Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 57 के मन्त्र

मन्त्र चुनें

  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 57/ मन्त्र 2
    ऋषि: - वामदेवः देवता - सरस्वती छन्दः - जगती सूक्तम् - सरस्वती सूक्त
    23

    स॒प्त क्ष॑रन्ति॒ शिश॑वे म॒रुत्व॑ते पि॒त्रे पु॒त्रासो॒ अप्य॑वीवृतन्नृ॒तानि॑। उ॒भे इद॑स्यो॒भे अ॑स्य राजत उ॒भे य॑तेते उ॒भे अ॑स्य पुष्यतः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    स॒प्त । क्ष॒र॒न्ति॒ । शिश॑वे । म॒रुत्व॑ते । पि॒त्रे । पु॒त्रास॑: । अपि॑ । अ॒वी॒वृ॒त॒न् । ऋ॒तानि॑ । उ॒भे इति॑ । इत् । अ॒स्य॒ । उ॒भे इति॑ । अ॒स्य॒ । रा॒ज॒त॒: । उ॒भे इति॑ । य॒ते॒ते॒ इति॑ । उ॒भे इति॑ । अ॒स्य॒ । पु॒ष्य॒त॒: ॥५९.२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    सप्त क्षरन्ति शिशवे मरुत्वते पित्रे पुत्रासो अप्यवीवृतन्नृतानि। उभे इदस्योभे अस्य राजत उभे यतेते उभे अस्य पुष्यतः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    सप्त । क्षरन्ति । शिशवे । मरुत्वते । पित्रे । पुत्रास: । अपि । अवीवृतन् । ऋतानि । उभे इति । इत् । अस्य । उभे इति । अस्य । राजत: । उभे इति । यतेते इति । उभे इति । अस्य । पुष्यत: ॥५९.२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 57; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    पदार्थ -
    (सप्त) सात [इन्द्रियाँ अर्थात् दो कान, दो नथुने, दो आँख, एक मुख] (मरुत्वते) सुवर्णवाले (शिशवे) दुःखनाशक बालक [वा प्रशंसनीय वा उदार विद्वान्] के लिये [सुख से] (क्षरन्ति) बरसती हैं, (अपि) और (पुत्रासाः) पुत्रों [पुत्रसमान हितकारी पुरुषों] ने (पित्रे) उस पिता [पिता तुल्य माननीय] के लिये (ऋतानि) सत्य धर्मों को (अवीवृतन्) प्रवृत्त किया है। (उभे) दोनों [वर्तमान और भविष्यत् जन्म वा अवस्था] (इत्) ही (अस्य) इस [विद्वान्] के होते हैं, (अस्य) इसके (उभे) दोनों (राजतः) ऐश्वर्यवान् होते हैं, (उभे) दोनों (यतेते) प्रयत्नशाली होते हैं, (उभे) दोनों (अस्य) इसका (पुष्यतः) पोषण करते हैं ॥२॥

    भावार्थ - धनी, परोपकारी, विद्वान् पुरुष इस जन्म और परजन्म और वर्तमान और भविष्यत् काल में पूर्ण सुख भोगते हैं ॥२॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में कुछ भेद से है−१०।१३।५ ॥


    Bhashya Acknowledgment

    Meaning -
    Seven gifts of Mother Nature, five senses with mind and intelligence, five pranas with Sutratma and Dhananjaya, bring showers of milky nourishment for the vibrant soul residing in the body, as children do good and bring hope and fulfilment to the parent, and they also abide by the laws of eternal truth as they serve the soul. Also, there are two other potentials which serve the soul, they shine and bring light and lustre for it, they are both active, and both nourish, promote and advance it in life. These are prana and apana energies of nature gifted to man.


    Bhashya Acknowledgment
    Top