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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 27 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 27/ मन्त्र 7
    ऋषिः - मृगारः देवता - मरुद्गणः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - पापमोचन सूक्त
    103

    ति॒ग्ममनी॑कं विदि॒तं सह॑स्व॒न्मारु॑तं॒ शर्धः॒ पृत॑नासू॒ग्रम्। स्तौमि॑ म॒रुतो॑ नाथि॒तो जो॑हवीमि॒ ते नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    ति॒ग्मम् । अनी॑कम् । वि॒दि॒तम् । सह॑स्वत् । मारु॑तम् । शर्ध॑: । पृत॑नासु । उ॒ग्रम् । स्तौमि॑ । म॒रुत॑: । ना॒थि॒त: । जो॒ह॒वी॒मि॒ । ते । न॒: । मु॒ञ्च॒न्तु॒ । अंह॑स: ॥२७.७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तिग्ममनीकं विदितं सहस्वन्मारुतं शर्धः पृतनासूग्रम्। स्तौमि मरुतो नाथितो जोहवीमि ते नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तिग्मम् । अनीकम् । विदितम् । सहस्वत् । मारुतम् । शर्ध: । पृतनासु । उग्रम् । स्तौमि । मरुत: । नाथित: । जोहवीमि । ते । न: । मुञ्चन्तु । अंहस: ॥२७.७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 27; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    पवन के गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (मारुतम्) दोषनाशक वायुगणों का (अनीकम्) सेनादल और (शर्धः) बल (पृतनासु) संग्रामों में (तिग्मम्) तीक्ष्ण, (सहस्वत्) बड़ा साहसी और (उग्रम्) बड़ा प्रचण्ड (विदितम्) विदित है (नाथितः) अधीन मैं (मरुतः) वायुगणों को (स्तौमि) सराहता हूँ और (जोहवीमि) बारंबार पुकारता हूँ। (ते) वे (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चन्तु) छुड़ावें ॥७॥

    भावार्थ

    जो साहसी शूरवीर संग्रामों में अपने श्वास-प्रश्वास को सावधान रखके वायु का यथावत् प्रयोग करते हैं, वे विजयी होकर आनन्द भोगते हैं ॥७॥

    टिप्पणी

    ७−(तिग्मम्) युजिरुजितिजां कुश्च। उ० १।१४६। इति तिज निशाने-मक्, कुत्वं च। तीक्ष्णम् (अनीकम्) अनिहृषिभ्यां किच्च। उ० ४।१७। इति अन प्राणने-ईकन्। सैन्यम् (विदितम्) प्रख्यातम् (सहस्वत्) बलवत् (मारुतम्) मरुतां सम्बन्धि (शर्धः) शर्द्धतिरुत्साहार्थः-असुन्। इति देवराजयज्वा निघण्टुटीकायाम्। बलम् निघ० २।९। (पृतनासु) अ० ३।२१।३। संग्रामेषु (उग्रम्) प्रचण्डम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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    विषय

    उग्रं शर्ध:

    पदार्थ

    १. (मारुतम्) = प्राणों का (अनीकम्) = बल (तिग्मम्) = बड़ा तीन है। यह (सहस्वत् विदितम्) = शत्रुओं का मर्षण करनेवाला माना गया है। प्राणसाधना से शरीर में रोगकृमिरूप सब शत्रुओं का नाश होता है तो मानसक्षेत्र में वासनारूप शत्रुओं का मर्षण होता है। यह (शर्ध:) = प्राणों का बल (पृतनास उनम्) = संग्रामों में बड़ा उद्गुर्ण-शत्रुओं का नाशक है। २. मैं इन (मरुतः) = प्राणों की (स्तौमि) = स्तुति करता हूँ, (नाथित:) = कष्टों से सन्तप्त हुआ-हुआ (जोहवीमि) = इन प्राणों को ही पुकारता हूँ। (ते) = वे प्राण (न:) = हमें (अंहसः) = पाप से (मुञ्चन्तु) = मुक्त करें।

