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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 18 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 18/ मन्त्र 1
    ऋषिः - शुक्रः देवता - अपामार्गो वनस्पतिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अपामार्ग सूक्त
    101

    स॒मं ज्योतिः॒ सूर्ये॒णाह्ना॒ रात्री॑ स॒माव॑ती। कृ॑णोमि स॒त्यमू॒तये॑ऽर॒साः स॑न्तु॒ कृत्व॑रीः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स॒मम् । ज्योति॑: । सूर्ये॑ण । अह्ना॑ । रात्री॑ । स॒मऽव॑ती । कृ॒णोमि॑। स॒त्यम् । ऊ॒तये॑ । अ॒र॒सा: । स॒न्तु॒ । कृत्व॑री: ॥१८.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    समं ज्योतिः सूर्येणाह्ना रात्री समावती। कृणोमि सत्यमूतयेऽरसाः सन्तु कृत्वरीः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    समम् । ज्योति: । सूर्येण । अह्ना । रात्री । समऽवती । कृणोमि। सत्यम् । ऊतये । अरसा: । सन्तु । कृत्वरी: ॥१८.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 18; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    राजा के धर्म का उपदेश।

    पदार्थ

    (ज्योतिः) ज्योति (सूर्येण समम्) सूर्य के साथ-साथ और (रात्री) रात्री (अह्ना समावती) दिन के साथ वर्तमान है, [ऐसे ही] मैं (सत्यम्) सत्यकर्म को (ऊतये) रक्षा के लिये (कृणोमि) करता हूँ (कृत्वरीः= कृत्वर्यः) कतरनेवाली विपत्तियाँ (अरसाः) नीरस (सन्तु) हो जावें ॥१॥

    भावार्थ

    जैसे प्रकाश के साथ सूर्य का और दिन के साथ रात्री का नित्य सम्बन्ध है, ऐसे ही मनुष्य का सत्य के साथ नित्य सम्बन्ध है। इससे राजा और प्रजा सदा सत्य में प्रवृत्त होकर मिथ्या कामों की विपत्तियों से बचें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(समम्) सह वर्तमानम् (ज्योतिः) प्रभामण्डलम् (सूर्येण) आदित्येन (अह्ना) दिवसेन (रात्री) अ० २।८।२। निशा (समावती) सम-मतुप्। छान्दसो दीर्घः। समं समानं वर्तमाना (कृणोमि) करोमि (सत्यम्) यथार्थं कर्म (ऊतये) रक्षणार्थम् (अरसाः) निर्बलाः (सन्तु) भवन्तु (कृत्वरीः) इण्नशजिसर्त्तिभ्यः क्वरप्। पा० ३।२।१६३। इति कृती छेदने-क्वरप्। टिड्ढाणञ्०। पा० ४।१।१५। इति ङीप्। पूर्वसवर्णदीर्घः। कर्तनशीलाः। विपत्तयः। बाधाः ॥

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    विषय

    सत्यपालन व अहिंसा

    पदार्थ

    १. (सूर्येण) = सूर्य के साथ (ज्योतिः) = उसका प्रभामण्डल (समम्) = समान ही होता है। यह प्रभामण्डल सूर्य से कभी पृथक् नहीं होता और (रात्री) = रात (अह्रा) = दिन के साथ (समावती) = समान आयामवाली होती है। वस्तुत: रात्रि दिन के साथ जुड़ी हुई है। जहाँ दिन है, रात्रि उसके साथ है ही, जैसे ज्योति सूर्य से कभी अलग नहीं होती, जैसे रात्रि दिन के साथ जुड़ी हुई है, इसीप्रकार मैं अपने साथ (सत्यं कृणोमि) = सत्य को जोड़ता हूँ। यह सत्य (ऊतये) = मेरे रक्षण के लिए होता है। मेरे जीवन के साथ सत्य का इसप्रकार सम्बन्ध होने पर (कृत्वरी:) = कर्तनशील कृत्याएँ-सब हिंसाएँ (अरसा:सन्तु) = रसशून्य, शुष्क व व्यर्थ हो जाएँ। सत्यशील होने पर मुझे किसी प्रकार से भी हिंसित नहीं होना पड़ता।

    भावार्थ

    मैं जीवन में सत्य का इसप्रकार सम्बन्ध स्थापित करता है, जैसा ज्योति का सुर्य के साथ सम्बन्ध है और रात्रि का दिन के। यह सत्य का सम्बन्ध मुझे हिंसित नहीं होने देता।

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    भाषार्थ

    (सूर्येण) सूर्य के (समम्) समान (ज्योतिः) ज्योति [तेरे लिए] हो, (रात्री) रात्रि (अह्ना) दिन के (सम्) साथ मिलकर (आवती१) सब प्रकार से तेरी रक्षिका हो। (ऊतये) रक्षा के लिए (सत्यम्) सत्यकर्म (कृणोमि) मैं तेरे लिए निर्दिष्ट करता हूं, (कृत्वरी:) इससे नाशकारिणी प्रवृत्तियाँ (अरसा सन्तु) रसरहित हो जायें, अर्थात् सूख जायें, असमर्थ हो जायें।

    टिप्पणी

    [१. आवती=आ+अवती=अध् (रक्षणे+शतृ प्रत्यय+ ङीप्)।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Apamarga Panacea

    Meaning

    Light is naturally one with the sun. Night is naturally close with the day, (the one implies the other). Similarly, I naturally follow the truth for peace, protection and security (because truth and peace with security and protection go together). And when you equate truth and peace both in action, all counterfeits become void of meaning and value. This is the ethics of professionalism.

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    Subject

    Apamargah Vanaspatih

    Translation

    The light is constant with the sun. The night is constant with the day. I adopt truth for protection’s sake. May the perpetrators of violence become impotent. (yatudhana = low people, engaged in violence ; their wife yatudhani)

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    Translation

    The light equaleth Sun and the might has its connection with day. I stick on to truth for the safety of the people. Let all the evil designs be ineffectual.

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    Translation

    Just as luster always accompanies the sun, just as might is always connected with day, so I always reveal the Truth for the safeguard of humanity, whereby evil usages become impotent.

    Footnote

    I: God, Truth—the Vedas.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(समम्) सह वर्तमानम् (ज्योतिः) प्रभामण्डलम् (सूर्येण) आदित्येन (अह्ना) दिवसेन (रात्री) अ० २।८।२। निशा (समावती) सम-मतुप्। छान्दसो दीर्घः। समं समानं वर्तमाना (कृणोमि) करोमि (सत्यम्) यथार्थं कर्म (ऊतये) रक्षणार्थम् (अरसाः) निर्बलाः (सन्तु) भवन्तु (कृत्वरीः) इण्नशजिसर्त्तिभ्यः क्वरप्। पा० ३।२।१६३। इति कृती छेदने-क्वरप्। टिड्ढाणञ्०। पा० ४।१।१५। इति ङीप्। पूर्वसवर्णदीर्घः। कर्तनशीलाः। विपत्तयः। बाधाः ॥

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