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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 76 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 76/ मन्त्र 2
    ऋषिः - कबन्ध देवता - सान्तपनाग्निः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - आयुष्य सूक्त
    36

    अ॒ग्नेः सां॑तप॒नस्या॒हमायु॑षे प॒दमा र॑भे। अ॑द्धा॒तिर्यस्य॒ पश्य॑ति धू॒ममु॒द्यन्त॑मास्य॒तः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒ग्ने: । सा॒म्ऽत॒प॒नस्य॑ । अ॒हम् । आयु॑षे । प॒दम् । आ । र॒भे॒ । अ॒ध्दा॒ति: । यस्य॑ । पश्य॑ति । धू॒मम् । उ॒त्ऽयन्त॑म् । आ॒स्य॒त: ॥७६.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अग्नेः सांतपनस्याहमायुषे पदमा रभे। अद्धातिर्यस्य पश्यति धूममुद्यन्तमास्यतः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अग्ने: । साम्ऽतपनस्य । अहम् । आयुषे । पदम् । आ । रभे । अध्दाति: । यस्य । पश्यति । धूमम् । उत्ऽयन्तम् । आस्यत: ॥७६.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 76; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    आयु बढ़ाने के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (अहम्) मैं (सांतपनस्य) ताप गुणवाले (अग्ने) उस अग्नि के (पदम्) प्राप्तियोग्य गुण को (आयुषे) आयु बढ़ाने के लिये (आरभे) प्रस्तुत करता हूँ, (यस्य) जिस [अग्नि] के (आस्यतः) मुख से (उद्यन्तम्) निकलते हुए (धूमम्) धूएँ को (अद्धातिः) सत्य जाननेवाला पुरुष (पश्यति) देखता है ॥२॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य शरीरस्थ अग्नि और प्रत्यक्ष अग्नि के गुण जान कर शारीरिक बल बढ़ाते और अस्त्र-शस्त्र आदि कलायन्त्रों में उसका प्रयोग करते हैं, वे सुखवृद्धि करके अपना जीवन बढ़ाते हैं ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(अग्नेः) सूर्यविद्युदादिरूपस्य (सांतपनस्य) संतपन−अण्। सम्यक् तपनयुक्तस्य (अहम्) शिल्पी (आयुषे) जीवनवर्धनाय (पदम्) प्रापणीयं गुणम् (आ रभे) उपक्रमे (अद्धातिः) अद्धा−अतिः। अत सातत्यगमने−क्विप्+धाञ् धारणे−क्विप्। अतं सततं गमनं ज्ञानं दधातीति अद्धा सत्यम्+अत सातत्यगमने−इन्। सत्यमतति गच्छति जानातीति। सत्यज्ञाता। मेधावी−निघ० ३।१५। (यस्य) अग्नेः (पश्यति) साक्षात्करोति (धूमम्) इषियुधीन्धि०। उ० १।१४५। इति धूञ् कम्पने−मक्। अग्निनार्द्रकाष्ठजातं पदार्थम् (उद्यन्तम्) उद्गच्छन्तम् (आस्यतः) अग्निमुखात् ॥

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    विषय

    'सान्तपन' अग्नि

    पदार्थ

    १. अने:-उस अग्रणी सांतपनस्य-अतिशयेन ज्ञान-दीत प्रभु के पदम्-वाचक पद को अहम्-मैं आयुषे-उत्कृष्ट जीवन के प्राप्ति के लिए आरभे उपक्रान्त करता हूँ-प्रभु के नामों का उच्चारण करता हूँ। २. अद्धाति:-[अद्धा प्रत्यक्षमतति, सततं ध्यानेन प्राप्नोति] ध्यान द्वारा प्रभु-दर्शन करनेवाला व्यक्ति यस्य-उस प्रभु के धूमम्-वासनाओं को कम्पित करनेवाले [धू कम्पने] ज्ञान को आस्यत: अपने मुख से उद्यन्तम्-उद्गगत होते हुए पश्यति-देखता है। हृदयस्थ प्रभु का ज्ञान इस अद्धाति के मुख से उच्चरित होता है। यह ज्ञान वासनाओं का संहार करनेवाला

    भावार्थ

    हम 'सान्तपन अग्नि'-ज्ञानदीस प्रभु के नामों का उच्चारण करें। इसप्रकार हृदयस्थ प्रभु के दर्शन करें। यदि हम प्रभु का साक्षात्कार कर पाये तो हृदयस्थ प्रभु का ज्ञान हमारे मुखों से उच्चरित होगा।

