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अथर्ववेद के काण्ड - 4 के सूक्त 5 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 5/ मन्त्र 3
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - वृषभः, स्वापनम् छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - स्वापन सूक्त
    87

    प्रो॑ष्ठेश॒यास्त॑ल्पेश॒या नारी॒र्या व॑ह्य॒शीव॑रीः। स्त्रियो॒ याः पुण्य॑गन्धय॒स्ताः सर्वाः॑ स्वापयामसि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्रो॒ष्ठे॒ऽश॒या: । त॒ल्पे॒ऽश॒या: । नारी॑: । या: । व॒ह्य॒ऽशीव॑री: । स्रिय॑: । या: । पुण्य॑ऽगन्धय: । ता: । सर्वा॑: । स्वा॒प॒या॒म॒सि॒ ॥५.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्रोष्ठेशयास्तल्पेशया नारीर्या वह्यशीवरीः। स्त्रियो याः पुण्यगन्धयस्ताः सर्वाः स्वापयामसि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्रोष्ठेऽशया: । तल्पेऽशया: । नारी: । या: । वह्यऽशीवरी: । स्रिय: । या: । पुण्यऽगन्धय: । ता: । सर्वा: । स्वापयामसि ॥५.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 4; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    बच्चों के सुलाने का गीत अर्थात् लोरी।

    पदार्थ

    (प्रोष्ठेशयाः) बड़े घर वा बड़े आंगन में सोनेवाली, (तल्पेशयाः) खाटों पर सोनेवाली, और (वह्यशीवरीः=०-र्यः) हिंडोला आदि में सोनेवाली (याः) जो (नारीः=नार्यः) नारियाँ हैं, और (याः) जो (स्त्रियः) स्त्रियाँ (पुण्यगन्धयः) पुण्य गतिवाली हैं, (ताः सर्वाः) उन सबको (स्वापयामसि=०-मः) हम सुलाते हैं ॥३॥

    भावार्थ

    गृहस्थ लोग स्त्रियों के रहने के घर ऐसे उत्तम बनावें, जिससे रात्री को वे सुखपूर्वक सोया करें ॥३॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋ० ७।५५।८ में है ॥

    टिप्पणी

    ३−(प्रोष्ठेशयाः) उषिकुषिगर्त्तिभ्यस्थन्। उ० २।४। इति उष दाहे-थन्। इति ओष्ठः। एङि पररूपम्। पा० ६।१।९४। अत्र वार्त्तिकम्। ओत्वोष्ठयोः समासे वा। इति पररूपम्। अधिकरणे शेतेः। पा० ३।२।१५। इति प्रोष्ठे+शीङ् शयने-अच्। शयवासवासिष्वकालात्। पा० ६।३।१८। इति सप्तम्या अलुक्। प्रोष्ठे अतिशयेन प्रौढे गृहे प्राङ्गणे वा शयानाः (तल्पेशयाः) खष्पशिल्पशष्प०। उ० ३।२८। इति तल प्रतिष्ठायाम्-प प्रत्ययः। शेषे पूर्ववत् सिद्धिः। खट्वासु शयानाः। (नारीः) नार्यः। (वह्यशीवरीः) वह्यं करणम्। पा० ३।१।१०२। इति वह प्रापणे-यत्। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। इति वह्य+शीङ्-क्वनिप्। वनो र च। पा० ४।१।७। इति ङीब्रेफौ। वा छन्दसि। पा० ६।१।१०१। इति जसि पूर्वसवर्णदीर्घः। वह्ये वहनसाधने आन्दोलिकादौ शयनस्वभावाः (पुण्यगन्धयः) पूञो यण् णुग्घ्रस्वश्च। उ० ५।१५। इति पूञ् शोधे-यत्, णुक् च। सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। इति गन्ध गतिहिंसायाचनेषु-इन्। पुण्यं पवित्रं गन्धिगमनं यासां ताः पवित्रगतयः। अन्यद् गतम् ॥

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    विषय

    स्त्रियों की निभीक निद्रा

    पदार्थ

    १. अवस्था-भेद के अनुसार कोई नारी कहीं सोई है और कोई कहीं। (प्रोष्ठेशया:) = [प्रोष्ठ] जो दस-बारह वर्ष की कुमारियाँ छोटे-छोटे फलकों पर सोई हैं। (तल्पेशया:) = जो युवतियाँ खाटों पर सो रही हैं, (याः नारी:) = जो स्त्रियों अभी बहुत छोटी अवस्था में होने से (बहाशीवरी:) = आन्दोलिका-हिंडोले में ही सो रही हैं तथा (या:) = जो (पुण्यगन्धयः) = पुण्यगन्धवाली (स्त्रिय:) = विवाहित स्त्रियाँ हैं, (ताः सर्वाः) = उन सबको (स्वापयामसि) = हम सुलाते हैं।

    भावार्थ

    घरों में स्त्रियों का कमरा इसप्रकार सुरक्षित हो कि वे निश्चिन्त होकर सो सकें। यह निश्चिन्तता की निद्रा उन्हें स्वस्थ बनाएगी और वे घर को बड़ा उत्तम बना सकेंगी।

