अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 141/ मन्त्र 3
यद॒द्याश्विना॑व॒हं हु॒वेय॒ वाज॑सातये। यत्पृ॒त्सु तु॒र्वणे॒ सह॒स्तच्छ्रेष्ठ॑म॒श्विनो॒रवः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठयत् । अ॒द्य । अ॒श्विनौ॑ । अ॒हम् । हु॒वेय॑ । वाज॑ऽसातये ॥ यत् । पृ॒त्ऽसु । तु॒र्वणे॑ । सह॑: । तत् । श्रेष्ठ॑म् । अ॒श्विनो॑: । अव॑: ॥१४१.३॥
स्वर रहित मन्त्र
यदद्याश्विनावहं हुवेय वाजसातये। यत्पृत्सु तुर्वणे सहस्तच्छ्रेष्ठमश्विनोरवः ॥
स्वर रहित पद पाठयत् । अद्य । अश्विनौ । अहम् । हुवेय । वाजऽसातये ॥ यत् । पृत्ऽसु । तुर्वणे । सह: । तत् । श्रेष्ठम् । अश्विनो: । अव: ॥१४१.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
दिन और राति के उत्तम प्रयोग का उपदेश।
पदार्थ
(यत्) जब (अद्य) (अश्विनौ) दोनों अश्वी [व्यापक दिन-राति] को (वाजसातये) विज्ञान के लाभ के लिये (अहम्) मैं (हुवेय) बुलाऊँ। और (पृत्सु) संग्रामों के बीच (तुर्वणे) शत्रुओं के मारने में (यत्) जो (सहः) बल है, (तत्) वह (अश्विनोः) दोनों अश्वी [व्यापक दिन-राति] की (श्रेष्ठम्) अति उत्तम (अवः) रक्षा [होवे] ॥३॥
भावार्थ
मनुष्य सदा विज्ञान के साथ अपना सामर्थ्य बढ़ावें, और शत्रुओं को मारकर सुखी होवें ॥३॥
टिप्पणी
३−(यत्) यदा (अद्य) अस्मिन् दिने (अश्विनौ) म० २। व्यापकौ। अहोरात्रौ (अहम्) (हुवेय) आह्वयेय (वाजसातये) विज्ञानस्य लाभाय (यत्) (पृत्सु) संग्रामेषु (तुर्वणे) कॄपॄवृजि०। उ० २।८१। तुर्वी हिंसायाम्-क्यु। शत्रूणां नाशने (सहः) अभिभवितृ बलम् (तत्) (श्रेष्ठम्) प्रशस्यतमम् (अश्विनोः) अहोरात्रयोः (अवः) रक्षणं भवतु ॥
विषय
श्रेष्ठम् अवः
पदार्थ
१. (यत्) = जब (अद्य) = आज (अहम्) = मैं (अश्विनौ) = प्राणापान का (हुवेय) = आह्वान करूँ-यदि मैं प्राणसाधना में प्रवृत्त होऊँ, तो ये प्राणापान (वाजसातये) = मुझे शक्ति प्राप्त करानेवाले हों। २. (यत्) = चूँकि प्राणसाधना से (पृत्सु) = संग्रामों में (तुर्वणे) = शत्रुओं के हिंसन के निमित्त (सहः) = बल प्राप्त होता है, (तत्) = अतः (अश्विनो:) = इन प्राणापान का (अव:) = रक्षण (श्रेष्ठम्) = श्रेष्ठ है।
भावार्थ
प्राणसाधना के द्वारा शक्ति प्राप्त होती है। शक्ति से शत्रुओं का मर्षण होता है। इसप्रकार प्राणों द्वारा प्रास होनेवाला रक्षण श्रेष्ठ है।
भाषार्थ
(अश्विना) हे नागरिक-प्रजा, तथा सेना के अधिपतियो! तुम दोनों को, (यद्) जो (अहम्) मैं सम्राट् (अद्य) आज (वाजसातये) सहभोज के लिए, (हुवेय) बुलाता हूँ, निमन्त्रित करता हूँ, यह कहने के लिए (यद्) कि (अश्विनोः) तुम दोनों अश्वियों का (अवः) राष्ट्र-संरक्षण (तत्) ऐसा ही (श्रेष्ठम्) श्रेष्ठ प्रशंसनीय है, (यत्) जैसे कि (पृत्सु) युद्धों में, (तुर्वणे) शत्रु-विनाशक-योद्धा में स्थित (सहः) साहस तथा शत्रु को पराभूत करने का बल श्रेष्ठ तथा प्रशंसनीय होता है।
टिप्पणी
[वाजसातये=वाजः (अन्न, निघं০ २.७)+साति (सन् संभक्तौ)। पृत्सु=संग्रामनाम (निघं০ २.१७)। तुर्वणे=तुर्वी हिंसार्थः।]
विषय
दो अधिकारी।
भावार्थ
और क्योंकि (अश्विनौ) उक्त दोनों व्यापक अधिकारवान् पुरुषों को (अहम्) मैं (वाजसातये) ऐश्वर्य के लाभ, और संग्राम के करने के लिये भी (हुवेय) बुलाता हूं। और क्योंकि उनका (सहः) शत्रु पराजय करने का सामर्थ्य (पृत्सु) संग्रामों के बीच में (तुर्वणे) शत्रु के नाश करने में समर्थ होता है, (तत) इसलिये (अश्विनोः) उन दोनों का (अवः) रक्षण सामर्थ्य भी (श्रेष्ठम्) सबसे श्रेष्ठ है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
शशकर्ण ऋषिः। अश्विनौ देवता। पञ्चर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Prajapati
Meaning
When I call upon the Ashvins, defenders of humanity and protectors of life, for the sake of victory in our struggle for existence, or I call on them against the enemies in our conflicts with negativities, they would come, because their courage and force for the defence and protection of life is highest and best.