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    भाषार्थ

    [क्षत्रिय कहता है] (सांतपनस्य) शत्रु को सन्तप्त करनेवाली (अग्ने:) अग्नि के (पदम्) पैर को, चरण को (आयुषे) निज, प्रजाजन और राष्ट्र के जीवन के लिये, (अहम्) मैं (आरभे=आलभे) पकड़ता हूं, छूता हूं। (यस्य) जिस अग्नि के (धूमम्) धूए को (आस्यतः) मुझ क्षत्रिय के मुख से (उद्यन्तम्) उठते हुए को (अद्धातिः) सत्यान्वेषी , मेधावी मनुष्य (पश्यति) देखता है।

    टिप्पणी

    [श्रद्धा सत्यनाम (निघं० ३।१०)। अद्धातयः मेधाविनाम (निघं० ३‌।१५)। अग्नि जब सन्दीप्त होती है तो उस से धुआं उठता है, इसी प्रकार क्षात्राग्नि के मुख से धुआं उठता है। सम्भवतः यह मुख 'फेन' हो।]

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    विषय

    ब्राह्मणरूप सांतपन अग्नि का वर्णन।

    भावार्थ

    (सांतपनस्य) उत्तम तपस्याशील (अग्नेः) ज्ञानी ब्राह्मण के (पदम्) ज्ञान को (अहम्) मैं अपनी (आयुषे) आयुवृद्धि के लिये (आरभे) प्राप्त करने का यत्न करूं। (यस्य) जिसके (आस्यतः) मुख से (उद्- यन्तम्) उठते हुए (धूमम्) धूम के समान निकलते हुए उद्गार को (अद्वातिः) प्रत्यक्षदर्शी विद्वान् स्वयं (पश्यति) साक्षात् करता है। “एष ह वै सान्तपनो अग्निर्यद् ब्राह्मणः। यस्य गर्भाधान-पुंसवनसीमन्तोन्नयन-जातकर्म-नामकरण- निष्क्रमणान्नप्राशन-गोदान-चूड़ाकरणोपनयनाप्लावनाग्निहोत्रव्रतचर्यादीनि कृतानि भवन्ति स सान्तपनः। गो० पू० २। ३। धूमो वा अस्य अग्नेः श्रवो वयः। सहि एनम् श्रावयति श० ७। ३। १। २। अर्थात् गर्भाधान से लेकर व्रतचर्यादि तक संस्कारशील ब्राह्मण ‘सान्तपन अग्नि’ कहाता है, उसके ज्ञानोपदेश धूम हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कबन्ध ऋषिः। सांतपनोऽग्निर्देवता। १, २, ४, अनुष्टुभः। ३ ककुम्मती अनुष्टुप्। चतुर्ऋचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    The Armour of Fire

    Meaning

    For the sake of good life, health and joy, I know, love and meditate on the light of the fire of physical, mental and spiritual discipline whose fragrant fumes rising from the vedi, the sage sees in deep meditation.

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    Translation

    For a long life, | move up to the abode of the buming (heating) fire-divine, from whose mouth the Wise sage Sees the smoke rising up

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    Translation

    I, the performer of sacraments use the property of all-consuming fire for length of life. It is this fire the smoke of which is treated to be proceeding from the mouth of the learned who know the truth regarding this.

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    Translation

    For length of life, I accept the knowledge of this learned Brahmin, practising penance, whose learning, the sage who knows the truth, beholds proceeding from his mouth like smoke.

    Footnote

    Just as smoke rises out of fire. So does knowledge come out of the mouth of an austere Brahman.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(अग्नेः) सूर्यविद्युदादिरूपस्य (सांतपनस्य) संतपन−अण्। सम्यक् तपनयुक्तस्य (अहम्) शिल्पी (आयुषे) जीवनवर्धनाय (पदम्) प्रापणीयं गुणम् (आ रभे) उपक्रमे (अद्धातिः) अद्धा−अतिः। अत सातत्यगमने−क्विप्+धाञ् धारणे−क्विप्। अतं सततं गमनं ज्ञानं दधातीति अद्धा सत्यम्+अत सातत्यगमने−इन्। सत्यमतति गच्छति जानातीति। सत्यज्ञाता। मेधावी−निघ० ३।१५। (यस्य) अग्नेः (पश्यति) साक्षात्करोति (धूमम्) इषियुधीन्धि०। उ० १।१४५। इति धूञ् कम्पने−मक्। अग्निनार्द्रकाष्ठजातं पदार्थम् (उद्यन्तम्) उद्गच्छन्तम् (आस्यतः) अग्निमुखात् ॥

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