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अथर्ववेद के काण्ड - 3 के सूक्त 25 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 25/ मन्त्र 1
    ऋषिः - भृगु देवता - मित्रावरुणौ, कामबाणः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - कामबाण सूक्त
    172

    उ॑त्तु॒दस्त्वोत्तु॑दतु॒ मा धृ॑थाः॒ शय॑ने॒ स्वे। इषुः॒ काम॑स्य॒ या भी॒मा तया॑ विध्यामि त्वा हृ॒दि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ॒त्ऽतु॒द: । त्वा॒ । उत् । तु॒द॒तु॒ । मा । धृ॒था॒: । शय॑ने । स्वे । इषु॑: । काम॑स्य । या । भी॒मा । तया॑ । वि॒ध्या॒मि॒ । त्वा॒ । हृ॒दि ॥२५.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उत्तुदस्त्वोत्तुदतु मा धृथाः शयने स्वे। इषुः कामस्य या भीमा तया विध्यामि त्वा हृदि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत्ऽतुद: । त्वा । उत् । तुदतु । मा । धृथा: । शयने । स्वे । इषु: । कामस्य । या । भीमा । तया । विध्यामि । त्वा । हृदि ॥२५.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 25; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    अविद्या के नाश से विद्या की प्राप्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे अविद्या !] (उत्तुदः) तेरा उखाड़नेवाला [विद्वान्] (त्वा) तुझको (उत् तुदतु) उखाड़ दे। (स्वे शयने) अपने शयन स्थान [हृदय] में (मा धृथाः) मत ठहर। (कामस्य) सुकामना का (या) जो [तेरे लिये] (भीमा) भयानक (इषुः) तीर है, (तया) उससे (त्वा) तुझको (हृदि) हृदय में (विध्यामि) बेधता हूँ ॥१॥

    भावार्थ

    सब स्त्री पुरुष ब्रह्मचर्यादि तपोबल द्वारा अविद्या को हृदय से मिटावें, जैसे शूर वीर योद्धा शत्रु सेना को अस्त्र शस्त्रों से मार गिराता है ॥१॥ इस सूक्त में स्त्री लिङ्ग शब्द अविद्या और विद्या के लिए आये हैं। पहले तीन मन्त्र अविद्यापरक, और पिछले तीन विद्यापरक हैं। अलङ्कार से अविद्या को दुःखदायिनी और विद्या को सुखदायिनी मानकर संबोधन किया है ॥

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    विषय

    उत्तुदः [कामः]

    पदार्थ

    १. पति पत्नी से कहता है कि (उत्तुदः) = [उत्कृष्ट तुदति] बहुत पीड़ित करनेवाला यह 'काम' वा उत्तुदतु-तुझे पीड़ित करे । तू कामार्ता होकर (स्वे शयने) = अपने बिछौने पर (मा धृथाः) = मत पड़ी रहे, तेरा झुकाव मेरी ओर हो। तू मुझसे मेल की कामनावाली हो। २. (या) = जो (कामस्य) = कामदेव का (भीमा इषु:) = भयकारी बाण है, (तया) = उस बाण से (त्वा) = तुझे (हदि) = हृदय

    में (विध्यामि) = बींधता हूँ।

    भावार्थ

    पत्नी में पति के प्रति संग की कामना हो। यह काम पत्नी को पति के प्रति झुकावबाला करे।

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    भाषार्थ

    (उत्तुदः) अति व्यथाकारी काम (उत् तुदतु) हे पत्नी! तुझे व्यथित करे, (स्वे शयने) निज शय्या पर (मा धृथाः) तू धारित न हो। (कामस्य) कामवासना की (या भीमा इषुः) जो भयानक इषु है (तया) उस द्वारा (त्वा) तुझे (हदि) हृदय में (विध्यामि) मैं बींधता हूँ।

    टिप्पणी

    [रुष्ट हुई पत्नी के प्रति उसका पति कहता है कि तुझे काम के बाण द्वारा बींधता हूँ, इससे तू शय्या पर सुख से शयन न कर सकेगी।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Love and Passion: Fidelity

    Meaning

    This sukta begins with the voice of passion, violent passion indeed (verses 1-3). Verses 4-6 are the call of reason for canalisation of passion into love for fulfilment with balance and settlement into the sacred state of marriage and family life. In fact hymns from 21 to 25 form a unit by themselves: 21 celebrates various forms of fire and energy including sex and love and ends with the word ‘ashishamam’, ‘I have pacified the fire’, the aids are given in verse 10. There can be no achievement in life without the passion to work and achieve (22). In family life, the man and wife, both in unison, live, love, work for fulfilment and look forward to achieve continuity and futurity through progeny. Hence sukta 23 is dedicated to the cure of sterility. Once family life is blest with love, cooperation, happy progeny and promising futurity, you work for prosperity, and that is celebrated in sukta 24 from family level to the ultimate social level. And hymn 25 is dedicated to passion in balance with reason in a state of marital fidelity, a union of nature, society and Dharma. Violent passion shakes you up. You would not be at peace in your own comfortable bed: no sleep. The arrow of love which is devouring ferociously, with that I pierce and dig into your heart.

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    Subject

    Kamesu - Sex

    Translation

    May the exciter, excite you. May you rest in your bed. With the sexual passioned arrow, which is terrible, I pierce you in the heart.

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    Translation

    O’ ye married couple; you do not rest calm and quiet even on the bed when the shaft of the most stimulant passion impels you. Formidable is the shaft of Passion and pierce you, husband; with this in the heart.

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    Translation

    O ignorance, let a learned man dispel thee. Rest not in peace in the heart, thy bed. Terrible is the shaft of the desire for knowledge, therewith I pierce thee to the heart.

    Footnote

    I refers to a learned person.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

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