अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 7/ मन्त्र 3
ऋषिः - गरुत्मान्
देवता - वनस्पतिः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - विषनाशन सूक्त
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क॑र॒म्भं कृ॒त्वा ति॒र्यं॑ पीबस्पा॒कमु॑दार॒थिम्। क्षु॒धा किल॑ त्वा दुष्टनो जक्षि॒वान्त्स न रू॑रुपः ॥
स्वर सहित पद पाठक॒र॒म्भम् । कृ॒त्वा । ति॒र्य᳡म् । पी॒ब॒:ऽपा॒कम् । उ॒दा॒र॒थिम् । क्षु॒धा । किल॑ । त्वा॒ । दु॒स्त॒नो॒ इति॑ दु:ऽतनो । ज॒क्षि॒ऽवान् । स: । न । रू॒रु॒प॒: ॥७.३॥
स्वर रहित मन्त्र
करम्भं कृत्वा तिर्यं पीबस्पाकमुदारथिम्। क्षुधा किल त्वा दुष्टनो जक्षिवान्त्स न रूरुपः ॥
स्वर रहित पद पाठकरम्भम् । कृत्वा । तिर्यम् । पीब:ऽपाकम् । उदारथिम् । क्षुधा । किल । त्वा । दुस्तनो इति दु:ऽतनो । जक्षिऽवान् । स: । न । रूरुप: ॥७.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
विष नाश करने का उपदेश।
पदार्थ
(दुष्टनो) हे शरीर के दुःखदायक [विष !] (किल) तिरस्कार के साथ (त्वा) तेरे लिये [तेरे हटाने के लिये] (तिर्यम्) रोग जीतने में समर्थ, (पीबस्पाकम्) मुटाई वा चर्बी रोग पचानेवाले और (उदारथिम्) जाठर अग्नि बढ़ानेवाले (करम्भम्) जलसेचन [वा दही सत्तुओं] को (कृत्वा) बनाकर (क्षुधा) भूख के कारण (जक्षिवान्=यः जक्षिवान् तम्) जिसने खा लिया, उसको (सः=स त्वम्) उस तूने (न) नहीं (रूरुपः) मूर्छित किया है ॥३॥
भावार्थ
जलसेचन और सत्तुओं के सेवन से विषैले रोगों का नाश होता है ॥३॥
टिप्पणी
३−(करम्भम्) म० २। जलसेचनम्। दधिसक्तून् (कृत्वा) विधाय (तिर्यम्) सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति तॄ प्लवनतरणयोः-असुन्। गुणविषये इर्। तरतीति तिरः। तत्र साधुः। पा० ४।४।९८। इति यत्। अव्ययानां च०। वा० पा० ६।४।१४४। इति टिलोपः। तरणे रोगजये समर्थम्। रोगतिरस्कारे कुशलम् (पीवस्पाकम्) सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति पीव स्थौल्ये-असुन्। पचे करणे-घञ्। पीवः स्थौल्यं मेदो वा रोगविशेषः पच्यते येन तम् (उदारथिम्) उद्यर्त्तेश्चित्। उ० ४।८८। इति उत्+ऋ गतौ-घथिन्। छान्दसो दीर्घः। उदरथिम्। उद्गमयितारम् जाठराग्नेरुद्दीपयितारम् (क्षुधा) बुभुक्षया (किल) तिरस्कारेण। निश्चयेन (त्वा) सुपां सुपो भवन्ति। वा० पा० ७।१।३९। इति चतुर्थ्यर्थे द्वितीया, त्वदर्थम्। तव निवारणायेत्यर्थः (दुष्टनो) दुर्-तनो। हे शरीरदूषक ! (जक्षिवान्) अदेर्लिटः लिट्यन्यतरस्याम्। पा० २।४।४०। इति घस्लृ आदेशः। वस्वेकाजाद्घसाम्। पा० ७।२।६७। इति इटि कृतं उपधालोपे स्थानिवद्भावाद् द्विर्वचनादि। भक्षितवान् यः पुरुषः, तम् इति शेषः (सः) स त्वम् (न) नहि (रूरुपः) रुप विमोहने। ण्यन्ताल् लुङि चङि रूपम् अडभावः। अरूरुपः। अमूमुहः। मूर्छितम् अकार्षीः ॥
विषय
'तिर्य, पीबस्पाक उदारथि' करम्भ
पदार्थ
१.(तिर्यम्) = विष के प्रभाव को तिरोहित करनेवाले, (पीबस्पाकम्) = चरबी का ठीक से पाचन कर देनेवाले (उदारथिम्) = विषप्रभाव को दूर करके इन्द्रियों की शक्तियों को प्रकाशयुक्त करनेवाले (करम्भं कृत्वा) = दधिमिश्रित सत्तुओं को बनाकर (क्षुधा) = भूख के अनुसार (किल जक्षिवान्) = निश्चय से इस पुरुष ने खाया है। २. हे (दुष्टनो) = शरीर को दूषित करनेवाले विष ! (त्वा) = तुझे लक्ष्य करके ही इस करम्भ का प्रयोग किया गया है। (स:) = वह तू इस करम्भ-प्रयोग को न (रुरूमः) = मूल [मूर्छित] नहीं बनता।
भावार्थ
दधिमिश्रित सत्तु विषप्रभाव को दूर करते हैं, शरीर में चरबी का ठीक से पाचन करते हैं, इन्द्रियों की शक्ति का वर्धन करके उन्हें प्रकाशमय करते हैं। इनका प्रयोग होने पर ये शरीर को विषमूढ़ नहीं होने देते। ये शरीर से विषैले प्रभाव को हटाते हैं।
भाषार्थ
(तिर्यम्) विष को तिरोहित करनेवाले, (पीवस्पाकम्) जल में पकाये गये, (उदाराथिम्=उदारथिनम्) युद्धार्थ उठे रथी-योद्धा के सदृश शक्तिशाली (करम्भम् कृत्वा) सत्तु को तैयार करके (त्वं) हे सत्तु ! तुझे (जक्षिवान्) जिसने खाया है (क्षुधा) भूख से; (सः) वह (न रूरूपः) नहीं विमोहित हुआ, मूर्छित हुआ [विष के प्रभाव से] (दुष्टनो) हे तनू को दूषित करनेवाले विष !
