अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 111/ मन्त्र 3
ऋषिः - अथर्वा
देवता - अग्निः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - उन्मत्ततामोचन सूक्त
59
दे॑वैन॒सादुन्म॑दित॒मुन्म॑त्तं॒ रक्ष॑स॒स्परि॑। कृ॑णोमि वि॒द्वान्भे॑ष॒जं य॒दानु॑न्मदि॒तोऽस॑ति ॥
स्वर सहित पद पाठदे॒व॒ऽए॒न॒सात् । उत्ऽम॑दितम् । उत्ऽम॑त्तम् । रक्ष॑स: । परि॑ । कृ॒णो॒मि॑ । वि॒द्वान् । भे॒ष॒जम् । य॒दा । अनु॑त्ऽमदित: । अस॑ति ॥१११.३॥
स्वर रहित मन्त्र
देवैनसादुन्मदितमुन्मत्तं रक्षसस्परि। कृणोमि विद्वान्भेषजं यदानुन्मदितोऽसति ॥
स्वर रहित पद पाठदेवऽएनसात् । उत्ऽमदितम् । उत्ऽमत्तम् । रक्षस: । परि । कृणोमि । विद्वान् । भेषजम् । यदा । अनुत्ऽमदित: । असति ॥१११.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
मानसविकार के नाश का उपदेश।
पदार्थ
(देवैनसात्) विद्वानों के लिये [किये] पाप से (उन्मदितम्) उन्मत्त, अथवा (रक्षसः) राक्षस [दुःखदायी जीव वा रोग] से (उन्मत्तम् परि) उन्मत्त पुरुष के लिये (विद्वान्) विद्वान् मैं (भेषजम्) औषध (कृणोमि) करता हूँ (यदा) जिस से वह (अनुन्मदितः) उन्मादरहित (असति) हो जावे ॥३॥
भावार्थ
मनुष्य दुःखों वा रोगों के कारणों को विचार कर उनकी निवृत्ति करे ॥३॥
टिप्पणी
३−(देवैनसात्) अनसन्तान्नपुंसकाच्छन्दसि। पा० ५।४।१०३। इति टच्, समासान्तः। देवेभ्यः कृतात् पापात् (उन्मदितम्) भ्रमितचितं−पुरुषम् (उन्मत्तम्) उन्मादविशिष्टम् (रक्षसः) राक्षसात्। दुःखदायिनो जीवाद् रोगाद् वा (परि) प्रति। प्राप्य (यदा) थस्य दः। यथा (असति) भवेत् ॥
विषय
देवैनसात् रक्षसः
पदार्थ
१. (देवैनसात्) = देवों के विषयों में किये गये पाप से (उन्मदितम्) = उन्मादयुक्त हुए-हुए को अथवा (रक्षस:) = [अपने रमण के लिए औरों को क्षय करनेवाले] रोगकृमियों से (उन्मत्तं परि) = उन्मत्त हुए पुरुष को लक्ष्य करके विद्वान्-ज्ञानी मैं (यदा) = जब (भेषजं कृणोमि) = चिकित्सा करता हूँ तब (अनुन्मदितः असति) = यह उन्मादरहित हो जाता है।
भावार्थ
उन्माद के दो कारण हो सकते हैं-एक, देवों के विषय में कोई पाप करना और इससे मानस सन्तुलन खो बैठना। दूसरे, किसी रोगकृमि से उत्पन्न विकार के कारण। ज्ञानी पुरुष इन दोनों प्रकार के उन्माद को उचित औषध-प्रयोग से दूर करे।
भाषार्थ
(दैवेनसात्) देवों अर्थात् इन्द्रियों द्वारा किये पाप से (उन्मदितम्) उन्माद प्राप्त को, तथा (रक्षसस्परि) राक्षसी स्वभाव और कमों से [अथवा परमेश्वर द्वारा प्रदत्त पापफल से] (उन्मत्तम्) उन्मादो को लक्ष्य करके (विद्वान्) ज्ञानी चिकित्सक में (भेषजम् कृणोमि) भेषज करता हूं (यदा=यथा) जिस प्रकार (अनुन्मदितः) उन्माद रहित (असति) वह हो जाय।
टिप्पणी
[देव= इन्द्रियां "देवा द्योतनात्मकाश्वसुरारीन्द्रियाणि" महीधर (यजु० ४०।४)। रक्षसः= 'स एव मृत्युः सोऽमतं सोऽभ्वं स रक्ष:" ( अथर्व० १३। अनुवाक ४, पर्याय ३ मन्त्र ४ [२५])। इस उद्धरण में परमेश्वर को "रक्षस्" कहा है। परमेश्वर रक्षक है। वह दुष्कर्मों का दुष्फल देकर मनुष्य को सुपथ पर चलाता है, इस प्रकार वह रक्षा करता है।]
विषय
बद्ध जीव की मुक्ति और उन्माद की चिकित्सा।
भावार्थ
(देव-एनसात्) देव = विद्वान् पुरुषों या दिव्य पदार्थों के प्रति किये पाप या अनाचार के कारण (उन्मदितम्) हुआ उन्माद हो या (रक्षसः परि उन्मत्तम्) मानस क्रिया को रोकने वाले या ज्ञान-विघातक कारण से उत्पन्न उन्माद हो, उसकी मैं (विद्वान्) विद्वान् पुरुष (भेषजं कृणोमि) ऐसी चिकित्सा करूं (यदा अनुन्मदितः असति) जिससे पुरुष उन्मादरहित हो जाय।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। अग्निर्देवता। १ त्रिष्टुप्, २-४ अनुष्टुभौ। चतुर्ऋचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Freedom from Bondage
Meaning
Whether you are excited by reasons of the mind and senses to a state of infatuation or by conditions of nature, or possessed by violent desires, evil ambitions and frustration, I know and apply the healing balm so that you would be free from excitement and possession and regain your proper self.
Translation
If his mania is due to the fault pertaining to the enlightened ones, or he is mad due to the fault pertaining to the germs, knowing full well, I prepare a medicine, so that he may be cured (freed from) of his mania.
Translation
I, the learned physician make a medicine to free you from the insanity if this insanity is caused by the sins committed against the physical forces working in body and it this insanity is caused by the other injurious forces.
Translation
Insane through sin against the learned, or maddened by a fell disease well-skilled I make a medicine that thou mayest be free from mental unrest.
Footnote
I refers to a learned person.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(देवैनसात्) अनसन्तान्नपुंसकाच्छन्दसि। पा० ५।४।१०३। इति टच्, समासान्तः। देवेभ्यः कृतात् पापात् (उन्मदितम्) भ्रमितचितं−पुरुषम् (उन्मत्तम्) उन्मादविशिष्टम् (रक्षसः) राक्षसात्। दुःखदायिनो जीवाद् रोगाद् वा (परि) प्रति। प्राप्य (यदा) थस्य दः। यथा (असति) भवेत् ॥
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