুই চক্রের মধ্যে ধুরী/অক্ষ দিয়ে সেগুলোকে (আ ঋণোঃ) পরস্পর সম্বন্ধযুক্ত করে।
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