अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 27/ मन्त्र 3
पयो॑ धेनू॒नां रस॒मोष॑धीनां ज॒वमर्व॑तां कवयो॒ य इन्व॑थ। श॒ग्मा भ॑वन्तु म॒रुतो॑ नः स्यो॒नास्ते नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥
स्वर सहित पद पाठपय॑: । धे॒नू॒नाम् । रस॑म् । ओष॑धीनाम् । ज॒वम् । अर्व॑ताम् । क॒व॒य॒: । ये । इन्व॑थ । श॒ग्मा । भ॒व॒न्तु॒ । म॒रुत॑: । न॒: । स्यो॒ना: । ते । न॒: । मु॒ञ्च॒न्तु॒ । अंह॑स: ॥२७.३॥
स्वर रहित मन्त्र
पयो धेनूनां रसमोषधीनां जवमर्वतां कवयो य इन्वथ। शग्मा भवन्तु मरुतो नः स्योनास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥
स्वर रहित पद पाठपय: । धेनूनाम् । रसम् । ओषधीनाम् । जवम् । अर्वताम् । कवय: । ये । इन्वथ । शग्मा । भवन्तु । मरुत: । न: । स्योना: । ते । न: । मुञ्चन्तु । अंहस: ॥२७.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
पवन के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(ये) जो तुम (कवयः) चलने फिरनेवाले अथवा सुखानेवाले [मरुत् देवता] (धेनूनाम्) गौओं का (प्रयः) दूध, (ओषधीनाम्) अन्न आदि ओषधियों का (रसम्) रस और (अर्वताम्) घोड़ों का (जवम्) वेग (इन्वथ) भर देते हो। (शग्माः) शक्तिवाले (मरुतः) वे आप दोषनाशक वायुगण (नः) हमारे लिये (स्योनाः) सुखदायक (भवन्तु) होवें। (ते) वे (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥३॥
भावार्थ
प्राण अपान आदि द्वारा सब पदार्थों में शक्ति पहुँचती है। उन वायुप्रवाहों का ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य सदा प्रसन्न रहें ॥३॥
टिप्पणी
३−(पयः) दुग्धम् (धेनूनाम्) अ० २।५।६। दुग्धं पावयित्रीणां गवाम् (रसम्) सारम् (ओषधीनाम्) अन्नादीनाम् (जवम्) ॠदोरप्। पा० ३।३।५७। इति जु वेगे-अप्। वेगम् (अर्वताम्) अ० ४।९।२। अश्वानाम् (कवयः) कुङ् गतिशोषणयोः-इन्। कवते गतिकर्मा-निघ० २।१४। गन्तारः। शोषयितारः (ये) यूयं मरुता (इन्वथः) इवि व्याप्तौ। इदित्वान्नुम्। व्यापयथ। स्थापयथ (शग्माः) अर्तिस्तुसुहु०। उ० १।१४०। इति शक्लृ-मन्। शक्तारः। समर्थाः (भवन्तु) (मरुतः) वायवः (नः) अस्मभ्यम् (स्योनाः) सुखकराः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
विषय
'शग्माः स्योनाः' मरुतः
पदार्थ
१. मरुत् प्राण हैं। इनकी साधना से बुद्धि की तीव्रता व ज्ञान-दीसि प्रास होती है, इसलिए इन्हें यहाँ 'कवयः' कहा गया है। हे (कवयः मरुतः) = क्रान्तदर्शित्व के साधनभूत प्राणो ! (ये) = जो आप (धेनूनां पयः) = गौओं के दूध को तथा (ओषधीनां रसः) = ओषधियों के रस को और परिणामतः (अर्वताम्) = इन्द्रिय-अश्वों के (जवम्) = वेग को, स्फूर्ति से कार्य करने की शक्ति को (इन्वथ) = अपने सब अंगों में व्याप्त करते हो। २. वे मरुत् (न:) = हमारे लिए (शरमा:) = शक्ति देनेवाले तथा (स्योना) = सुख प्राप्त करानेवाले (भवन्तु) = हों। इसप्रकार (ते) = वे (न:) = हमें (अहंसः) = पाप से (मुञ्चन्तु) = मुक्त करें।
भावार्थ
हम प्राणसाधना करते हुए गोदुग्ध व ओषधियों का ही सेवन करें। इससे हमारे इन्द्रियाश्व स्फूर्तियुक्त होंगे। ये प्राण हमें शक्ति व सुख प्राप्त कराएँ। इसप्रकार ये हमें पापमुक्त करें।
भाषार्थ
है मानसून वायुओं! (ये) जो (कवयः) शब्दायमान तुम (धेनूनाम्, पयः) दुधार गौओं के दूध को, (ओषधीनाम्, रसम्) ओषधियों के रस को, (अर्वताम्, जवम्) अश्वों के वेग को (इन्वथ) उनमें व्याप्त करते हो; (मरुतः) वे मानसून वायुएँ (नः) हमें (शग्माः) शान्ति पहुँचाने वाली तथा (स्योनाः) सुखकारी (भवन्तु) हों, (ते) वे तुम दोनों (न:) हमें (अंहसः) पापजन्य कष्ट से (मुञ्चतम्) छुड़ाएँ।
