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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 15 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 15/ मन्त्र 1
    ऋषिः - उद्दालक देवता - वनस्पतिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनिवारण सूक्त
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    उ॑त्त॒मो अ॒स्योष॑धीनां॒ तव॑ वृ॒क्षा उ॑प॒स्तयः॑। उ॑प॒स्तिर॑स्तु॒ सो॒स्माकं॒ यो अ॒स्माँ अ॑भि॒दास॑ति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उ॒त्ऽत॒म: । अ॒सि॒ । ओष॑धीनाम् । तव॑ । वृ॒क्षा: । उ॒प॒ऽस्तय॑: । उ॒प॒ऽस्ति: । अ॒स्तु॒ । स: । अ॒स्माक॑म् । य: । अ॒स्मान् । अ॒भि॒ऽदास॑ति ॥१५.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उत्तमो अस्योषधीनां तव वृक्षा उपस्तयः। उपस्तिरस्तु सोस्माकं यो अस्माँ अभिदासति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत्ऽतम: । असि । ओषधीनाम् । तव । वृक्षा: । उपऽस्तय: । उपऽस्ति: । अस्तु । स: । अस्माकम् । य: । अस्मान् । अभिऽदासति ॥१५.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 15; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    उत्तम गुणों की प्राप्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे परमेश्वर !] (ओषधीनाम्) सब तापनाशक ओषधियों में तू (उत्तमः) उत्तम (असि) है, (वृक्षाः) सब स्वीकार करने योग्य गुण (तव) तेरे (उपस्तयः) उपासक [अधीन] हैं। (सः) वह पुरुष (अस्माकम्) हमारे (उपस्तिः) अधीन (अस्तु) होवे, (यः) जो (अस्मान्) हमें (अभिदासति) सतावे ॥१॥

    भावार्थ

    सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की भक्तिपूर्वक मनुष्य पुरुषार्थ करके अपने विघ्नों को मिटावे ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(उत्तमः) सर्वोत्कृष्टः (असि) (ओषधीनाम्) अ० १।३०।३। तापनाशकानां पदार्थानाम् (तव) (वृक्षाः) वृक्ष वरणे−क। वरणीयाः श्रेष्ठाः गुणाः (उपस्तयः) अ० ३।५।६। उपासकाः। वशीभूताः (उपस्तिः) उपासकः (अस्तु) (सः) शत्रुः (अस्माकम्) (यः) (अस्मान्) धार्मिकान् (अभिदासति) अ० ४।१९।५। अभितो हिनस्ति ॥

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    विषय

    अभिदास का उपस्ति बन जाना,

    पदार्थ

    १. हे प्रभो! आप (ओषधीनाम्) = दोषदाहक ओषधियों में (उत्तमः असि) = सर्वोत्तम हैं। (वृक्षा:) = दोष छेदन की कामनावाले [वृश्चनात्] सब जीव तब (उपस्तयः) = तेरे उपासक हैं। २. (य:) = जो (अस्मान् अभिदासति) = हमारा उपक्षय करता है, (स:) = वह (अस्माकम् उपस्ति: अस्तु) = हमारा अनुगामी बन जाए। आपकी कृपा से मेरे जीवन में 'काम' प्रेम बन जाए, 'क्रोध' करुणा के रूप में हो जाए और 'लोभ' का स्थान त्याग ले-ले।

    भावार्थ

    प्रभु सब भवरोगों की सर्वोत्तम ओषधि हैं। दोष-छेदन की कामनावाले पुरुष प्रभु का ही उपासन करते हैं। इस उपासना से काम, क्रोध व लोभ का स्थान, प्रेम, करुणा व त्याग को मिल जाता है।

     

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    भाषार्थ

    (ओषधीनाम्) ओषधियों में (उत्तमः असि) तू उत्तम [ओषधि] है, (वृक्षाः) वृक्ष (तव) तेरे (उपस्तयः) आश्रय रूप हैं [तू उन पर आरूढ़ है], (यः) जो (अस्मान्) हमें (अभिदासति) उपलक्ष्य करके हमारी हिंसा करता है, या हमें दास बनाता है (सः) वह ( अस्माकम्) हमारे (उपस्तिः१ अस्तु) आश्रय में स्थित हो, हमारे अधीन हो जाय।

    टिप्पणी

    [उपस्तिः= उप+ अस्तिः (अस भूविः अदादिः) अस्तिः तिङन्त प्रतिरूपक नाम पद। अस्तिः के अकार का लोप। दासति+ दसु उपक्षये (दिवादिः) । उत्तमपद पुलिङ्ग है, अतः ओषधि पद का प्रयोग भी पुंलिङ्ग में हुआ है]। [१. उपस्तिः = उपासकः, उपक्षीणः (सापण), उप + अस् ( भुवि ), या पास उपवेशने (अदादिः), या असु क्षेपणे (दिवादिः)।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    To be the Best

    Meaning

    O herbal sanative, O soma, you are the best of herbs, trees are lower than you, subordinate. O lord, Prajapati, whoever wants to enslave us, let him be down under us, subordinate, not even equal.

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    Subject

    Vanaspati (herb)

    Translation

    You are noblest of the herbs. All the trees are subordinate to you, May he be subordinate to us, whosoever wants to enslave us.

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    Translation

    This medicinal plant (Balasa) is excellent of all the plants and all the trees are of less efficacy in comparison to it. He whosoever seeks to injure us, be subject to our power.

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    Translation

    O God, Thou art the most Excellent of all healing medicines. Embodied souls are Thy worshippers. Let him, who wants to injure us, become our friend.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(उत्तमः) सर्वोत्कृष्टः (असि) (ओषधीनाम्) अ० १।३०।३। तापनाशकानां पदार्थानाम् (तव) (वृक्षाः) वृक्ष वरणे−क। वरणीयाः श्रेष्ठाः गुणाः (उपस्तयः) अ० ३।५।६। उपासकाः। वशीभूताः (उपस्तिः) उपासकः (अस्तु) (सः) शत्रुः (अस्माकम्) (यः) (अस्मान्) धार्मिकान् (अभिदासति) अ० ४।१९।५। अभितो हिनस्ति ॥

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