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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 141 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 141/ मन्त्र 4
    ऋषिः - शशकर्णः देवता - अश्विनौ छन्दः - बृहती सूक्तम् - सूक्त १४१
    38

    आ नू॒नं या॑तमश्विने॒मा ह॒व्यानि॑ वां हि॒ता। इ॒मे सोमा॑सो॒ अधि॑ तु॒र्वशे॒ यदा॑वि॒मे कण्वे॑षु वा॒मथ॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । नू॒नम् । या॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । इ॒मा । ह॒व्यानि॑ । वा॒म् । हि॒ता ॥ इ॒मे । सोमा॑स: । अधि॑ । तु॒र्वशे॑ । यदौ॑ । इ॒मे । कण्वे॑षु । वा॒म् । अथ॑ ॥१४१.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ नूनं यातमश्विनेमा हव्यानि वां हिता। इमे सोमासो अधि तुर्वशे यदाविमे कण्वेषु वामथ ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ । नूनम् । यातम् । अश्विना । इमा । हव्यानि । वाम् । हिता ॥ इमे । सोमास: । अधि । तुर्वशे । यदौ । इमे । कण्वेषु । वाम् । अथ ॥१४१.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 141; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    दिन और राति के उत्तम प्रयोग का उपदेश।

    पदार्थ

    (अश्विना) हे दोनों अश्वी ! [व्यापक दिन-रात] (नूनम्) अवश्य (आ यातम्) आओ, (इमा) यह (हव्यानि) ग्राह्य द्रव्य (वाम्) तुम दोनों के लिये (हिता) रक्खे हैं। (इमे) यह (सोमासः) सोम रस [तत्त्व रस] (तुर्वशे) हिंसकों को वश में करनेवाले, (यदौ) यत्नशील मनुष्य में (अथ) और (इमे) यह [तत्त्व रस] (कण्वेषु) बुद्धिमानों में (वाम्) तुम दोनों के (अधि) अधिकाई से हैं ॥४॥

    भावार्थ

    समय के सुप्रयोग से विद्वान् प्रयत्न करनेवालों को उत्तम-उत्तम पदार्थ मिलते हैं और सदा मिलते रहेंगे ॥४॥

    टिप्पणी

    ४−(आ यातम्) आगच्छतम् (नूनम्) अवश्यम् (अश्विना) म० २। हे व्यापकौ अहोरात्रौ (इमा) पुरोवर्तीनि (हव्यानि) ग्राह्यवस्तूनि (वाम्) युवाभ्याम् (हिता) धृतानि (इमे) दृश्यमानाः (सोमासः) तत्त्वरसाः (अधि) आधिक्येन (तुर्वशे) अ० २०।३७।८। नरां हिंसकानां वशयितरि (यदौ) यती प्रयत्ने-उप्रत्ययः, तकारस्य दः। प्रयत्नशीले (इमे) (कण्वेषु) मेधाविषु (वाम्) युवयोः (अथ) अपि च ॥

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    विषय

    तुर्वश:-यदु-कण्व

    पदार्थ

    १. हे (अश्विना) = प्राणापानो! आप (नूनम्) = निश्चय से (आयातम्) = हमें प्राप्त होओ। (इमे) = ये (हव्यानि) = हव्य पदार्थ-यज्ञशेष के रूप में सेवन किये जानेवाले पदार्थ (वां हिता) = आपके लिए निहित हुए हैं। हव्य पदार्थों का सेवन प्राणसाधना के लिए बड़ा सहायक होता है। २. (अथ) = अब (इमे) = ये (वाम्) = आपके (सोमासः) = सोमकण-आपके द्वारा रक्षित होनेवाले सोमकण (तुर्वशे अधि) = शत्रुओं को त्वरा से वश में करनेवाले पुरुष में होते हैं। (यदौ) = यत्नशील पुरुष में-सदा क्रिया में तत्पर पुरुष में इनका निवास होता है। (इमे) = ये सोमकण (कण्वेषु) = मेधावी पुरुषों में निवास करते हैं। प्राणसाधना ही सोम-रक्षण के द्वारा हमें 'तुर्वश, यदु व कण्व' बनाती है।

    भावार्थ

    प्राणसाधना के साथ हव्य पदार्थों का सेवन भी अभीष्ट है। प्राणसाधना से सोम की शरीर में ऊर्ध्वगति होती है, तब हम 'शत्रुओं को वश में करनेवाले, यत्नशील व मेधावी' बन पाते हैं।

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    भाषार्थ

    (अश्विना) हे अश्वियो! (आ यातम्) आप दोनों राष्ट्र के शासन के लिए आइए। (नूनम्) निश्चय से (इमा हव्यानि) राष्ट्र की ये भोग्य-सामग्रियाँ (वाम्) आप दोनों के अधिकार में सुरक्षार्थ (हिता) स्थापित हैं। (तुर्वशे) शीघ्रता से शत्रुओं को वश में करनेवाले क्षत्रिय-वर्ग में (यदौ) प्रयत्नशील व्यापारी-वर्ग में, (अथ कण्वेषु) और मेधावी ब्राह्मणों में जो (इमे) ये (सोमासः) ऐश्वर्य हैं, वे भी (वाम्) आप दोनों के (अधि) अधिकार में सुरक्षार्थ समर्पित हैं।