टिप्पणी
[कवयः=कुङ् शब्दे (भ्वादिः)। शीघ्र प्रवाही मानसून वायुएँ स्वयं भी शब्द करती, तथा मेघरूप में स्थित हुई गर्जनाएँ भी करती हैं; और वर्षा द्वारा घास-चारा के सेवन से गौओं में दूध, ओषधियों में रस, तथा अश्वों में वेग भी पैदा होते हैं। इन्वथ= इवि व्याप्तौ (भ्वादिः)।]
विषय
पापमोचन की प्रार्थना।
भावार्थ
वे आप (मरुतः) विद्वद्गण या रक्षकजन (शग्माः) शक्तिमान् होकर (नः) हमारे लिये (स्योनाः) सुखकारी हों, जो (धेनूनां) गौओं के (पयः) दूध को, (ओषधीनां रसम्) ओषधियों के रस को और (अर्वताम्) घोड़ों के (जवम्) वेग को (कवयः) क्रान्तदर्शी तत्वज्ञानी होकर (इन्वथ) स्वयं प्राप्त करते, वश करते, एवं उपयोग करते हैं। (ते नः अंहसः मुञ्चन्तु) वे हमें पापों और कष्ट से बचावें। वायुपक्ष में—जो वायुएं (धेनूनां पयः) गोओं और सूर्य-रश्मियों में दूध और जल को लातीं, (ओषधीनां रसम्) ओषधियों में रस उत्पन्न करतीं, (अर्वतां जवम्) अश्व आदि पशुओं में वेग और स्वस्थता को उत्पन्न करतीं हैं वे हमें सुखकारी हों, वे हमें कष्ट से बचावें। अध्यात्म में—धेनु = ज्ञानेन्द्रिय, ओषधि = केशलोम, अर्वन्तः = कर्मेन्द्रियां और मरुतः प्राणगण।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मृगार ऋषिः। नाना देवताः। पञ्चमं मृगारसूक्तम्। १-७ त्रिष्टुभः। सप्तर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Freedom from Sin
Meaning
Poetic powers and forces of creative vision and self-control who increase, invigorate and intensify the milk of cows, sap of herbs and the speed and impulse of the powers of progress, may the Maruts, we pray, be kind and gracious to us and save us from sin and sufferance.
Translation
You, O omnivisioned ones (kavayah), who pervade the milk of the cows, the sap of the plants and the speed of the coursers, the maruts, bestowers of strength, may be gracious to us. As such, may they free us from sin.
Translation
These are the Maruts which possessing transparency fills up milk in milch-Kines, sap in herbs and speed in horses. May these powerful Maruts be auspicious for us. May they become the sources of delivering us from grief and troubles.
Translation
May the powerful learned persons be auspicious to us, who, the knowers of truth, invigorate the milk of milch-kine, the sap of growing plants, the speed of coursers. May they deliver us from sin.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(पयः) दुग्धम् (धेनूनाम्) अ० २।५।६। दुग्धं पावयित्रीणां गवाम् (रसम्) सारम् (ओषधीनाम्) अन्नादीनाम् (जवम्) ॠदोरप्। पा० ३।३।५७। इति जु वेगे-अप्। वेगम् (अर्वताम्) अ० ४।९।२। अश्वानाम् (कवयः) कुङ् गतिशोषणयोः-इन्। कवते गतिकर्मा-निघ० २।१४। गन्तारः। शोषयितारः (ये) यूयं मरुता (इन्वथः) इवि व्याप्तौ। इदित्वान्नुम्। व्यापयथ। स्थापयथ (शग्माः) अर्तिस्तुसुहु०। उ० १।१४०। इति शक्लृ-मन्। शक्तारः। समर्थाः (भवन्तु) (मरुतः) वायवः (नः) अस्मभ्यम् (स्योनाः) सुखकराः। अन्यत् पूर्ववत् ॥
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