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अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 82 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 82/ मन्त्र 1
    ऋषिः - शौनकः देवता - अग्निः छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - अग्नि सूक्त
    83

    अ॒भ्यर्चत सुष्टु॒तिं गव्य॑मा॒जिम॒स्मासु॑ भ॒द्रा द्रवि॑णानि धत्त। इ॒मं य॒ज्ञं न॑यत दे॒वता॑ नो घृ॒तस्य॒ धारा॒ मधु॑मत्पवन्ताम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒भि । अ॒र्च॒त॒ । सु॒ऽस्तु॒तिम् । गव्य॑म् । आ॒जिम् । अ॒स्मासु॑ । भ॒द्रा । द्रवि॑णानि । ध॒त्त॒ । इ॒मम् । य॒ज्ञम् । न॒य॒त॒ । दे॒वता॑ । न॒: । घृ॒तस्य॑ । धारा॑: । मधु॑ऽमत् । प॒व॒न्ता॒म् ॥८७.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अभ्यर्चत सुष्टुतिं गव्यमाजिमस्मासु भद्रा द्रविणानि धत्त। इमं यज्ञं नयत देवता नो घृतस्य धारा मधुमत्पवन्ताम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अभि । अर्चत । सुऽस्तुतिम् । गव्यम् । आजिम् । अस्मासु । भद्रा । द्रविणानि । धत्त । इमम् । यज्ञम् । नयत । देवता । न: । घृतस्य । धारा: । मधुऽमत् । पवन्ताम् ॥८७.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 82; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    विषय

    वेद के विज्ञान का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे विद्वानो !] (सुष्टुतिम्) बड़ी स्तुतिवाले, (गव्यम्) पृथिवी वा स्वर्ग के लिये हितकारक, (आजिम्) प्राप्तियोग्य परमेश्वर को (अभि) भले प्रकार (अर्चत) पूजो, और (अस्मासु) हम लोगों में (भद्रा) सुखों और (द्रविणानि) बलों और धनों को (धत्त) धारण करो। (देवता) प्रकाशमान तुम सब (इमम्) इस (यज्ञम्) पूजनीय परमात्मा को (नः) हम में (नयत) पहुँचाओ, (घृतस्य) प्रकाशित ज्ञान की (धाराः) धारायें [धारण शक्तियाँ वा प्रवाह] (मधुमत्) श्रेष्ठ विज्ञानयुक्त कर्म को (पवन्ताम्) शुद्ध करें ॥१॥

    भावार्थ

    विद्वान् लोग परमेश्वरीय ज्ञान का उपदेश करके मनुष्यों का उपकार करें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-म० ४।५८।१० ॥

    टिप्पणी

    १−(अभि) सर्वतः (अर्चत) पूजयत (सुष्टुतिम्) अतिस्तुतियुक्तम् (गव्यम्) तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। गो-यत्। गवे पृथिव्यै स्वर्गाय वा हितम् (आजिम्) अज्यतिभ्यां च। उ० ४।१३१। अज गतिक्षेपणयोः-इण। प्रापणीयं परमात्मानम् (अस्मासु) (भद्रा) सुखानि (द्रविणानि) बलानि धनानि च (धत्त) धारयत (इमम्) प्रसिद्धम् (यज्ञम्) पूजनीयं परमेश्वरम् (नयत) प्रापयत (देवता) स्वार्थे तल्। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति विभक्तेर्लुक्। देवताः। यूयं प्रकाशमानाः (घृतस्य) प्रकाशितस्य बोधस्य (धाराः) धारणशक्तयः प्रवाहा वा (मधुमत्) प्रशस्तविज्ञानयुक्तं कर्म (पवन्ताम्) शोधयन्तु ॥

