अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 139/ मन्त्र 5
ऋषिः - अथर्वा
देवता - वनस्पतिः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - सौभाग्यवर्धन सूक्त
54
यथा॑ नकु॒लो वि॒च्छिद्य॑ सं॒दधा॒त्यहिं॒ पुनः॑। ए॒वा काम॑स्य॒ विच्छि॑न्नं॒ सं धे॑हि वीर्यावति ॥
स्वर सहित पद पाठयथा॑ । न॒कु॒ल: । वि॒ऽछिद्य॑ । स॒म्ऽदधा॑ति । अहि॑म् । पुन॑: । ए॒व । काम॑स्य । विऽछि॑न्नम् । सम् । धे॒हि॒ । वी॒र्य॒ऽव॒ति॒ ॥१३९.५॥
स्वर रहित मन्त्र
यथा नकुलो विच्छिद्य संदधात्यहिं पुनः। एवा कामस्य विच्छिन्नं सं धेहि वीर्यावति ॥
स्वर रहित पद पाठयथा । नकुल: । विऽछिद्य । सम्ऽदधाति । अहिम् । पुन: । एव । कामस्य । विऽछिन्नम् । सम् । धेहि । वीर्यऽवति ॥१३९.५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
गृहस्थ आश्रम में प्रवेश के लिये उपदेश।
पदार्थ
(यथा) जैसे (नकुलः) कुत्सित कर्म न ग्रहण करनेवाला, नेवला (अहिम्) साँप को (विच्छिद्य) टुकड़े-टुकड़े करके (पुनः) फिर (सन्दधाति) समाहितचित्त हो जाता है। (एव) वैसे ही (वीर्यवति) हे बलवती ! (कामस्य) कामना के (विच्छिन्नम्) घाव को (संधेहि) भर दे ॥५॥
भावार्थ
जैसे नेवला जन्तु साँप को मार कर आप स्वस्थ और शान्त हो जाता है, वैसे ही विद्वान् पुरुष विदुषी पत्नी को पाकर दुःख नाश करके आनन्द भोगता है ॥५॥
टिप्पणी
५−(यथा) (नकुलः) न+कु+ला आदाने−क। नभ्राण्नपान्नवेदा०। पा० ६।३।७५। इति नञः प्रकृतिभावः। न कु कुत्सितं कर्म लाति गृह्णातीति यः स नकुलः। जन्तुविशेषः (विच्छिद्य) खण्डशः कृत्वा (संदधाति) समाहितः स्वस्थो भवति (अहिम्) आहन्तारं सर्पम् (पुनः) अनन्तरम् (एव) एवम् (कामस्य) प्रेम्णः (विच्छिन्नम्) अवखण्डितं क्षतम् (संधेहि) संयोजय (वीर्यवति) हे बलवति ॥
विषय
पवित्र प्रेम
पदार्थ
१. (यथा) = जैसे नकुलः [न-कुला आदाने] कुत्सित कर्मों का आदान न करनेवाला व्यक्ति (अहिं विच्छिद्य) = [आहन्ति] विनाशक वासना को विच्छिन्न करके (पुनः संदधाति) = फिर अपना सम्यक् धारण करता है, एव उसी प्रकार हे (वीर्यावति) = प्रशस्त बलवाली युवति! तू (कामस्य विच्छिन्न संधेहि) = काम के-प्रेमाकुलता के घाव को भरनेवाली हो, अर्थात् तुझे प्राप्त करके मैं स्वस्थ हो जाऊँ। तेरे प्रति मेरा प्रेम वासनात्मक न होकर पवित्र हो।
भावार्थ
एक युवक का युवति के प्रति पवित्र प्रेम उसका धारण करनेवाला बनता है।
भाषार्थ
(यथा) जैसे (नकुलः) न्योला (अहिम) सांप को (विच्छिद्य) दो१ टुकड़ों में करके (पुनः) फिर, तदनन्तर (संदवाति) अपने आप को समाहित अर्थात् शान्त कर लेता है, (एव) इस प्रकार (वीर्यावति) है शक्तिमती पत्नो ! तू (कामस्य) काम को (विच्छिन्नम) छिन्न-भिन्न करके (संधेहि) अपने आप को समाहित अर्थात् शान्त कर।
टिप्पणी
[कामस्य= कर्मणि षष्ठी; अथवा कानस्य भाव संस्कार वा विछिन्न कृत्वा।] [छिदिर् द्वैधीकरणे]
विषय
सौभाग्यकरण और परस्परवरण।
भावार्थ
(यथा) जिस प्रकार (नकुलः) नेवला (वि-च्छिद्य) सांप से अपना विच्छेद कर अर्थात् लड़ते समय सांप से अलग हो हो कर (पुनः) फिर फिर (अहिम्) सांप का (संदधाति) अपने साथ मेल करता है (एवा) इसी प्रकार (वीर्य-वति) हे वीर्य वाली पत्नी ! अर्थात् अपनी शान्ति की रक्षा करने वाली जितेन्द्रिय पत्नी ! (कामस्य) काम में से (विच्छिन्नम्) विच्छिन्न हुए पति के लिये (संधेहि) ऋतु काल में पुनः पुनः सम्बन्ध कर। अर्थात् पति-पत्नी को चाहिये कि वे तब तक परस्पर संगम से मुक्त रहें जब तक कि स्त्री को पुनः ऋतुदर्शन न हो गृहस्थ जीवन में भी काम का तांता बीच बीच में तोड़ देना चाहिये, और ऋतुदर्शन काल में ही पुनः संगम होना चाहिये, अन्यथा नहीं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। वनस्पतिर्देवता। १ त्र्यवसाना षट्पदा विराड् जगती। २-३ अनुष्टुभौ। पञ्चर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Conjugal Happiness
Meaning
Just as ‘Nakula’, non-compromiser with evil, having broken through ‘Ahi’, dark cloud of passion, settles back to peace and inner joy, so, O Viryavati, spirit of life’s love and vigour, come and let us settle, both in love and peace as one whole in spirit, though otherwise split individualities for want of love, in search of love and fulfilment.
Translation
Just as a mungoose, having cut a snake into pieces, puts it together again, so, O powerful herb, may you join together our severed passionate love.
Translation
Even as the mongoose bites and rends and afterwards restores the wounded snake so let this mighty plant restore the fracture of our severed love.
Translation
Just as the mongoose, after biting and rending the snake, preserves the calmness and tranquility of mind, so do thou, O powerful wife, restore the fracture of our severed love.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
५−(यथा) (नकुलः) न+कु+ला आदाने−क। नभ्राण्नपान्नवेदा०। पा० ६।३।७५। इति नञः प्रकृतिभावः। न कु कुत्सितं कर्म लाति गृह्णातीति यः स नकुलः। जन्तुविशेषः (विच्छिद्य) खण्डशः कृत्वा (संदधाति) समाहितः स्वस्थो भवति (अहिम्) आहन्तारं सर्पम् (पुनः) अनन्तरम् (एव) एवम् (कामस्य) प्रेम्णः (विच्छिन्नम्) अवखण्डितं क्षतम् (संधेहि) संयोजय (वीर्यवति) हे बलवति ॥
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