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अथर्ववेद के काण्ड - 20 के सूक्त 44 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 44/ मन्त्र 2
    ऋषिः - इरिम्बिठिः देवता - इन्द्रः छन्दः - गायत्री सूक्तम् - सूक्त-४४
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    यस्मि॑न्नु॒क्थानि॒ रण्य॑न्ति॒ विश्वा॑नि च श्रवस्या। अ॒पामवो॒ न स॑मु॒द्रे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यस्मि॑न् । उ॒क्था॑नि । रण्य॑न्ति । विश्वा॑नि । च॒ । श्र॒व॒स्या॑ ॥ अ॒पाम् । अव॑ । न । स॒मु॒द्रे ॥४४.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यस्मिन्नुक्थानि रण्यन्ति विश्वानि च श्रवस्या। अपामवो न समुद्रे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यस्मिन् । उक्थानि । रण्यन्ति । विश्वानि । च । श्रवस्या ॥ अपाम् । अव । न । समुद्रे ॥४४.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 44; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

    पदार्थ

    (यस्मिन्) जिस [पुरुष] में (विश्वानि) सब (उक्थानि) कहने योग्य वचन (च) और (श्रवस्या) धन के लिये हितकारी कर्म (रण्यन्ति) पहुँचते हैं, (न) जैसे (समुद्रे) समुद्र में (अपाम्) जलों की (अवः) गति [पहुँचती हैं] ॥२॥

    भावार्थ

    जैसे नदियाँ समुद्र में जाकर विश्राम पाती हैं, वैसे ही विद्वान् लोग पराक्रमी राजा के पास पहुँचकर अपना गुण प्रकाशित करके सुख पावें ॥२, ३॥

    टिप्पणी

    २−(यस्मिन्) पुरुषे (उक्थानि) वक्तव्यानि वचनानि (रण्यन्ति) अ० २०।१७।६। गच्छन्ति (विश्वानि) सर्वाणि (च) (श्रवस्या) अ० २०।१२।१। धनाय हितानि कर्माणि (अपाम्) जलानाम् (अवः) अव गतौ-असुन्। गमनम् (न) यथा (समुद्रे) उदधौ ॥

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    विषय

    उक्थानि श्रवस्या

    पदार्थ

    १. उस प्रभु का स्तवन करो (यस्मिन्) = जिस प्रभु में (विश्वानि उक्थानि) = सब स्तोत्र (रण्यन्ति) = रमणीय होते हैं (च) = और उस प्रभु का ही स्तवन करो जिससे (अवस्या) = [श्रवस्यम् Glory]-सब यश इसप्रकार रमणीय होते हैं, (न) = जैसेकि (अपाम् अव:) = जलों का प्रवाह (समुद्रे) = समुद्र में। २. सब जल-प्रवाहों का अन्तिम निधान समुद्र है, इसी प्रकार सब स्तोत्रों व यशों का निधान प्रभु हैं।

    भावार्थ

    हम उस प्रभु का स्तवन करे जो सब स्तोत्रों व यशों का निधान हैं।

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    भाषार्थ

    (अपाम् समुद्रे) जलभरे समुद्र में (न) जैसे जलचर प्राणी (अवः) रक्षा पाते है, वैसे (यस्मिन्) जिस परमेश्वर में (श्रवस्या) श्रवण-मनन योग्य तथा (उक्थानि) प्रवचनयोग्य (विश्वानि) सब सूक्तियाँ अर्थात् वैदिक सूक्त (रण्यन्ति) रमण करते हैं॥ २॥

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    विषय

    सम्राट्।

    भावार्थ

    (समुद्रे) समुद्र में (अपाम्) जलों का (अवः न) जिस प्रकार प्रवाह आता है उसी प्रकार (यस्मिन्) जिस परमेश्वर या प्रभु में ही (विश्वानि) समस्त (श्रवस्या) कीर्तिजनक (उक्थानि) वचन (रण्यन्ति) लगाते हैं, ठीक उपयुक्त होते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    इरिम्बिठिः काण्व ऋषिः। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Indra Devata

    Meaning

    Unto him all songs of adoration return, to him all honours and fame of the world reach, in him they rejoice like streams and rivers reaching and rejoicing in the sea.

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    Translation

    The Almighty Divinity is He to whom all the praise songs full of admirations go as the current of waters go to sea.

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    Translation

    The Almighty Divinity is He to whom all the praise songs full of admirations go as the current of waters go to sea.

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    Translation

    In whom all the glorifying praise-songs look befitting and appropriate, just as the flow of waters fits into the sea.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(यस्मिन्) पुरुषे (उक्थानि) वक्तव्यानि वचनानि (रण्यन्ति) अ० २०।१७।६। गच्छन्ति (विश्वानि) सर्वाणि (च) (श्रवस्या) अ० २०।१२।१। धनाय हितानि कर्माणि (अपाम्) जलानाम् (अवः) अव गतौ-असुन्। गमनम् (न) यथा (समुद्रे) उदधौ ॥

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    बंगाली (2)

    मन्त्र विषय

    রাজপ্রজাকৃত্যোপদেশঃ

    भाषार्थ

    (যস্মিন্) যে [পুরুষের] মধ্যে (বিশ্বানি) সকল (উক্থানি) কথন যোগ্য বচন (চ) এবং (শ্রবস্যা) ধনের জন্য হিতকারী কর্ম (রণ্যন্তি) পৌঁছায়/প্রেরিত হয়, (ন) যেমন (সমুদ্রে) সমুদ্রে (অপাম্) জলের (অবঃ) গতি [পৌঁছায়]॥২॥

    भावार्थ

    যেমন নদী সমুদ্রে গিয়ে বিশ্রাম পায়, তেমনই বিদ্বানগণ পরাক্রমী রাজার নিকট পৌঁছে নিজের গুণ প্রকাশিত করে সুখী হবে/হোক ॥২, ৩॥

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    भाषार्थ

    (অপাম্ সমুদ্রে) জলপূর্ণ সমুদ্রে (ন) যেমন জলচর প্রাণী (অবঃ) রক্ষা পায়, তেমনই (যস্মিন্) যে পরমেশ্বরের মধ্যে (শ্রবস্যা) শ্রবণ-মনন যোগ্য তথা (উক্থানি) প্রবচনযোগ্য (বিশ্বানি) সকল সূক্তি অর্থাৎ বৈদিক সূক্ত (রণ্যন্তি) রমণ করে॥ ২॥

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