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    भाषार्थ

    (प्रोष्ठेशया:) प्राङ्गण में या बेंच पर सोयी हुई (तल्पेशया:) पलङ्ग में सोयी हुई, (बह्मशीवरीः) पंगूड़े में सोयी हुई (याः नारी:) जो नारियां हैं; (याः स्त्रिय:) और जो स्त्रियां (पुण्यगन्धय:) पुण्य कर्मों के कारण पुण्य गन्धवाली है, (ताः सर्वा:) उन सबको (स्वापयामसि) प्रभातवेला तक हम सुलाये रखते हैं। [पुण्यगन्धय: के लिए अपवाद है (मन्त्र ६)]

    टिप्पणी

    [प्रोष्ठ=Bench (आप्टे), बेंच। प्रोष्ठ=प्राङ्कण =सम्भवत: प्राङ्गण (सायण)। ये स्त्रियां पुण्यकर्मा हैं, धर्मपरायणा हैं।]

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    विषय

    निद्रा विज्ञान।

    भावार्थ

    शयन काल में हम अपनी इन्द्रियों को कैसे सुला देते हैं। जो स्त्रियां (प्रोष्ठे-शयाः) झूले में सोने की अभ्यासी हैं, जों (तल्पेशयाः) सेज पर सोने वाली है, और (याः नारीः) जो स्त्रियां (वह्य-शेवरीः) गमन के साधन, पालकी आदि में सोने वाली हैं और (याः स्त्रियः) जो स्त्रियां (पुण्य-गन्धयः) पुण्य, पवित्र गन्ध वाली हैं (ताः सर्वाः) उन सब को (स्वापयामसि) रात्रि के काल में सुला दे। अध्यात्म पक्ष में—इन्द्रियों के ही ४ प्रकार के भेद किये हैं। १ प्रोष्ठेशया नाड़ी अर्थात् मुख भाग में रहने वाली वाणी, २ तल्पेशया नाड़ी, जो सोते समय बिस्तर से सट जाती है जैसे त्वचा पीठ आदि, ३ वह्यशीवरी, जो पैरों में विद्यमान है, ४ पुण्यगन्धि = ज्ञानेन्द्रियें ये सब उस आत्मा के बल पर उसी में आश्रित होकर सो जाती हैं। अथवा नारी-नाड़ियां हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्मा ऋषिः। स्वपनः ऋषभो वा देवता। १, ३-६ अनुष्टुभः। २ भुरिक्। ७ पुरुस्ताज्ज्योतिस्त्रिष्टुप्। सप्तर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Sleep

    Meaning

    Whether a woman is to sleep on an open platform or in an out house, or they sleep on the top storey in a comfortable bed, or they are moving and have to sleep in the vehicle itself, or they are women used to perfumes of high quality, we help them all to sleep well.

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    Translation

    The women, who sleep in the courtyard, who sleep on beds, or who sleep on swings; the women who are pure fragrances, all of them we hereby put to sleep.(Cf. Rg. VII.5.8)

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    Translation

    Let us make rest and sleep all those women who sleep in cradle, who sleep on cot, who sleep in palanquin, and who are fragrant with perfumes.

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    Translation

    We lull to sleep the women, wont to sleep in the court, on a couch, or in a palanquin, and the matrons of good behavior.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(प्रोष्ठेशयाः) उषिकुषिगर्त्तिभ्यस्थन्। उ० २।४। इति उष दाहे-थन्। इति ओष्ठः। एङि पररूपम्। पा० ६।१।९४। अत्र वार्त्तिकम्। ओत्वोष्ठयोः समासे वा। इति पररूपम्। अधिकरणे शेतेः। पा० ३।२।१५। इति प्रोष्ठे+शीङ् शयने-अच्। शयवासवासिष्वकालात्। पा० ६।३।१८। इति सप्तम्या अलुक्। प्रोष्ठे अतिशयेन प्रौढे गृहे प्राङ्गणे वा शयानाः (तल्पेशयाः) खष्पशिल्पशष्प०। उ० ३।२८। इति तल प्रतिष्ठायाम्-प प्रत्ययः। शेषे पूर्ववत् सिद्धिः। खट्वासु शयानाः। (नारीः) नार्यः। (वह्यशीवरीः) वह्यं करणम्। पा० ३।१।१०२। इति वह प्रापणे-यत्। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। इति वह्य+शीङ्-क्वनिप्। वनो र च। पा० ४।१।७। इति ङीब्रेफौ। वा छन्दसि। पा० ६।१।१०१। इति जसि पूर्वसवर्णदीर्घः। वह्ये वहनसाधने आन्दोलिकादौ शयनस्वभावाः (पुण्यगन्धयः) पूञो यण् णुग्घ्रस्वश्च। उ० ५।१५। इति पूञ् शोधे-यत्, णुक् च। सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। इति गन्ध गतिहिंसायाचनेषु-इन्। पुण्यं पवित्रं गन्धिगमनं यासां ताः पवित्रगतयः। अन्यद् गतम् ॥

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