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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 102 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 102/ मन्त्र 3
    ऋषि: - जमदग्नि देवता - अश्विनौ छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - अभिसांमनस्य सूक्त
    23

    आञ्ज॑नस्य म॒दुघ॑स्य॒ कुष्ठ॑स्य॒ नल॑दस्य च। तु॒रो भग॑स्य॒ हस्ता॑भ्यामनु॒रोध॑न॒मुद्भ॑रे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ॒ऽअञ्ज॑नस्य । म॒दुघ॑स्य । कुष्ठ॑स्य । नल॑दस्य । च॒ । तु॒र: । भग॑स्य । हस्ता॑भ्याम् । अ॒नु॒ऽरोध॑नम् । उत् । भ॒रे॒ ॥१०२.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आञ्जनस्य मदुघस्य कुष्ठस्य नलदस्य च। तुरो भगस्य हस्ताभ्यामनुरोधनमुद्भरे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आऽअञ्जनस्य । मदुघस्य । कुष्ठस्य । नलदस्य । च । तुर: । भगस्य । हस्ताभ्याम् । अनुऽरोधनम् । उत् । भरे ॥१०२.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 102; मन्त्र » 3
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    पदार्थ -
    (आञ्जनस्य) संसार के प्रकट करनेवाले, (मदुघस्य) आनन्द के सींचनेवाले, (कुष्ठस्य) गुण जाँचनेवाले, (नलदस्य) बन्धन काटनेवाले, (तुरः) शीघ्रकारी, (च) और (भगस्य) बड़े ऐश्वर्यवाले ब्रह्म के (अनुरोधनम्) यथावत् पूजन को (हस्ताभ्याम्) अपने दोनों हाथों [में बल] के लिये (उत्) उत्तम रीति से (भरे) मैं धारण करता हूँ ॥३॥

    भावार्थ - मनुष्य उस जगदीश्वर के अनन्त शुभगुणों का विचार करके प्रयत्नपूर्वक सदा प्रसन्न रहें ॥३॥ इति दशमोऽनुवाकः ॥ इति चतुर्दशः प्रपाठकः ॥


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    Meaning -
    By both hands, with both passion and judgement, I hold on to the love and spirit of the omnipresent lord of glory, faster than energy itself, creator of this beautiful world, giver of joy, all watching lord of judgement and dispensation, and the ultimate saviour, redeemer and destroyer of suffering.


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