अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 79/ मन्त्र 2
अ॒हमे॒वास्म्य॑मावा॒स्या॒ मामा व॑सन्ति सु॒कृतो॒ मयी॒मे। मयि॑ दे॒वा उ॒भये॑ सा॒ध्याश्चेन्द्र॑ज्येष्ठाः॒ सम॑गच्छन्त॒ सर्वे॑ ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒हम् । ए॒व । अ॒स्मि॒ । अ॒मा॒ऽवा॒स्या᳡ । माम् । आ । व॒स॒न्ति॒ । सु॒ऽकृ॒त॑: । मयि॑ । इ॒मे । मयि॑ । दे॒वा: । उ॒भये॑ । सा॒ध्या: । च॒ । इन्द्र॑ऽज्येष्ठा: । सम् । अ॒ग॒च्छ॒न्त॒ । सर्वे॑ ॥८४.२॥
स्वर रहित मन्त्र
अहमेवास्म्यमावास्या मामा वसन्ति सुकृतो मयीमे। मयि देवा उभये साध्याश्चेन्द्रज्येष्ठाः समगच्छन्त सर्वे ॥
स्वर रहित पद पाठअहम् । एव । अस्मि । अमाऽवास्या । माम् । आ । वसन्ति । सुऽकृत: । मयि । इमे । मयि । देवा: । उभये । साध्या: । च । इन्द्रऽज्येष्ठा: । सम् । अगच्छन्त । सर्वे ॥८४.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(अहम्) मैं (एव) ही (अमावास्या) अमावास्या [सबके साथ बसी हुई शक्ति] (अस्मि) हूँ, (मयि) मुझ में [वर्तमान होकर] (इमे) यह सब (सुकृतः) सुकर्मी लोग (माम्) लक्ष्मी में (आ वसन्ति) यथावत् वास करते हैं। (मयि) मुझ में (उभये) दोनों प्रकार के (सर्वे) सब (देवाः) दिव्य पदार्थ अर्थात् (साध्याः) साधने योग्य [स्थावर] (च) और (इन्द्रज्येष्ठाः) जीव को प्रधान रखनेवाले [जंगम] पदार्थ (सम्=समेत्य) मिलकर (आगच्छन्त) प्राप्त हुए हैं ॥२॥
भावार्थ
इस मन्त्र में (अमावस्या, वसन्ति) पद [वस-रहना, ढाँकना] धातु से बने हैं। परमेश्वर सब मनुष्यों को उपदेश करता है कि वह अन्तर्यामी होकर समस्त, चर और अचर संसार को अपने वश में रखता है ॥२॥ यजुर्वेद अ० ४० म० १ में ऐसा वचन है। ई॒शा वा॒स्य॑मि॒दं सर्वं॒ यत् किञ्च॒ जग॑त्यां॒ जग॑त् ॥ (इदम् सर्वम्) यह सब, (यत् किंच) जो कुछ (जगत्याम्) सृष्टि में (जगत्) जगत् है, (ईशा) ईश्वर से (वास्यम्) वसा हुआ है ॥
टिप्पणी
२−(अहम्) परमेश्वरः (एव) (अस्मि) (अमावास्या) म० १। सर्वैः सह निवासशीला शक्तिः (माम्) इन्दिरा लोकमाता मा-अमरः १।२९। लक्ष्मीम् (आ वसन्ति) उपान्वध्याङ्वसः। पा० १।४।४८। अधिकरणस्य कर्मता। समन्ताद् अवतिष्ठन्तं (सुकृतः) सुकर्माणः (मयि) (देवाः) दिव्यपदार्थाः (उभये) अ० ४।३१।६। द्विविधाः, चराचराः (साध्याः) अ० ७।५।१। साधनीयाः। स्थावराः (इन्द्रज्येष्ठाः) जीवप्रधानाः। जङ्गमाः (सम्) समेत्य (अगच्छन्त) प्राप्तवन्तः (सर्वे) समस्ताः ॥
विषय
अमावास्या
पदार्थ
१. (अहम्) = मैं (एव) = ही अमावास्या (अस्मि) = 'अमावास्या' हूँ। (सुकृतः माम् आवसन्ति) उत्तम कर्मोंवाले देव मुझमें निवास करते हैं। ('आ मा वसन्ति देवाः') = यही तो अमावास्या शब्द की निरुक्ति है। (मयि इमे) = ये देव मुझमें निवास करते हैं, अतः मैं अमावास्या हूँ। २. (साध्याः च) []'च' शब्दः समुच्चये, सिद्धाः अपि] - साध्य और सिद्ध उभये दोनों ही (इन्द्रज्येष्ठाः) = इन्द्र प्रमुख (सर्वे देवा:) = सब देव (मयि समगच्छन्त) = मुझमें संगत होते हैं। इसप्रकार 'माम् आ वसन्ति देवाः ' 'मयि निवसन्ति यष्टव्यत्वेन' 'मयि संगच्छन्ते' यही अमावास्या शब्द का निर्वचन है। २. जिस समय हमारे जीवनों में 'तेजस्विता व सौम्यता' का, 'प्रकाश व आह्लाद' का समन्वय होता है तब सब दिव्य गुणों का विकास होता है। यही अमावास्या में देवों का निवास है। इस घर में सब देववृत्ति के मार्ग पर अग्रसर होते हैं। जिन्होंने अभी चलना प्रारम्भ किया है वे 'साध्य' व्यक्ति 'इन्द' हैं। इसप्रकार यह स्वर्ग बन जाता है |
भावार्थ
अमावस्या का उपदेश यही है कि एक घर में छोटे बड़े तथा घर के मुख्य व्यक्ति सब मिल कर उत्तम कर्मों को करते हुए यज्ञशील बने और घर को स्वर्ग बनाएँ|
भाषार्थ
