अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 23/ मन्त्र 6
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - चन्द्रमाः, योनिः
छन्दः - स्कन्धोग्रीवी बृहती
सूक्तम् - वीरप्रसूति सूक्त
92
यासां॒ द्यौष्पि॒ता पृ॑थि॒वी मा॒ता स॑मु॒द्रो मूलं॑ वी॒रुधां॑ ब॒भूव॑। तास्त्वा॑ पुत्र॒विद्या॑य॒ दैवीः॒ प्राव॒न्त्वोष॑धयः ॥
स्वर सहित पद पाठयासा॑म् । द्यौ: । पि॒ता । पृ॒थि॒वी । मा॒ता । स॒मु॒द्र: । मूल॑म् । वी॒रुधा॑म् । ब॒भूव॑ । ता: । त्वा॒ । पु॒त्र॒ऽविद्या॑य । दैवी॑: । प्र । अ॒व॒न्तु॒ । ओष॑धय: ॥२३.६॥
स्वर रहित मन्त्र
यासां द्यौष्पिता पृथिवी माता समुद्रो मूलं वीरुधां बभूव। तास्त्वा पुत्रविद्याय दैवीः प्रावन्त्वोषधयः ॥
स्वर रहित पद पाठयासाम् । द्यौ: । पिता । पृथिवी । माता । समुद्र: । मूलम् । वीरुधाम् । बभूव । ता: । त्वा । पुत्रऽविद्याय । दैवी: । प्र । अवन्तु । ओषधय: ॥२३.६॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
वीर सन्तान उत्पन्न करने के उपदेश।
पदार्थ
(यासाम् वीरुधाम्) जिन उगनेवाली अन्नादि ओषधियों का (द्यौः) सूर्य (पिता) पालनेवाला, (पृथिवी) पृथिवी (माता) उत्पन्न करनेवाली, और (समुद्रः) समुद्र [जल] (मूलम्) जड़ (बभूव) हुआ है, (ताः) वे (देवीः) दिव्य गुणवाली (ओषधयः) औषधें (पुत्रविद्याय) सन्तान पाने के लिये (त्वा) तेरी (प्र) अच्छे प्रकार (अवन्तु) रक्षा करें ॥६॥
भावार्थ
अन्न आदि अनेक औषधियाँ सूर्य द्वारा वृष्टि और प्रकाश पाकर पृथिवी और जल के संयोग से उत्पन्न होती हैं, उनमें से उत्तम-२ बलवर्धक औषधों के उचित खान पान से माता पिता उत्तम सन्तान उत्पन्न करें ॥६॥
टिप्पणी
६−(द्यौः) अ० २।१२।६। द्योतमानः सूर्यः। (पिता) अ० १।२।१। वृष्टिदानेन रक्षको जनयिता। (पृथिवी) अ० १।२।१। विस्तृता भूमिः। (माता) अ० ३।९।१। निर्मात्री। जननी। (समुद्रः) अ० १।१३।३। समुन्दनशीलः सागरः। (मूलम्) अ० २।७।३। मुख्यकारणम्। (वीरुधाम्) अ० १।३२।१। विरोहणस्वभावानाम्। ओषधीनाम्। (पुत्रविद्याय) संज्ञायां समजनिषदनिपत०। पा० ३।३।९९। इति विद्लृ लाभे, छन्दसि भावे क्यप्। सन्तानलाभाय। (दैवीः) अ० १।१९।२। दैव्यः। दिव्याः। अन्यद् गतम् ॥
विषय
दैवी ओषधियाँ
पदार्थ
१. (यासाम्) = जिन (वीरुधाम्) = विरोहणस्वभावा ओषधियों का (द्यौः) = द्युलोक (पिता) = वृष्टिजलरूप में रेतस् का सेचन करनेवाला उत्पादक पिता (बभूव) = है और उस रेतस को धारण करनेवाली (पृथिवी) = पृथिवी (माता) = जनयित्री है और जिन वीरुधों का (समुद्रः) = स्यन्दनशील जलराशिरूप समुद्र ही (मूलम्) = मूलकारण है। समुद्र ही से तो वाष्पीभूत होकर जल मेषरूप में परिणत होकर बरसता है। २. (ता:) = वे (देवी) = सब रोगों को जीतने की कामना करनेवाली (ओषधयः) = दोषों का दहन करनेवाली ओषधियों (त्वा) = तुझे (पुत्रविद्याय) = पुत्र की प्राप्ति के लिए (प्रावन्तु) = प्रकर्षण रक्षित करें।
भावार्थ
उत्तम वानस्पतिक पदार्थों का प्रयोग हमें नीरोग बनाए व नीरोग सन्तानों को प्रास करानेवाला हो।
विशेष
अगले सूक्त का ऋषि 'भृगु' है-तपस्वी [भ्रस्ज पाके] यह वानस्पतिक पदार्थों का प्रयोग करता है। यह प्रभु के सन्देश को इस रूप में प्रकट करता है -
भाषार्थ
(यासाम् वीरुधाम्) जिन विरोहणशील औषधियों का (पिता) पिता (द्यौः) द्युलोक है, (माता पृथिवी) और माता पृथिवी है, (समुद्र:) समुद्र (मूलम्) मूल कारण (बभूव) है; (ता: दैवीः ओषधयः) वे दिव्य औषधियां, (पुत्रविद्याय) पुत्र प्राप्ति के लिए, (त्वा प्रावन्तु) तुझे सुरक्षित करें।
टिप्पणी
[द्यौः पिता है, वर्षारूपी वीर्यप्रदाता। पृथिवी माता है, ओषधियाँ पृथिवी से प्राप्त होती हैं। समुद्र है "मूलम्" अर्थात् मूलकारण, ये सामुद्रिक औषधियां हैं, जो आसन्न समुद्र-तट१ पर पैदा होती हैं।] [१. यथा "गङ्गायां घोषाः"=गङ्गातटे घोषाः, उपचारात्।]
