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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 67 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 67/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - चन्द्रः, इन्द्रः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    83

    परि॒ वर्त्मा॑नि स॒र्वत॒ इन्द्रः॑ पू॒षा च॑ सस्रतुः। मुह्य॑न्त्व॒द्यामूः सेना॑ अमित्राणां परस्त॒राम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    परि॑ । वर्त्मा॑नि । स॒र्वत॑: । इन्द्र॑: । पू॒षा । च॒ । स॒स्र॒तु॒: । मुह्य॑न्तु । अ॒द्य । अ॒मू: । सेना॑:। अ॒मित्रा॑णाम् । प॒र॒:ऽत॒राम् ॥६७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    परि वर्त्मानि सर्वत इन्द्रः पूषा च सस्रतुः। मुह्यन्त्वद्यामूः सेना अमित्राणां परस्तराम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    परि । वर्त्मानि । सर्वत: । इन्द्र: । पूषा । च । सस्रतु: । मुह्यन्तु । अद्य । अमू: । सेना:। अमित्राणाम् । पर:ऽतराम् ॥६७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 67; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    सेनापति के लक्षणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (इन्द्रः) बड़े ऐश्वर्यवाला राजा (च) और (पूषा) पोषण करनेवाला मन्त्री (वर्त्मानि) मार्गों पर (सर्वतः) सब दिशाओं में (परि सस्रतुः) सब ओर चलते रहे हैं। (अमित्राणाम्) पीड़ा देनेवाले शत्रुओं की (अमूः) वे सब (सेनाः) सेनायें (अद्य) आज (परस्तराम्) बहुत दूर (मुह्यन्तु) घबड़ा कर चली जावें ॥१॥

    भावार्थ

    युद्धकुशल राजा और मन्त्री के उपाय से शत्रु की सब सेनायें भाग जावें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(परि) परितः (वर्त्मानि) वृतु वर्तने−मनिन्। धर्ममार्गान् (सर्वतः) सर्वासु दिक्षु (इन्द्रः) महाप्रतापी राजा (पूषा) पोषको मन्त्री (च) (सस्रतुः) सृ गतौ−लिट्। जग्मतुः (मुह्यन्तु) मूढचित्ताः पलायन्ताम् (अद्य) अस्मिन् दिने (अमूः) दूरे दृश्यमानाः (सेनाः) सैन्यानि (अमित्राणाम्) पीडकानां शत्रूणाम् (परस्तराम्) परः+तरप्। किमेत्तिङव्ययघात्०। ५।४।११। इति आमु। अधिकदूरदेशे ॥

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    विषय

    इन्द्रः पूषा

    पदार्थ

    १. राष्ट्र में शत्रुओं से मोर्चा लेनेवाला 'इन्द्र' है। सैनिकों की भोजन-व्यवस्था को ठीक रखनेवाला 'पूषा' है। (इन्द्रः पूषा च) = ये इन्द्र और पूषा (सर्वत:) = सब दिशाओं में (वर्त्मानि) = सञ्चरण मार्गों को (परिसस्त्रतुः) = चारों ओर से निरुद्ध करके गति करते हैं। शत्रुओं को प्रवेश के लिए द्वार उपलब्ध नहीं होता। २. (अद्य) = अब (अमू:) = वे दूर पर दिखाई देती हुई (अमित्राणां सेना:) = शत्रुओं की सेनाएँ-रथ, तुरग, पदाति आदि (परस्तराम्) = अशियेन-बहुत ही (मुहान्तु) = व्यामूढचित्त कार्याकार्य-ज्ञान-शून्य हो जाएँ।

    भावार्थ

    सेनापति व अन्नाध्यक्ष सब ओर से मार्गों पर गति करते हुए शत्रु-सैन्यों के लिए मार्गों को निरुद्ध कर दें। शत्र-सैन्य मूढ बनकर आक्रमण करने का साहस छोड़ बैठे।

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    भाषार्थ

    (इन्द्र:) सम्राट (च) और (पूषा) पोषणाधिकारी (सर्वतः) सब ओर के (वर्त्मानि) मार्गों के (परि सस्रतुः) सब ओर गए हैं। (अमित्राणाम्) बाकि शत्रुओं की (अमूः) वे (सेना:) सेनाएं, (अद्य) आज या अब, (परस्तराम्) अतिशयेन (मुह्यन्तु) कार्याकार्य के विवेक से ज्ञानरहित हो जाय।

    टिप्पणी

    [युद्ध से पूर्व सम्राट् और पोषक पदार्थों का अधिकारी साम्राज्य के सब मार्गों का निरीक्षण स्वयं करें या करवाएं कि शत्रु सेनाएं किस-किस मार्ग से आक्रमण कर सकती हैं, और किस-किस मार्ग से अपनी सेना को आयुध और खाद्य सामग्री पहुंचाई जा सकती है। इस का निरीक्षण कर, यथोचित प्रबन्ध करें, ताकि शत्रु सेनाओं का सब प्रयत्न विफल हो जाय। सस्रतुः सृ गतौ (भ्वादिः)]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Fear and Defence

    Meaning

    Let Indra, the ruling power, and Pusha, power of maintenance and supply, keep vigilance and all-ways fortify the paths and points of entry into the dominion so that all the infiltrative forces of the enemies feel confused and terrified, retreat and keep off.

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    Subject

    Indrah

    Translation

    Let the resplendent one and the nourisher move along all the paths. Let those hosts of enemies be confounded and flee far away today.

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    Translation

    May the King and defense authority besiege the ways on every side and today, those hosts of enemies must flee far away bewildered.

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    Translation

    Let the king and his minister go about along all paths on every side, so That those hosts of enemies be completely bewildered today.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(परि) परितः (वर्त्मानि) वृतु वर्तने−मनिन्। धर्ममार्गान् (सर्वतः) सर्वासु दिक्षु (इन्द्रः) महाप्रतापी राजा (पूषा) पोषको मन्त्री (च) (सस्रतुः) सृ गतौ−लिट्। जग्मतुः (मुह्यन्तु) मूढचित्ताः पलायन्ताम् (अद्य) अस्मिन् दिने (अमूः) दूरे दृश्यमानाः (सेनाः) सैन्यानि (अमित्राणाम्) पीडकानां शत्रूणाम् (परस्तराम्) परः+तरप्। किमेत्तिङव्ययघात्०। ५।४।११। इति आमु। अधिकदूरदेशे ॥

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