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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 82 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 82/ मन्त्र 1
    ऋषि: - शौनकः देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - अग्नि सूक्त
    56

    अ॒भ्यर्चत सुष्टु॒तिं गव्य॑मा॒जिम॒स्मासु॑ भ॒द्रा द्रवि॑णानि धत्त। इ॒मं य॒ज्ञं न॑यत दे॒वता॑ नो घृ॒तस्य॒ धारा॒ मधु॑मत्पवन्ताम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒भि । अ॒र्च॒त॒ । सु॒ऽस्तु॒तिम् । गव्य॑म् । आ॒जिम् । अ॒स्मासु॑ । भ॒द्रा । द्रवि॑णानि । ध॒त्त॒ । इ॒मम् । य॒ज्ञम् । न॒य॒त॒ । दे॒वता॑ । न॒: । घृ॒तस्य॑ । धारा॑: । मधु॑ऽमत् । प॒व॒न्ता॒म् ॥८७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अभ्यर्चत सुष्टुतिं गव्यमाजिमस्मासु भद्रा द्रविणानि धत्त। इमं यज्ञं नयत देवता नो घृतस्य धारा मधुमत्पवन्ताम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अभि । अर्चत । सुऽस्तुतिम् । गव्यम् । आजिम् । अस्मासु । भद्रा । द्रविणानि । धत्त । इमम् । यज्ञम् । नयत । देवता । न: । घृतस्य । धारा: । मधुऽमत् । पवन्ताम् ॥८७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 82; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    [हे विद्वानो !] (सुष्टुतिम्) बड़ी स्तुतिवाले, (गव्यम्) पृथिवी वा स्वर्ग के लिये हितकारक, (आजिम्) प्राप्तियोग्य परमेश्वर को (अभि) भले प्रकार (अर्चत) पूजो, और (अस्मासु) हम लोगों में (भद्रा) सुखों और (द्रविणानि) बलों और धनों को (धत्त) धारण करो। (देवता) प्रकाशमान तुम सब (इमम्) इस (यज्ञम्) पूजनीय परमात्मा को (नः) हम में (नयत) पहुँचाओ, (घृतस्य) प्रकाशित ज्ञान की (धाराः) धारायें [धारण शक्तियाँ वा प्रवाह] (मधुमत्) श्रेष्ठ विज्ञानयुक्त कर्म को (पवन्ताम्) शुद्ध करें ॥१॥

    भावार्थ - विद्वान् लोग परमेश्वरीय ज्ञान का उपदेश करके मनुष्यों का उपकार करें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-म० ४।५८।१० ॥


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    Meaning -
    O saints and scholars, honour and adore the sacred fire Agni and offer holy songs of praise to Agni, life and light of existence, for the wealth of lands, cows and sacred knowledge, and for success in the battles of life for progress, and by the power and grace of Agni, bring us noble wealth, honour and excellence. Raise this yajna of ours to the divinities of nature and let streams of ghrta and honey gifts of Agni flow on the earth.


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