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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 97 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 97/ मन्त्र 2
    ऋषिः - अथर्वा देवता - मित्रावरुणौ छन्दः - जगती सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
    44

    स्व॒धास्तु॑ मित्रावरुणा विपश्चिता प्र॒जाव॑त्क्ष॒त्रं मधु॑ने॒ह पि॑न्वतम्। बाधे॑थां दू॒रं निरृ॑तिं परा॒चैः कृ॒तं चि॒देनः॒ प्र मु॑मुक्तम॒स्मत् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स्व॒धा । अ॒स्तु॒ । मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ । वि॒प॒:ऽचि॒ता॒ । प्र॒जाऽव॑त् । क्ष॒त्रम् । मधु॑ना । इ॒ह । पि॒न्व॒त॒म् । बाधे॑थाम् । दू॒रम् । नि:ऽऋ॑तिम् । प॒रा॒चै: । कृ॒तम् । चि॒त् । एन॑: । प्र । मु॒मु॒क्त॒म् । अ॒स्मत् ॥९७.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स्वधास्तु मित्रावरुणा विपश्चिता प्रजावत्क्षत्रं मधुनेह पिन्वतम्। बाधेथां दूरं निरृतिं पराचैः कृतं चिदेनः प्र मुमुक्तमस्मत् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    स्वधा । अस्तु । मित्रावरुणा । विप:ऽचिता । प्रजाऽवत् । क्षत्रम् । मधुना । इह । पिन्वतम् । बाधेथाम् । दूरम् । नि:ऽऋतिम् । पराचै: । कृतम् । चित् । एन: । प्र । मुमुक्तम् । अस्मत् ॥९७.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 97; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    आत्मा की उन्नति का उपदेश।

    पदार्थ

    (विपश्चिता) हे बड़े बुद्धिमान् (मित्रावरुणा) प्राण और अपान के समान प्रिय माता-पिता ! [हम में] (स्वधा) आत्मधारण शक्ति (अस्तु) होवे, (प्रजावत्) उत्तम प्रजाओं से युक्त (क्षत्रम्) राज्य को (मधुना) मधुविद्या से [ईश्वरज्ञान से] (इह) यहाँ पर (पिन्वतम्) सींचो। (निर्ऋतिम्) अलक्ष्मी को (पराचैः) अधोमुख करके (दूरम्) दूर (बाधेथाम्) हटाओ और [इसके] (कृतम्) किये हुए (एनः) दुःख को (चित्) भी (अस्मत्) हम से (प्र) अच्छे प्रकार (मुमुक्तम्) छुड़ाओ ॥२॥

    भावार्थ

    जिस प्रकार सन्तान माता-पिता से उत्तम शिक्षा पाकर सुख भोगते हैं, इसी प्रकार मनुष्य उत्तम ज्ञानियों के सत्सङ्ग से क्लेशों का नाश करके सुखी होवें ॥२॥

    टिप्पणी

    २−(स्वधा) अ० ६।९६।३। आत्मधारणशक्तिः (अस्तु) भवतु (मित्रावरुणा) प्राणापानवत् प्रियमातापितरौ (विपश्चिता) अ० ६।५२।३। मेधाविनौ (प्रजावत्) उत्तमप्रजायुक्तम् (क्षत्रम्) राज्यम् (मधुना) मधुविद्यया। ईश्वरज्ञानेन (इह) अत्र लोके (पिन्वतम्) पिवि सेचने, इदित्वान्नुम्। सिञ्चतम्। प्रवर्धयतम् (बाधेथाम्) निवर्त्तयतम् (दूरम्) (निर्ऋतिम्) अ० १।३१।२। अलक्ष्मीम् कृच्छ्रापत्तिम्−निरु० २।७। (पराचैः) अ० २।१०।५। पराङ्मुखीं कृत्वा (कृतम्) निर्ऋत्या निष्पादितम् (चित्) अपि (एनः) दुःखम् (प्र) प्रकर्षेण (मुमुक्तम्) छान्दसः शपः श्लुः। मोचयतम् (अस्मत्) धार्मिकेभ्यः सकाशात् ॥

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    विषय

    मित्रावरुणा

    पदार्थ

    १. हे (विपश्चिता) = ज्ञान से युक्त (मित्रावरुणा) = स्नेह व निद्वेषता के भावो! आपके अनुग्रह से हममें (स्वथा अस्तु) = आत्मधारण-शक्ति हो। (प्रजावत् क्षत्रम्) = उत्तम सन्तानोंवाले बल को (इह) = यहाँ-हमारे जीवनों में (मधुना) = माधुर्य से (पिन्वतम्) = सींचो । स्नेह व निषता हमारे जीवनों को आत्मधारण की शक्तिवाला, उत्तम सन्तानवाला, बलसम्पन्न व माधुर्ययुक्त बनाते हैं। २. हे मित्रावरुणा! आप (निर्ऋतिम्) = दुराचार को-पराजयकारिणी पापदेवता को (पराचैः दूरं बाधेथाम्) = पराङ्मुख करके सुदूर नष्ट कीजिए। (कृतं चित्) = शत्रुओं से किये गये भी (एन:) = पराजय निमित्त पाप को (अस्मत्) = हमसे (प्रमुमुक्तम्) = मुक्त करो।