विषय
उत्तम सन्तान उत्पन्न करने की विधि।
भावार्थ
(यासां) जिन (वीरुधाम्) लताओं का (पिता) परिपालक (द्यौः) सूर्य और (माता पृथिवी) माता पृथिवी और (समुद्रः) जलधाराओं का बरसाने वाला मेघ (मूलं) मूल (बभूव) है (ताः) वे (देवीः) दिव्य ओषधियां हे नारि ! (ओषधयः) रस वीर्य विपाक को धारण करने वाली होकर (त्वा) तेरी और तेरे गर्भ की (पुत्र-विद्याय) पुत्र लाभ के लिये (प्र अवन्तु) रक्षा करें।
टिप्पणी
(प्र०) ‘द्यौष्पिता’ इति बहुत्र। (प्र० द्वि०) ‘यासां पिता प्रर्जन्यो भूमिर्माता क्भूव’।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। चन्द्रमा उत योनिर्देवता। ५ उपरिष्टाद-भुरिग्-बृहती । ६ स्कन्धोग्रीवी बृहती। १-४ अनुष्टुभः। षडृचं सूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
Fertility, Prajapatyam
Meaning
Those herbs of which the sun, the light of heaven, and the self-refulgent Lord Supreme is the father, and the earth is the mother, and the sea and the cosmic ocean is the root, may those divine herbs bless you, protect you and increase your fertility to get brave progeny.
Translation
The creeping herbs, whose father is the sky, mother the earth, and origin the ocean, may those medicinal plants, with divine properties, assist you in obtaining a son.
Translation
May protect you for having a male child those effecting herbs whose father is rain, whose mother is earth and whose root is the ocean.
Translation
May those herbs whose father is the Sun, the Earth their mother and their root the rainy cloud, may those healing plants assist thee, O woman, to obtain a son.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
६−(द्यौः) अ० २।१२।६। द्योतमानः सूर्यः। (पिता) अ० १।२।१। वृष्टिदानेन रक्षको जनयिता। (पृथिवी) अ० १।२।१। विस्तृता भूमिः। (माता) अ० ३।९।१। निर्मात्री। जननी। (समुद्रः) अ० १।१३।३। समुन्दनशीलः सागरः। (मूलम्) अ० २।७।३। मुख्यकारणम्। (वीरुधाम्) अ० १।३२।१। विरोहणस्वभावानाम्। ओषधीनाम्। (पुत्रविद्याय) संज्ञायां समजनिषदनिपत०। पा० ३।३।९९। इति विद्लृ लाभे, छन्दसि भावे क्यप्। सन्तानलाभाय। (दैवीः) अ० १।१९।२। दैव्यः। दिव्याः। अन्यद् गतम् ॥
बंगाली (2)
भाषार्थ
(যাসাম্ বীরুধাম্) যেসকল বিরোহণশীল ঔষধি-সমূহের (পিতাঃ) পিতা (দৌঃ) দ্যুলোক, (মাতা পৃথিবী) এবং মাতা পৃথিবী, (সমুদ্রঃ) সমুদ্র (মূলম্) মূল কারণ (বভূব) হয়; (তাঃ দৈবীঃ ঔষধয়ঃ) সেই দিব্য ঔষধিসমূহ, (পুত্রবিদ্যায়) পুত্র প্রাপ্তির জন্য, (ত্বা প্রবন্তু) তোমাকে সুরক্ষিত করুক।
टिप्पणी
[দ্যৌঃ হলো পিতা, বর্ষারূপী বীর্যপ্রদাতা। পৃথিবী হলো মাতা, ভেষজ ঔষধসমূহ পৃথিবী থেকে প্রাপ্ত হয়। সমুদ্র হলো "মূলম" যার অর্থ মূল কারণ, এগুলি সামুদ্রিক ঔষধি, যা সংলগ্ন সমুদ্র তটে১ উৎপন্ন হয়।] [১. যথা "গঙ্গায়াং ঘোষাঃ”=গঙ্গাতটে ঘোষাঃ, উপচারাৎ।]
मन्त्र विषय
বীরসন্তানোৎপাদনোপদেশঃ
भाषार्थ
(যাসাম্ বীরুধাম্) যে বিরোহণশীল অন্নাদি ঔষধির (দ্যৌঃ) সূর্য (পিতা) পালনকারী, (পৃথিবী) পৃথিবী (মাতা) নির্মাত্রী, এবং (সমুদ্রঃ) সমুদ্র [জল] (মূলম্) মূল (বভূব) হয়েছে, (তাঃ) সেই (দেবীঃ) দিব্য গুণান্বিত (ওষধয়ঃ) ঔষধি-সমূহ (পুত্রবিদ্যায়) সন্তান পানের জন্য (ত্বা) তোমার (প্র) উত্তমরূপে (অবন্তু) রক্ষা করুক ॥৬॥
भावार्थ
অন্নাদি অনেক ঔষধি সূর্য দ্বারা বৃষ্টি ও আলো পেয়ে পৃথিবী এবং জলের সংযোগে উৎপন্ন হয়, সেগুলোর মধ্যে উত্তম-উত্তম বলবর্ধক ঔষধির যথাবিধি সেবন দ্বারা মাতা পিতা উত্তম সন্তান উৎপন্ন করুক ॥৬॥
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