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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 13 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 13/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - मृत्युः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - मृत्युञ्जय सूक्त
    81

    नमो॑ देवव॒धेभ्यो॒ नमो॑ राजव॒धेभ्यः॑। अथो॒ ये विश्या॑नां व॒धास्तेभ्यो॑ मृत्यो॒ नमो॑ऽस्तु ते ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    नम॑: । दे॒व॒ऽव॒धेभ्य॑: । नम॑: । रा॒ज॒ऽव॒धेभ्य॑: । अथो॒ इति॑ । ये । विश्या॑नाम् । व॒धा: । तेभ्य॑: । मृ॒त्यो॒ इति॑ । नम॑: । अ॒स्तु॒ । ते॒ ॥१३.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नमो देववधेभ्यो नमो राजवधेभ्यः। अथो ये विश्यानां वधास्तेभ्यो मृत्यो नमोऽस्तु ते ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    नम: । देवऽवधेभ्य: । नम: । राजऽवधेभ्य: । अथो इति । ये । विश्यानाम् । वधा: । तेभ्य: । मृत्यो इति । नम: । अस्तु । ते ॥१३.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 13; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    मृत्यु की प्रबलता का उपदेश।

    पदार्थ

    (देववधेभ्यः) ब्राह्मणों के शस्त्रों को (नमः) नमस्कार और (राजवधेभ्यः) क्षत्रियों के शस्त्रों को (नमः) नमस्कार है। (अथो) और भी (ये) जो (विश्यानाम्) वैश्यों के (वधाः) शस्त्र हैं (तेभ्यः) उनको, और (मृत्यो) हे मृत्यु ! (ते) तुझ को (नमः) नमस्कार (अस्तु) होवे ॥१॥

    भावार्थ

    विद्याबली, पराक्रमबली और धनबली भी मृत्यु के वश हैं। इस से सब धर्माचरण करते रहें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(नमः) नमस्कारः। सत्कारः (देववधेभ्यः) ब्राह्मणानां विद्यारूपशस्त्रेभ्यः (राजवधेभ्यः) क्षत्रियाणां हननसाधनेभ्यः शस्त्रेभ्यः (अथो) अपि च (ये) (विश्यानाम्) विश प्रवेशने−क्यप्। वैश्यानाम् (वधाः) धनरूपायुधानि (तेभ्यः) वधेभ्यः (मृत्यो) अ० १।३०।३। हे मरण (अस्तु) (ते) तुभ्यम् ॥

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    विषय

    देववध, राजवध, विश्यवध

    पदार्थ

    १. (देववधेभ्यः) = देवों [ब्राह्मणों] के शस्त्रों को (नमः) = नमस्कार हो, (राजवधेभ्य:) = क्षत्रियों के शस्त्रों को (नमः) = नमस्कार हो (अथ+उ) = और (ये) = जो (विश्यानाम्) = प्रजाओं के (वधा:) = शस्त्र हैं (तेभ्यः नमः) = उनके लिए भी नमस्कार हो। हे (मृत्यो) = मृत्यो! ते (नमः अस्तु) = हम तेरे लिए भी नमस्कार करते हैं।

    भावार्थ

    हम 'ब्राह्मणों, क्षत्रियों व वैश्यों के वधों' से अपने को बचा पाएँ। हम अकाल मृत्यु के शिकार न हो जाएँ। जिन कारणों से हम 'देवों, राजाओं अथवा प्रजाओं' के वध्य हो जाते हैं, उन सब कारणों को दूर करते हैं।

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    भाषार्थ

    (देववधेभ्यः) [शत्रु के ] सैनिकों के वधों के लिये (नमः) वज्रायुध हो, (राजवधेभ्यः) उनके राजाओं के वधों के लिये (नमः) वज्रायुध हो। (अथो) तथा (विश्यानाम् ) वैश्यों के (ये वधाः) जो वध हैं ( तेभ्य: ) उन के लिये (मृत्यो) हे मृत्यु ! (ते ) वे जो कि तेरे हैं, ( नम:) वज्रायुध (अस्तु) हो।

    टिप्पणी

    [मन्त्र युद्ध सम्बन्धी है, यथा "जयकामः स्वसेनां परितः प्रतिदिशम् उपस्थान कुर्यात्", "नमो देववधेभ्यः इत्युपतिष्ठते" (कौशिक सूत्र १४।२५), तथा (सायण) । अतः जय-युद्ध में परकीय सेनाओं उनके राजाओं तथा वैश्यों के वध के लिये वज्रायुध आवश्यक हैं, "नमः वज्रनाम" (निघं० २।२०)। युद्ध में जिनका वध अवश्यंभावी है उन्हें मृत्यु का सम्बन्धी कहा है। "देव" हैं विजिगीषा की भावना वाले परराष्ट्र सैनिक, यथा "दिवू क्रीडाविजिगीषा" आदि (दिवादिः)। युद्ध में सैनिकों, राजवर्ग, तथा वैश्यवर्ग आदि का वध होता ही है, अतः इनका कथन हुआ है]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Mrtyu

    Meaning

    Homage to the weapons of the devas, homage to the weapons of the rulers and warriors, and homage to the weapons of the citizens. O Death, homage to you. (Death is mighty.)

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    Subject

    Mrtyu : Death

    Translation

    Our homage be to the weapons of the bounties of Nature; our homage be to the weapon of the rulers; then to the weapons, that belong to common people, and to you, O death, let our homage be. (deva-vadhebhyah, raja vadhebhyah and visyanam vadhebhyah refer to the weapons of the three varnas.)

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    Translation

    I appreciate the affectivity of the weapons invented by the scientists, I appreciate the affectivity of weapons used by the Kings, I appreciate the affectivity of the weapons used by common people and I appreciate the power that death itself possesses in it.

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    Translation

    O Death, we pay homage to thee, for saving from the scientific weapons of the learned, from the instruments and arms of the kings, and from the economic troubles created by business men!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(नमः) नमस्कारः। सत्कारः (देववधेभ्यः) ब्राह्मणानां विद्यारूपशस्त्रेभ्यः (राजवधेभ्यः) क्षत्रियाणां हननसाधनेभ्यः शस्त्रेभ्यः (अथो) अपि च (ये) (विश्यानाम्) विश प्रवेशने−क्यप्। वैश्यानाम् (वधाः) धनरूपायुधानि (तेभ्यः) वधेभ्यः (मृत्यो) अ० १।३०।३। हे मरण (अस्तु) (ते) तुभ्यम् ॥

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