Translation
I for the gain of power and knowledge call Ashvinau, the commander and King as their strength is meant to destry foemen in battles. Thus their protective power is excellent.
Translation
I for the gain of power and knowledge call Ashvinau, the commander and King as their strength is meant to destry foe-men in battles. Thus their protective power is excellent.
Translation
(Continued from above) as I call you today for the distribution of power energy, food, wealth and knowledge, the power and energy, which you dis-play in wars and the destruction of the enemy and evil forces, is the best protecting power of you, Ashvis.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(यत्) यदा (अद्य) अस्मिन् दिने (अश्विनौ) म० २। व्यापकौ। अहोरात्रौ (अहम्) (हुवेय) आह्वयेय (वाजसातये) विज्ञानस्य लाभाय (यत्) (पृत्सु) संग्रामेषु (तुर्वणे) कॄपॄवृजि०। उ० २।८१। तुर्वी हिंसायाम्-क्यु। शत्रूणां नाशने (सहः) अभिभवितृ बलम् (तत्) (श्रेष्ठम्) प्रशस्यतमम् (अश्विनोः) अहोरात्रयोः (अवः) रक्षणं भवतु ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
অহোরাত্রসুপ্রয়োগোপদেশঃ
भाषार्थ
(যৎ) যখন (অদ্য) আজ (অশ্বিনৌ) উভয় অশ্বীকে [ব্যাপক দিন-রাত্রিকে] (বাজসাতয়ে) বিজ্ঞান লাভের জন্য (অহম্) আমি (হুবেয়) আহ্বান করি। এবং (পৃৎসু) সংগ্রামের মাঝে (তুর্বণে) শত্রু হননের (যৎ) যে (সহঃ) বল, (তৎ) তা (অশ্বিনোঃ) উভয় অশ্বীর [ব্যাপক দিন-রাত্রিরর] (শ্রেষ্ঠম্) অতি উত্তম (অবঃ) রক্ষা [হয়/হোক] ॥৩॥
भावार्थ
মনুষ্য সর্বদা বিজ্ঞানের সাথে তার সামর্থ্য বৃদ্ধি করুক, এবং শত্রুদের হত্যা করে সুখী হোক ॥৩॥
भाषार्थ
(অশ্বিনা) হে নাগরিক-প্রজা, তথা সেনাধিপতিগণ! তোমাদের, (যদ্) যে (অহম্) আমি সম্রাট্ (অদ্য) আজ (বাজসাতয়ে) সহভোজের জন্য, (হুবেয়) আহ্বান করি, নিমন্ত্রিত করি, এটা বলার জন্য (যদ্) যে (অশ্বিনোঃ) [তোমাদের] দুজন অশ্বিদের (অবঃ) রাষ্ট্র-সংরক্ষণ (তৎ) এমনই (শ্রেষ্ঠম্) শ্রেষ্ঠ প্রশংসনীয়, (যৎ) যেমন (পৃৎসু) যুদ্ধে, (তুর্বণে) শত্রু-বিনাশক-যোদ্ধার মধ্যে স্থিত (সহঃ) সাহস তথা শত্রুকে পরাভূত করার বল শ্রেষ্ঠ তথা প্রশংসনীয় হয়।
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