    भावार्थ

    प्राणों का बल बड़ा प्रचण्ड है। यह रोगकृमियों व वासनाओं को नष्ट करके हमें व्याधि व आधि के कष्टों से बचाता है। हम इन प्राणों का स्तवन करते हैं। ये हमें पाप से मुक्त करें।

    अगले सूक्त का ऋषि भी 'मृगार' है -

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    भाषार्थ

    (पृतनासु) संग्रामों में (विदितम्) प्रख्यात (अनीकम्१) सैन्य (शर्धः) वल के सदृश, (मारुतम्) मानसून वायुओं का (शर्धः) बल (तिग्मम्) तीक्ष्ण (सहस्वत्) पराभववाला, (उग्रम्) तथा उग्र होता है; (नाथितः) परमेश्वररूपी स्वामीवाला मैं (मरुत:) मानसून वायुओं की (स्तौमि) स्तुति करता हूँ, उनके गुणों का कथन करता हूँ, (जोहवीमि) और परमेश्वर का बार-बार आह्वान करता हूं। [ताकि उसकी कृपा से], (ते) वे मरुत: (न:) हमें (अंहस:) पापजन्य दुःखों और कष्टों से (मुञ्चन्तु) मुक्त करें। दुःख, कष्ट (देखो मन्त्र ६ की व्याख्या)

    टिप्पणी

    [१. सैन्यम् वा (उणा० ४।१८); दयानन्द।]

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    विषय

    पापमोचन की प्रार्थना।

    भावार्थ

    (मारुतम्) मरुत्गण की न्याई विद्वगुण या रक्षकगण का बल (अनीकम्) सैनिकबल की न्याई (तिग्मम्) तीक्ष्ण और (सहस्वत्) सहनशील, विजयकारी (विदितम्) सर्वो को ज्ञात है। जिस प्रकार (पृतनासु) सेनाओं में (मारुतम्) सेनापतियों का (उग्रम् शर्धः) भयंकर यह सर्वविदित है। इस कारण (नाथितः) मैं दुखी पुरुष, विद्वद्गण या रक्षकों के (स्तौमि) गुणों की स्तुति करता हूं और (जोहवीमि) उनका स्मरण करता हूं। (ते नः अंहसः मुञ्चन्तु) वे हमें पाप, कष्ट से मुक्त करें।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    मृगार ऋषिः। नाना देवताः। पञ्चमं मृगारसूक्तम्। १-७ त्रिष्टुभः। सप्तर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Freedom from Sin

    Meaning

    The creative vision, power and potential of the Maruts, sharp, war-like, patient yet challenging, penetrative and pioneering in the struggle of life, is realised and known. Prayerful, suppliant, weak but not fallen and alienated, I invoke the Maruts, celebrate and call upon them, may they save us from sin, sufferance and distress, and help us march on.

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    Translation

    The fierce army of maruts (storm-troopers) is well-known as overpowering, mighty and formidable against invaders. I praise the maruts. Being a suppliant, I invoke them again and again. As such, may they free us from sin.

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    Translation

    The power of Maruts, in the worldly battles is acrid, wonderous, distinct, impetuous and exceedingly mighty. I equipped with strength praise and describe frequently the properties of Maruts. May they become the sources of our deliverances from grief and troubles.

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    Translation

    The impetuous, conquering military force of the learned is known to all, as is known the dreadful force of the commanders in the army. I, suppliant praise and oft invoke the learned. May they deliver us from sin.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ७−(तिग्मम्) युजिरुजितिजां कुश्च। उ० १।१४६। इति तिज निशाने-मक्, कुत्वं च। तीक्ष्णम् (अनीकम्) अनिहृषिभ्यां किच्च। उ० ४।१७। इति अन प्राणने-ईकन्। सैन्यम् (विदितम्) प्रख्यातम् (सहस्वत्) बलवत् (मारुतम्) मरुतां सम्बन्धि (शर्धः) शर्द्धतिरुत्साहार्थः-असुन्। इति देवराजयज्वा निघण्टुटीकायाम्। बलम् निघ० २।९। (पृतनासु) अ० ३।२१।३। संग्रामेषु (उग्रम्) प्रचण्डम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥

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