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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 18 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 18/ मन्त्र 3
    ऋषिः - मेधातिथिः, प्रियमेधः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-१८
    52

    इ॒च्छन्ति॑ दे॒वाः सु॒न्वन्तं॒ न स्वप्ना॑य स्पृहयन्ति। यन्ति॑ प्र॒माद॒मत॑न्द्राः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ॒च्छन्ति॑ । दे॒वा: । सु॒न्वन्त॑म् । न । स्वप्ना॑य । स्पृ॒ह॒य॒न्ति॒ ॥ यन्ति॑ । प्र॒ऽमाद॑म् । अत॑न्द्रा ॥१८.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इच्छन्ति देवाः सुन्वन्तं न स्वप्नाय स्पृहयन्ति। यन्ति प्रमादमतन्द्राः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    इच्छन्ति । देवा: । सुन्वन्तम् । न । स्वप्नाय । स्पृहयन्ति ॥ यन्ति । प्रऽमादम् । अतन्द्रा ॥१८.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 18; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (देवाः) विद्वान् लोग (सुन्वन्तम्) तत्त्व को निचोड़नेवाले को (इच्छन्ति) चाहते हैं, (स्वप्नाय) निद्रा को (न) नहीं (स्पृहयन्ति) चाहते हैं, और (अतन्द्राः) निरालसी होकर (प्रमादम्) भूलवाले को (यन्ति) दण्ड देते हैं ॥३॥

    भावार्थ

    दूरदर्शी विद्वान् पुरुष कर्मकुशल चौकन्ने लोगों से प्रसन्न रहें और ढिल्लर निकम्मों को दण्ड देवें ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(इच्छन्ति) कामयन्ते (देवाः) विद्वांसः (सुन्वन्तम्) तत्त्वस्य निष्पादकम् (न) निषेधे (स्वप्नाय) स्पृहेरीप्सितः। पा० १।४।३६। इति कर्मणि चतुर्थी। स्वप्नम्। आलस्यम् (स्पृहयन्ति) इच्छन्ति (यन्ति) यम नियमने, अदादित्वं बहुवचनस्यैकवचनत्वं च छान्दसम्। यम्यन्ति। नियम्यन्ति। दण्डयन्ति (प्रमादम्) अर्शआद्यच्। प्रमादिनम्। अनवधानत्वम् (अतन्द्राः) अनलसाः ॥

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    विषय

    सुन्वन्, नकि स्वप्नक् [शयालु]

    पदार्थ

    १. (देवा:) = सब देव (सुन्वन्तं इच्छन्ति) = यज्ञशील पुरुष को चाहते हैं। (स्वप्नाय) = मूर्तिमान् स्वप्न के लिए-बड़े सोंदू पुरुष के लिए-(न स्पृहयन्ति) = स्मृहा-[प्रेम व इच्छा]-वाले नहीं होते। २. इस संसार में (अतन्द्र:) = आलस्यशून्य पुरुष ही (प्रमादं यन्ति) = प्रकृष्ट हर्ष को प्राप्त करते हैं।

    भावार्थ

    यज्ञशीलता ही हमें देवों का प्रिय बनाती है। आलस्य हमें उनका अप्रिय बना देता है। उद्यमी पुरुष ही उत्कृष्ट आनन्द के भागी होते हैं।

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    भाषार्थ

    (देवाः) देव लोग (सुन्वन्तम्) भक्ति रसवाले उपासक को (इच्छन्ति) चाहते हैं, (स्वप्नाय) सोनेवाले को (न स्पृहयन्ति) नहीं चाहते। देवलोग (अतन्द्रा) निद्रा और सुस्ती से अलग होते हैं। वे (प्रमादम्) भक्तिरस की उग्र मस्तीवाले, उसकी सहायता के लिए (यन्ति) सदा प्राप्त होते हैं।

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    विषय

    परमेश्वर की स्तुति

    भावार्थ

    (देवाः) देव, दिव्यगुण और विद्वान् पुरुष (सुन्वन्तम्) काम करने हारे यत्नशील पुरुष को (इच्छन्ति) चाहते हैं वे (स्वप्नाय) सोने वाले प्रमादी पुरुष से (न स्पृहयन्ति) प्रेम नहीं करते। प्रायः (अतन्द्राः) आलस्य रहित पुरुष भी (प्रमादम् यन्ति) प्रमाद कर दिया करते हैं। इसलिये हे पुरुपो ! सात्विक गुणों को प्राप्त करने के लिये सदा क्रियाशील और यत्नवान् बने रहो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    १-३ काण्वो मेधातिथिः रांगिरसः प्रियमेधश्च ऋषी। ४-६ वसिष्ठः। इन्द्रो देवता गायत्री। षडृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Surrender and Security

    Meaning

    Divines of brilliance and holy action love those engaged in creative actions of piety. They care not for dreams and love no dreamers. Active, wakeful and realistic beyond illusion, they achieve the joy of success in life.

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    Translation

    The enlightened persons prefer him who is active in proliferating knowledge, they never desire indolence and they always exerting punish the sloth.

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    Translation

    The enlightened persons prefer him who is active in proliferating knowledge, they never desire indolence and they always exerting punish the sloth.

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    Translation

    The persons of divine qualities like the ever active people. They don’t like the lazy and the idle ones. The ever-vigilant persons control their slothful nature.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(इच्छन्ति) कामयन्ते (देवाः) विद्वांसः (सुन्वन्तम्) तत्त्वस्य निष्पादकम् (न) निषेधे (स्वप्नाय) स्पृहेरीप्सितः। पा० १।४।३६। इति कर्मणि चतुर्थी। स्वप्नम्। आलस्यम् (स्पृहयन्ति) इच्छन्ति (यन्ति) यम नियमने, अदादित्वं बहुवचनस्यैकवचनत्वं च छान्दसम्। यम्यन्ति। नियम्यन्ति। दण्डयन्ति (प्रमादम्) अर्शआद्यच्। प्रमादिनम्। अनवधानत्वम् (अतन्द्राः) अनलसाः ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজপ্রজাকর্তব্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (দেবাঃ) বিদ্বানগণ (সুন্বন্তম্) তত্ত্ব অনুসন্ধানকারীর/নিষ্পাদনকারীর (ইচ্ছন্তি) কামনা করে, (স্বপ্নায়) নিদ্রা (ন) না (স্পৃহয়ন্তি) কামনা করে, এবং (অতন্দ্রাঃ) নিরলস হয়ে (প্রমাদম্) অসাবধানীদের (যন্তি) শাস্তি প্রদান করে।।৩।।

    भावार्थ

    দূরদর্শী বিদ্বান্ পুরুষ কর্মকুশল সচেতন মনুষ্যদের প্রতি প্রসন্ন থাকুক এবং নির্বোধ অকর্মণ্যদের শাস্তি প্রদান করুক।।৩।।

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    भाषार्थ

    (দেবাঃ) দেবতারা (সুন্বন্তম্) ভক্তিরস-সম্পন্ন উপাসককে (ইচ্ছন্তি) কামনা করে, (স্বপ্নায়) শায়িতকে (ন স্পৃহয়ন্তি) না চায়/কামনা করে। দেবতারা (অতন্দ্রা) নিদ্রা এবং তন্দ্রা থেকে পৃথক। তারা (প্রমাদম্) ভক্তিরসে উগ্র আনন্দময়, তাঁর সহায়তার জন্য (যন্তি) সদা প্রাপ্ত হয়।

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