    टिप्पणी

    [हव्यानि=हु अदने, भोज्य-सामग्री। हिता=हितानि, निहितानि। सोमासः=षू ऐश्वर्ये। तुर्वशे=त्वरया वशकर्त्ता। यदौ=प्रयत्नशीले मनुष्ये (निघं০ २.३)। कण्वः=मेधावी (निघं০ ३.१५)।]

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    विषय

    दो अधिकारी।

    भावार्थ

    हे (अश्विना) अश्विगण, व्यापक अधिकारवान् पुरुषो ! आप दोनों (नूनम् आयातम्) अवश्य प्राप्त होवो। (वां) तुम दोनों के लिये (इमा हव्यानि) ये ग्रहण करने योग्य अन्न आदि भोग्य पदार्थ (हिता) रखे हैं। (इमे) ये (सोमासः) ऐश्वर्य वाले पदार्थ जो (तुर्वशे) चारों पुरुषार्थों की कामना करने वाले और (यदी अधि) यत्नशील प्रजाजन के अधिकार में हैं और (इमे) ये समस्त ऐश्वर्य जो (कण्वेषु) विशेष मेधावी विद्वान् पुरुषों में हैं वे सब (अथ वाम्) तुम दोनों के ही हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शशकर्ण ऋषिः। अश्विनौ देवता। पञ्चर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Prajapati

    Meaning

    Come, Ashvins, for sure without fail. These presentations, adorations and offerings of hospitality are reserved for you whether they are in the house of the stormy warrior or dynamic intellectual or artist or citizen or the sagely seer, they are for you and you alone.

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    Translation

    O commander and King, you surely come hitherwards. For you both these palatable preparations are kept safe. These prosperties and strength which remain in the man having control over violent powers, which are in ordinary man (Yadav) and which of them are in learned men, really are of yours.

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    Translation

    O commander and King, you surely come hitherwards. For you both these palatable preparations are kept safe. These prosperities and strength which remain in the man having control over violent powers, which are in ordinary man (Yadav) and which of them are in learned men, really are of yours.

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    Translation

    These sources of pleasures and joys, which are under the control of the persons, trying to achieve the fourfold aims of life and of the wise and intelligent people, are all for you.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(आ यातम्) आगच्छतम् (नूनम्) अवश्यम् (अश्विना) म० २। हे व्यापकौ अहोरात्रौ (इमा) पुरोवर्तीनि (हव्यानि) ग्राह्यवस्तूनि (वाम्) युवाभ्याम् (हिता) धृतानि (इमे) दृश्यमानाः (सोमासः) तत्त्वरसाः (अधि) आधिक्येन (तुर्वशे) अ० २०।३७।८। नरां हिंसकानां वशयितरि (यदौ) यती प्रयत्ने-उप्रत्ययः, तकारस्य दः। प्रयत्नशीले (इमे) (कण्वेषु) मेधाविषु (वाम्) युवयोः (अथ) अपि च ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    অহোরাত্রসুপ্রয়োগোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (অশ্বিনা) হে উভয় অশ্বী! [ব্যাপক দিন-রাত] (নূনম্) অবশ্যই (আ যাতম্) এসো, (ইমা) এই (হব্যানি) গ্রাহ্য দ্রব্য (বাম্) তোমদের উভয়ের জন্য (হিতা) নিহিত/রাখা হয়েছে। (ইমে) এই (সোমাসঃ) সোম রস [তত্ত্ব রস] (তুর্বশে) হিংসুকদের বশকারী, (যদৌ) যত্নশীল মনুষ্যের মধ্যে (অথ) এবং (ইমে) তা [তত্ত্ব রস] (কণ্বেষু) বুদ্ধিমানদের মাঝে (বাম্) তোমদের দুজনের (অধি) অধিকত্বে ॥৪॥

    भावार्थ

    সময়ের সুপ্রয়োগ দ্বারা বিদ্বান প্রচেষ্টাকারীদের উত্তম-উত্তম পদার্থ প্রাপ্ত হয় এবং সর্বদা প্রাপ্ত করুক ॥৪॥

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    भाषार्थ

    (অশ্বিনা) হে অশ্বিগণ! (আ যাতম্) আপনারা দুজন রাষ্ট্র শাসনের জন্য আসুন। (নূনম্) নিশ্চিতরূপে (ইমা হব্যানি) রাষ্ট্রের এই ভোগ্য-সামগ্রী (বাম্) আপনাদের দুজনের অধিকারে সুরক্ষার্থে (হিতা) স্থাপিত। (তুর্বশে) শীঘ্রতাপূর্বক শত্রুদের বশবর্তীকারী ক্ষত্রিয়-বর্গের মধ্যে (যদৌ) প্রচেষ্টাশীল বণিক-বর্গের মধ্যে, (অথ কণ্বেষু) এবং মেধাবী ব্রাহ্মণদের মধ্যে যা (ইমে) এই (সোমাসঃ) ঐশ্বর্য আছে, তাও (বাম্) আপনাদের দুজনের (অধি) অধিকারে সুরক্ষার্থে সমর্পিত।

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