    भावार्थ

    हम स्नेह व निर्दृषता को अपनाकर 'आत्मधारणशक्तिवाले, उत्तम सन्तानोंवाले, बलसम्पन्न व मधुरभाषी बनें और दुराचार से दूर रहें।

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    भाषार्थ

    (विपश्चिता=विपश्चिनौ) हे मेधावी (मित्रावरुणा= मित्रावरुणौ) स्नेही मुख्यमन्त्रिन्! तथा वरुण-राजन्! (स्वधा) आत्मधारणयोग्य अन्न (अस्तु) राष्ट्र में हो, (इद्) इस राष्ट्र में (क्षत्रम्) क्षात्रबल को (प्रजावत्) सन्तान के तुल्य (मधुना) मधुर व्यवहार तथा मधुर जल द्वारा (पिन्वतम्) सींचा करो। (निर्ऋतिम्) कष्ट को (पराचैः) पराङ्मुख करने के उपायों द्वारा (दूरम्) दूर (वाधेथाम) हटाया करो, (कृतं चित्) हम प्रजा द्वारा किये गए (एनः) पाप कृत्य को (अस्मत्) हम से (प्रमुमुक्तम्) छुड़ाया करो।

    टिप्पणी

    [विपश्चित् मेधाविनाम (निघं० ३।१५)। मित्रावरूणौ मेधावी हैं। अतः ये मनुष्य हैं। मित्र= ञिमिदा स्नेहने (भ्वादिः)। पिन्वतम् = पिवि सेचने (भ्वादिः, इत्येके)। निर्ऋतिः= कृच्छ्रापत्ति: (निरुक्त २।२।८)। (कृतम् एनः) किये गए एक भी पाप से मुक्ति की अभिलाषा प्रकट की गई है]।

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    विषय

    विजय प्राप्ति का उपाय।

    भावार्थ

    हे (मित्रावरुणौ) मित्र और वरुण ! मित्र = न्यायाधीश और वरुण = राजन् ! आप दोनों (विपश्चितौ) मेधावी, बुद्धिमान् पुरुष हैं। आपके लिये (स्वधा अस्तु) अन्न, जो आपके अपने ही धारण करने के योग्य आपका पष्ठांश भाग है वह आपको प्राप्त हो। और (प्रजावत्) उत्तम प्रजा से युक्त (क्षत्रम्) क्षत्रिय बल और धन को (इह) इस राष्ट्र में (मधुना) मधु से अमृत या अन्न या राजबल से (पिन्वतम्) युक्त करो। (निर्ऋतिम्) पाप या संकट डालनेवाली निर्ऋति, शत्रु की सेना या विपत्ति को (दूरे) दूर से ही (पराचैः) परे करते हुए (बाधेथाम्) विनष्ट करो। और (कृतम्) किये हुए (चित्) भी (एनः) हमारे अपराध को (अस्मत्) हमसे (प्रमुमुक्तम्) दूर करो।

    टिप्पणी

    (तृ० च०) ऋ० १।१४।९।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। मित्रावरुणौ देवते। १ त्रिष्टुप्, २ जगती, ३ भुरिक् त्रिष्टुप्। तृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Victory Over Enemies

    Meaning

    O Mitra and Varuna, prana and apana energies, sun and oceans, day and night, friends and powers of love and judgement, wise and all intelligent, let this social order of exuberant humanity rise and overflow with the honey sweets of peace and prosperity. Ward off adversity, cast away down and out. Banish sin, evil and crime out of our life and society.

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    Subject

    Mitra - Varuna Pair

    Translation

    O Lord friendly and venerable. O wise, may there be sustenance for us. May you pour on this man princely power with sweetness and with progeny. Drive the distress (perdition) far and far away. May you also free us from the sin (that we might have ever) committed.

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    Translation

    O learned teacher and preacher! let there be power and wealth for you. O ye! make the nation swell with your ability, become strong with people, drive away to far distance the calamity and save us from the tendency of the recurrence of sin committed once.

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    Translation

    Praise to you, O wise father and mother! Here swell with God's knowledge, dominion blest with children. Far into distant regions drive adversity, and even from committed sin absolve us.

    Footnote

    Here: In the state, country.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २−(स्वधा) अ० ६।९६।३। आत्मधारणशक्तिः (अस्तु) भवतु (मित्रावरुणा) प्राणापानवत् प्रियमातापितरौ (विपश्चिता) अ० ६।५२।३। मेधाविनौ (प्रजावत्) उत्तमप्रजायुक्तम् (क्षत्रम्) राज्यम् (मधुना) मधुविद्यया। ईश्वरज्ञानेन (इह) अत्र लोके (पिन्वतम्) पिवि सेचने, इदित्वान्नुम्। सिञ्चतम्। प्रवर्धयतम् (बाधेथाम्) निवर्त्तयतम् (दूरम्) (निर्ऋतिम्) अ० १।३१।२। अलक्ष्मीम् कृच्छ्रापत्तिम्−निरु० २।७। (पराचैः) अ० २।१०।५। पराङ्मुखीं कृत्वा (कृतम्) निर्ऋत्या निष्पादितम् (चित्) अपि (एनः) दुःखम् (प्र) प्रकर्षेण (मुमुक्तम्) छान्दसः शपः श्लुः। मोचयतम् (अस्मत्) धार्मिकेभ्यः सकाशात् ॥

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