(अहम्) मैं पारमेश्वरी-माता (एव) ही (अस्मि) हूं (अमावास्या) अमावास्या (इमे सुकृतः) ये सुकर्मी (माम्) मुझे आश्रय बनकर (आवसन्ति) पूर्णतया बसते हैं, (मयि) और मुझ में बसते हैं। (मयि) मुझ में (उभये) दोनों प्रकार के (देवाः) देव अर्थात् (साध्याः) साध्य (च) और ऋषि (इन्द्रज्येष्ठाः) जिन में कि इन्द्र अर्थात् ऐन्द्रशक्ति आत्मशक्ति प्रधान है, (सर्वे) वे सब (समगच्छन्त) संगत हुए हैं, या होते हैं।
टिप्पणी
[पारमेश्वरी माता कहती है कि अमावास्या "अदृष्टचन्द्रमा" वाली रात्री नहीं अपितु मैं ही अमावास्या हूं। पारमेश्वरीमाता ने निज अमावास्या नाम की व्याख्या मन्त्र में स्वयं कर दी है, "माम् आवसन्ति तथा मयि आवसन्ति" द्वारा। देवाः = साध्याः ऋषयः च। यथा “तेन देवाऽअयजन्त साध्याऽऋषयश्च ये" (यजु० ३१।९)। साध्ययोगसम्पन्नाः (अर्शआद्यच्)]।
विषय
स्त्री के कर्त्तव्य।
भावार्थ
स्त्री कहती है—(अहम्) मैं (एव) ही (अमावास्या) अमावास्या (अस्मि) हूं। क्योंकि (माम्) मुझे लक्ष्य करके ही (इमे) ये (सुकृतः) उत्तम पुण्यचरित्र पुरुष (मथि) मेरा आश्रय लेकर ही (आ वसन्ति) निवास करते हैं। (इन्द्र-ज्येष्ठाः) इन्द्र, ईश्वर को ही सर्वश्रेष्ठ माननेहारे (देवाः) विद्वान्गण और (साध्याः) साधना करनेवाले (उभे) ये दोनों ज्ञानी और कर्मवान् (मयि) मेरे आश्रय पर ही (सर्वे) सब (सम् अगच्छन्त) एकत्र होते हैं। इससे गृहस्थआश्रम की ज्येष्ठता दर्शायी गई है। अध्यात्म पक्ष में—मैं ब्रह्मशक्ति ही अमावास्या हूं। मुझको लक्ष्य करके ही सब पुण्यात्मा-जन मेरे आश्रय पर एकत्र निवास करते हैं, (देवाः) मुक्त पुरुष और (साध्याः) मुक्तिपथ के अभ्यासी साधक लोग सब एकत्र होते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। मन्त्रोक्ता अमावास्या देवता। १ जगती। २, ४ त्रिष्टुभः। चतुर्ऋचं सूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
Integrative Spirit
Meaning
Truly I am Amasvasya, all integrative power of Divinity. All people of noble action integrate and live in me. All divinities of nature and humanity, and both Sadhyas, men of accomplishment, and Indrajyeshthas, those with Indra as their supreme, come and rest in me.
Translation
I,verily, am the new moon’s night. The men of pious actions dwell in me; yes, in me they dwell. In me both, the enlightened ones, whose chief is the resplendent self, and those who are on the way to accomplishement, all meet together.
Comments / Notes
MANTRA NO 7.84.2AS PER THE BOOK
Translation
This is really Amavasya as the sun and moon meet in one house of the ecliptic in it. All the rites performed on this occasion have their existence in it. Both solar rays, be those source of moon’s splendor or be those sublimated by air meet together in this Amavasya.
Translation
I alone am Amavasya, as all these good and pious, with me as their ideal, depend upon me. Both men of knowledge and action, with full faith on God, the Most Auspicious, work together under my authority.
Footnote
I refers to woman.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(अहम्) परमेश्वरः (एव) (अस्मि) (अमावास्या) म० १। सर्वैः सह निवासशीला शक्तिः (माम्) इन्दिरा लोकमाता मा-अमरः १।२९। लक्ष्मीम् (आ वसन्ति) उपान्वध्याङ्वसः। पा० १।४।४८। अधिकरणस्य कर्मता। समन्ताद् अवतिष्ठन्तं (सुकृतः) सुकर्माणः (मयि) (देवाः) दिव्यपदार्थाः (उभये) अ० ४।३१।६। द्विविधाः, चराचराः (साध्याः) अ० ७।५।१। साधनीयाः। स्थावराः (इन्द्रज्येष्ठाः) जीवप्रधानाः। जङ्गमाः (सम्) समेत्य (अगच्छन्त) प्राप्तवन्तः (सर्वे) समस्ताः ॥
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