अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 74 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 74/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - सामंनस्यम्, नाना देवताः, त्रिणामा छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - सांमनस्य सूक्त
    पदार्थ -

    [हे विद्वानों !] (वः) तुम्हारी (तन्वः) विस्तृत विद्यायें (सम्) यथावत् (मनांसि) मननसामर्थ्य (सम्) यथावत् (उ) और (व्रता) सब कर्म (सम्) यथावत् (पृच्यन्ताम्) मिले रहें। (अयम्) इस (ब्रह्मणः) ब्रह्माण्ड के (पतिः) पति (भगः) भगवान् [ऐश्वर्यवान् परमेश्वर] ने (वः) तुमको (वः) तुम्हारे हित के लिये (सम्) यथावत् (सम् अजीगमत्) मिलाया है ॥१॥

    भावार्थ -

    मनुष्य परस्पर मिल कर उत्तम विद्यायें, उत्तम विचार, और उत्तम कर्म प्राप्त करके सुख भोगें। यह परमेश्वरकृत नियम है ॥१॥

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