टिप्पणी
[विष है तो तनू को दूषित करनेवाला, परन्तु क्षुधा के कारण यदि विष, प्रभुतमात्रा में भी, खा लिया है, तो उक्त विधि द्वारा तय्यार किया करम्भ विषप्रभाव को निवारित कर देता है। तिर्यम्= "तिरः अन्तर्धौ" (अष्टा० १।४।७९), तिरोहित-निवारित करनेवाला करम्भ। पीवा= Water (आप्टे)।]
विषय
विष चिकित्सा का उपदेश।
भावार्थ
हे (दुःतनो) बुरी तरह से शरीर में फैलने वाले या शरीर को दुःख देने वाले विष ! यदि (पीवः-पाकम्) मेद तक को पका डालने वाले और (उद्- आरथिम्) शरीर को सुजा डालने वाले या बहुत अधिक पीड़ा के जनक (त्वा) तुझ विष को कोई पुरुष (क्षुधा) भूख से प्रेरित होकर, पेट भर कर भी खा जाय तो भी (तिर्यं) धान या चावलों का (करम्भम्) मिश्रण (कृत्वा) करके (जक्षिवान्) खाले तो (सः न रूरूपः) वह मूर्छित न हो। ‘करम्भ ओषधे भव पीवोब्रुक्क उदारथिः। वातापे पीव इद्भव’ इति ऋग्वेदे। अथवा पैप्पलादशाखा के पाठ के अनुसार—“करम्भं कृत्वा निर्पं पीवस्पाकमुदाहृतम्।“ ‘निरय’ नामक धान्य का चावल बना हुआ। ‘पीवस्पाक’ मेद बढ़ाने वाला पुष्टिकर कहा है। (दुष्टनो क्षुधा किल स्वा जक्षिवान्) हे दुस्तनो धान्य ! तुझको जो भूख से खा लेता है (सः न रूरूपः) वह विष से दूषित नहीं होता। ‘निरप’ नामक शालि के गुण— “निरपो मधुरः स्निग्धः शीतलो दाहपित्तजित्। त्रिदोषशमनो रुच्यः पथ्यः सर्वामयापनुत्।”
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गरुत्मान् ऋषिः। वनस्पतिर्देवता। १-३, ५-७ अनुष्टुभः, ४ स्वराट्। सप्तर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Antidote to Poison
Meaning
Having prepared karambha pudding with sesame and a lot of ghrta to stabilise and strengthen the stomach, if the patient eats the pudding according to appetite, then the poison spreading all over the body would not cause unconsciousness.
Translation
O vicious poison, that man has eaten you, the hidden one, digesting fat and causing intense pain, taking you for butter milk during hunger, may you not cause severe pain.
Translation
The man having poisonous effect, if agitated by acute hunger eats up the poison which makes the fat dry and causes inflammation in the body, may avoid away unconsciousness by using the mixture of the powder of rice.
Translation
O body tormenting poison, thou streamest the fat and swells up the body. If one eats thee in hunger, he will not certainly gripe, if he takes rice with curd!
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(करम्भम्) म० २। जलसेचनम्। दधिसक्तून् (कृत्वा) विधाय (तिर्यम्) सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति तॄ प्लवनतरणयोः-असुन्। गुणविषये इर्। तरतीति तिरः। तत्र साधुः। पा० ४।४।९८। इति यत्। अव्ययानां च०। वा० पा० ६।४।१४४। इति टिलोपः। तरणे रोगजये समर्थम्। रोगतिरस्कारे कुशलम् (पीवस्पाकम्) सर्वधातुभ्योऽसुन्। उ० ४।१८९। इति पीव स्थौल्ये-असुन्। पचे करणे-घञ्। पीवः स्थौल्यं मेदो वा रोगविशेषः पच्यते येन तम् (उदारथिम्) उद्यर्त्तेश्चित्। उ० ४।८८। इति उत्+ऋ गतौ-घथिन्। छान्दसो दीर्घः। उदरथिम्। उद्गमयितारम् जाठराग्नेरुद्दीपयितारम् (क्षुधा) बुभुक्षया (किल) तिरस्कारेण। निश्चयेन (त्वा) सुपां सुपो भवन्ति। वा० पा० ७।१।३९। इति चतुर्थ्यर्थे द्वितीया, त्वदर्थम्। तव निवारणायेत्यर्थः (दुष्टनो) दुर्-तनो। हे शरीरदूषक ! (जक्षिवान्) अदेर्लिटः लिट्यन्यतरस्याम्। पा० २।४।४०। इति घस्लृ आदेशः। वस्वेकाजाद्घसाम्। पा० ७।२।६७। इति इटि कृतं उपधालोपे स्थानिवद्भावाद् द्विर्वचनादि। भक्षितवान् यः पुरुषः, तम् इति शेषः (सः) स त्वम् (न) नहि (रूरुपः) रुप विमोहने। ण्यन्ताल् लुङि चङि रूपम् अडभावः। अरूरुपः। अमूमुहः। मूर्छितम् अकार्षीः ॥
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