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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 89 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 89/ मन्त्र 3
    ऋषिः - अथर्वा देवता - मित्रावरुणौ छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - प्रीतिसंजनन सूक्त
    87

    मह्यं॑ त्वा मि॒त्रावरु॑णौ॒ मह्यं॑ दे॒वी सर॑स्वती। मह्यं॑ त्वा॒ मध्यं॒ भूम्या॑ उ॒भावन्तौ॒ सम॑स्यताम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    मह्य॑म् । त्वा॒ । मि॒त्रावरु॑णौ । मह्य॑म् । दे॒वी । सर॑स्वती । मह्य॑म् । त्वा॒ । मध्य॑म् । भूम्या॑: । उ॒भौ । अन्तौ॑ । सम् । अ॒स्य॒ता॒म् ॥८९.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    मह्यं त्वा मित्रावरुणौ मह्यं देवी सरस्वती। मह्यं त्वा मध्यं भूम्या उभावन्तौ समस्यताम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    मह्यम् । त्वा । मित्रावरुणौ । मह्यम् । देवी । सरस्वती । मह्यम् । त्वा । मध्यम् । भूम्या: । उभौ । अन्तौ । सम् । अस्यताम् ॥८९.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 89; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    शत्रु को जीतने का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे शत्रु !] (मित्रावरुणौ) मेरे प्राण और अपान वायु (त्वा) तुझको, और (देवी) दिव्यगुणवाली (सरस्वती) विज्ञानयुक्त विद्या (त्वा) तुझको (मह्यम्) मुझसे, और (भूम्याः) भूमि का (मध्यम्) मध्यस्थान और (उभौ) दोनों (अन्तौ) अन्त (त्वा) तुझको (मह्यम्) मुझसे (सम् अस्यताम्) संयुक्त करें ॥३॥

    भावार्थ

    मनुष्य अपने शारीरिक और आत्मिक बल और सांसारिक पदार्थों के अनुकूल वर्ताव से शत्रुओं को अपने वश में रक्खे ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(मह्यम्) मदर्थम् (त्वा) त्वां शत्रुम् (मित्रावरुणौ) प्राणापानौ, ममशारीरिकबलमित्यर्थः (मह्यम्) (देवी) दिव्यगुणा (सरस्वती) विज्ञानवती विद्या (मह्यम्) (त्वा) (भव्यम्) भव्यस्थितं प्राणिजातमित्यर्थः (भूम्याः) पृथिव्याः (उभौ) द्वौ (अन्तौ) ऊर्ध्वाधःप्रदेशौ (सम् अस्यताम्) असु क्षेपणे। संयोजयताम् ॥

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    विषय

    मित्रावरुणौ सरस्वती

    पदार्थ

    १.हे पत्नि ! (मह्यम्) = मेरे लिए (त्वाम्) = तुझे (मित्रावरुणा) = मित्र और वरुण (समस्यताम्) = संयुक्त करें। (मह्यम्) =  मेरे लिए देवी-यह द्योतमाना (सरस्वती) = ज्ञान की अधिष्ठात् देवता तुझे संयुक्त करें। स्नेह की भावना [मित्र], निषता [वरुण] व ज्ञानरुचिता [सरस्वती] हमें एक-दूसरे के समीप लानेवाले हों। २. (भूम्याः मध्यम्) = भूमि का मध्य तथा (उभौ अन्तौ) = दोनों सिरे त्वा-तुझे (मह्यम्) = मेरे लिए संयुक्त करें। यह सारा संसार तुझे मेरे लिए संयुक्त करनेवाला हो।

    भावार्थ

    स्नेह, निhषता व ज्ञानप्रवणता को अपनाते हुए पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति प्रेमवाले हों। सारा संसार उन्हें परस्पर अनुकूलता से संयुक्त करे।

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    भाषार्थ

    (मित्रावरुणौ) मित्र और वरुण (त्वा) तुझे (मह्यम्) मुझ पति के लिये; तथा (मह्यम्) मुझ पति के लिये (देवी सरस्वती) दिव्य ज्ञान सम्पन्ना वेदवाणी (समस्यताम्) परस्पर सम्बद्ध करें। (मह्यम्) मुझ पति के लिये (भूम्याः मध्यम्) भूमि का मध्यभाग (उभौ अन्तौ) जेसे दोनों अन्त के भागों को (समस्यताम्) सम्बद्ध करता है, वैसे हम दोनों को परस्पर सम्बद्ध करे।

    टिप्पणी

    [भूमि का मध्यभाग अर्थात् भूमध्यरेखा [Equator] जैसे भूमि के प्रान्तभागों अर्थात् उत्तरध्रुवीय तथा दक्षिण ध्रुवीय भागों को परस्पर सम्बद्ध करता है, वैसे मेरे मित्र तथा स्नेही मुख्यमन्त्री तथा वरुणनामक राजा निज विवाह-सम्बन्धी नियमों द्वारा हम दोनों को परस्पर सम्बद्ध करे। तथा ज्ञानसम्पन्न वेदवाणी भी ज्ञान प्रदान कर हम दोनों को परस्पर सम्बद्ध करे।

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    विषय

    पति का कर्तव्य—पत्नीसंरक्षण।

    भावार्थ

    हे स्त्री ! (त्वा) तुझको (मित्रावरुणौ) मित्र = मरण से बचाने बाला और वरुण = सर्वशरीरव्यापी प्राण और अपान (समस्यताम्) मिलायें। (देवी सरस्वती त्वा मह्यं समस्यताम्) देवी सरस्वती, यह वाणी तुझे मेरे साथ मिलाए रखखे। (भूम्या मध्यम्) भूमि का मध्य भाग जहां हमारा घर बना है और (उभौ मन्तौ) उसके दोनों छोर भी (त्वा मह्यं समस्यताम्) तुझे मेरे साथ जोड़े रक्खें। अर्थात् प्राण, अपान जीवन, और वाणी से हम दोनों स्त्री पुरुष परस्पर प्रेम करें, भूमि के बीच में और देश देशान्तरों में भी एक दूसरे का त्याग न करें।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। मन्त्रोक्ता देवता। अनुष्टुभः। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Spirit of Love,

    Meaning

    May Mitra and Varuna, prana and apana energies, love of living and judgement of understanding, may divine Sarasvati, the breeze of Mother Omniscience, the centre of the earth even unto the ends of it, excite me and join me with you and you with me, O spirit of life and love !

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    Translation

    May the Lord friendly and venerable give you to me; may the divine speech may give you to me. May the middle and both the ends of the earth unite you with me.

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    Translation

    O wife! let night and day unite you with me, let the speech unite you with me, let the centre of the earth (where we have our dwelling) and the both of the limits thereof unite you with me.

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    Translation

    O wife, may Prāna and Upāna, may divine learning, may the denizens of the earth, and both her limits unite thee with me!

    Footnote

    Husband and wife should always remain together bound by the ties of love. If they go to the extreme, distant parts of the earth, they should go together. In fact they should never be separated.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(मह्यम्) मदर्थम् (त्वा) त्वां शत्रुम् (मित्रावरुणौ) प्राणापानौ, ममशारीरिकबलमित्यर्थः (मह्यम्) (देवी) दिव्यगुणा (सरस्वती) विज्ञानवती विद्या (मह्यम्) (त्वा) (भव्यम्) भव्यस्थितं प्राणिजातमित्यर्थः (भूम्याः) पृथिव्याः (उभौ) द्वौ (अन्तौ) ऊर्ध्वाधःप्रदेशौ (सम् अस्यताम्) असु क्षेपणे। संयोजयताम् ॥

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