अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 9/ मन्त्र 2
ऋषिः - जमदग्नि
देवता - कामात्मा
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - कामात्मा सूक्त
166
मम॒ त्वा दो॑षणि॒श्रिषं॑ कृ॒णोमि॑ हृदय॒श्रिष॑म्। यथा॒ मम॒ क्रता॒वसो॒ मम॑ चि॒त्तमु॒पाय॑सि ॥
स्वर सहित पद पाठमम॑ । त्वा॒ । दो॒ष॒णि॒ऽश्रिष॑म् । कृ॒णोमि॑ । हृ॒द॒य॒ऽश्रिष॑म् । यथा॑ । मम॑ । क्रतौ॑ । अस॑: । मम॑ । चि॒त्तम् । उ॒प॒ऽआय॑सि ॥९.२॥
स्वर रहित मन्त्र
मम त्वा दोषणिश्रिषं कृणोमि हृदयश्रिषम्। यथा मम क्रतावसो मम चित्तमुपायसि ॥
स्वर रहित पद पाठमम । त्वा । दोषणिऽश्रिषम् । कृणोमि । हृदयऽश्रिषम् । यथा । मम । क्रतौ । अस: । मम । चित्तम् । उपऽआयसि ॥९.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
गृहस्थ आश्रम का उपदेश।
पदार्थ
(त्वा) तुझको (मम) अपने (दोषणिश्रिषम्) भुजा पर आश्रयवाली और (हृदयश्रिषम्) हृदय में आश्रयवाली (कृणोमि) मैं करता हूँ। (यथा) जिससे (मम) मेरे (कृतौ) कर्म वा बुद्धि में (असः) तू रहे, (मम) मेरे (चित्तम्) चित्त में (उपायसि) तू पहुँचती है ॥२॥
भावार्थ
पति और पत्नी परस्पर पुरुषार्थ और प्रीतिपूर्वक गृहस्थ आश्रम को यथावत् सिद्ध करें ॥२॥
टिप्पणी
२−(मम) (त्वा) त्वाम् (दोषणिश्रिषम्) श्रिषु दाहे, श्रिष आलिङ्गने इति सायण−क्विप्। पद्दन्नोमास्०। पा० ६।१।६३। इति दोः शब्दस्य दोषन्। सप्तम्या अलुक्। बाहौ पुरुषार्थे आश्रिताम् (कृणोमि) करोमि (हृदयश्रिषम्) हृदयाश्रिताम् (यथा) यस्मात्कारणात्। अन्यद् व्याख्यातम्। अ० १।३४।२। (मम) (कृतौ) कर्मणि बुद्धौ वा (असः) त्वं भूयाः (मम) (चित्तम्) अन्तःकरणम् (उपायसि) उप+आङ्+अय गतौ। उपागच्छसि। आदरेण प्राप्नोषि ॥
विषय
दोषणिश्रिषं हृदयनिषम्
पदार्थ
१. है पनि! मैं (त्वा) = तुझे (मम दोषणिभिषम्) = मेरी भुजा पर आलिङ्गन करनेवाली (कृणोमि) = करता हूँ और (हृदयभिषम्) = हृदय में आश्रय करनेवाली करता हूँ। मेरी भुजाएँ तेरा आश्रय हों, मेरे हृदय में तू बसी हो। २. मैं इसप्रकार प्रेम से तुझे आकृष्ट करता हूँ (यथा) = जिससे तू (मम क्रती अस:) = मेरे कर्मों व संकल्पों में होती है। तू मेरे लिए ही कर्मों को कर मैं भी तेरे संकल्पों का विषय बनें। मम (चित्तम् उपायसि) = तू मेरे चित्त के अनुकूल चलनेवाली हो।
भावार्थ
पति अपने प्रेम से पत्नी को जीतने का प्रयत्न करे।
भाषार्थ
(मम) मेरी (दोषणिश्रिषम्) भूजा में आश्रय पाई (त्वा) तुझ को, (हृदयश्रिषम्) मेरे हृदय में आश्रय पाई (कृणोमि) मैं करता हूं, (यथा) जिस प्रकार कि (मम) मेरी (क्रतौ) प्रज्ञा और कर्म में (असः) तू हो जा, और (मम) मेरे (चित्तम् उप) चित्त के समीप (अयसि ) तू आ जा।
टिप्पणी
["क्रतु प्रज्ञानाम", तथा "कर्मनाम" (निघं० ३।९; २।१)। अभिप्राय यह कि तू मेरे विचार और कर्म के अनुकूल वर्ताव कर]।
विषय
स्त्री पुरुषों का परस्पर प्रेम करने का कर्तव्य।
भावार्थ
हे प्रियतमे ! मैं (हृदय-श्रिषम्) हृदय में लगी, हृदय में बसी (त्वा) तुझको (मम दोषणि श्रिषं कृणोमि) अपनी भुजा पर चिपटाऊँ, तुझे बाहु से आलिंगन करूं (यथा) जिससे तू (मम क्रतौ) मेरे हृदय की इच्छा के भीतर (असः) रहे और (मम चित्तम्) मेरे चित्त में (उपायसि) आकर बसे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
जमदग्निर्ऋषिः। कामात्मा देवता। १-३ अनुष्टुभः। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Love
Meaning
I make you rest on my shoulder, I make you rest in my heart so that you may be one with my intent and action, so that you may reside in my heart.
Translation
I make you cling to my arms, make you cling to my heart, so that you will be one in desire with me and will be one in thought with me (shall be pleasing to my heart).
Translation
I make you, my wife, hang held into my arms, I make you lie in my heart, so that you may remain submissive to my will-and make your place in my mind.
Translation
I make thee seek support of my arm. I make thee live in my heart, so that thou acceptest my wish, that thou mayst act according to my will
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(मम) (त्वा) त्वाम् (दोषणिश्रिषम्) श्रिषु दाहे, श्रिष आलिङ्गने इति सायण−क्विप्। पद्दन्नोमास्०। पा० ६।१।६३। इति दोः शब्दस्य दोषन्। सप्तम्या अलुक्। बाहौ पुरुषार्थे आश्रिताम् (कृणोमि) करोमि (हृदयश्रिषम्) हृदयाश्रिताम् (यथा) यस्मात्कारणात्। अन्यद् व्याख्यातम्। अ० १।३४।२। (मम) (कृतौ) कर्मणि बुद्धौ वा (असः) त्वं भूयाः (मम) (चित्तम्) अन्तःकरणम् (उपायसि) उप+आङ्+अय गतौ। उपागच्छसि। आदरेण प्राप्नोषि ॥
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