अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 115 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 115/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - विश्वे देवाः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - पापनाशन सूक्त
    पदार्थ -

    (यत्) यदि (विद्वांसः) जानते हुए, (यत्) यदि (अविद्वांसः) न जानते हुए (वयम्) हम ने (एनांसि) पाप कर्म (चकृम) किये हैं। (विश्वे देवाः) हे सब विद्वानो ! (सजोषसः) समान प्रीति युक्त (यूयम्) तुम (नः) हमें (तस्मात्) उस [अपराध] से (मुञ्चत) मुक्त करो ॥१॥

    भावार्थ -

    मनुष्य सब प्रकार के पापों को छोड़ कर सदा उत्तम कर्मों में प्रवृत्त रहें ॥१॥

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