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    विषय

    'सुष्टुति गव्य आजि' प्रभु का अर्चन

    पदार्थ

    १. हे विद्वानो! (सुष्टुतिम्) = उत्तम स्तुतिवाले (गव्यम्) = [गोभ्यो हितम्] इन्द्रियों के लिए हितकर [प्रभु की उपासना होने पर इन्द्रिय-वृत्तियाँ बड़ी सुन्दर बनी रहती हैं], (आजिम्) = [अज गतिक्षेपणयोः] गति के द्वारा सब बुराइयों को दूर करनेवाले प्रभु को (अभ्यचर्त) = पूजो और इसप्रकार (अस्मासु) = हममें (भद्रा द्रविणानि धत्त) = कल्याणकर धनों को धारण करो। तथा २. (नः इमं यज्ञम्) = हमारे इस यज्ञ को (देवता नयत) = देवों को प्राप्त कराओ। हम यज्ञ द्वारा देवों का सम्भावन करनेवाले बनें। (घृतस्य धारा:) = ज्ञानदीति की धाराएँ, (मधुमत् पवन्ताम्) = मधुररूप से हमारी ओर बहें।

     

    भावार्थ

    हम प्रभुस्तवन करते हुए इन्द्रियों को शुद्ध बनाएँ, गतिशीलता द्वारा सब बुराइयों को दूर करें। शुभ धनों का संग्रह करें। यज्ञों द्वारा वायु आदि देवों का शोधन करें। हमारे लिए आचार्य मधुरता से ज्ञानधाराओं को प्रवाहित करें।

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    भाषार्थ

    (देवताः) हे दिव्य उपासको ! (सुष्टुतिम्) उत्तम स्तुतियोग्य परमेश्वर की (अभि) साक्षात् (अर्चत) अर्चना करो, स्तुति करो, (अस्मासु) हम में (गव्यम्) वेदवाणी का ज्ञानदुग्ध, (आजिम्) देवासुरसंग्राम, (भद्रा=भद्राणि) कल्याणकारी तथा सुखप्रद (द्रविणानि) धन (धत्त) स्थापित करो। (इमम् यज्ञम्) हमारे इस अर्चना यज्ञ को (नयत) उन्नति की ओर ले चलो, ताकि (घृतस्य) प्रकाशमयी (धाराः) धाराएं (मधुमत्) मधुररस से उपेत हुई (नः) हम में (पवन्ताम्) प्रवाहित हों।

    टिप्पणी

    [गव्यम्= गौः वाङ्नाम (निघं० १।११); गोसम्बन्धी है ज्ञानदुग्ध, अर्थात् याज्ञदैवते, देवताध्यात्मे वा (निरुक्त १।६।२०), अर्थात् यज्ञज्ञान तथा देवताज्ञान; तथा अग्नि आदि देवता का ज्ञान तथा आध्यात्मिक आत्मज्ञान और परमात्मज्ञान। एतदर्थ देखो "उत त्वं सख्ये" (ऋ० १०।७१।५) की नैरुक्त व्याख्या इस मन्त्र में वेदवाणी को "धेनु" अर्थात् गौ कहा है। धेनुः वाङ्नाम (निघं० १।११)। आजिम्= देवासुरसंग्राम। हम लोग पाप करते हैं, परन्तु पापरूपी असुर के साथ देव बनकर संग्राम नहीं करते, इसलिये पापासुर के वशीभूत हो जाते हैं। इसलिये "देवासुरसंग्राम" के लिये याचना मन्त्र में की गई है। आजिः= संग्राम। घृतस्य= घृ क्षरणदीत्योः (जुहोत्यादिः), यहां दीप्ति अर्थ अभिप्रेत है। घृतस्य धाराः (यजु० १७।८३)। परमेश्वरीय प्रकाश की अथवा चैत्तप्रकाश की धाराएं (योगभाष्य १।३६)]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Prayer to Agni

    Meaning

    O saints and scholars, honour and adore the sacred fire Agni and offer holy songs of praise to Agni, life and light of existence, for the wealth of lands, cows and sacred knowledge, and for success in the battles of life for progress, and by the power and grace of Agni, bring us noble wealth, honour and excellence. Raise this yajna of ours to the divinities of nature and let streams of ghrta and honey gifts of Agni flow on the earth.

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    Subject

    Agnih

    Translation

    Worship the Lord, worthy of praises, beneficial for senseorgans, and obtained by sacrifice. Bestow auspicious riches on us. Convey our this worship to the bounties of Nature. May the streams of mystic butter descend with sweetness. (Also Rg. IV.58.10)

    Comments / Notes

    MANTRA NO 7.87.1AS PER THE BOOK

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    Translation

    O enlightened persons! praise the qualities and properties of fire which is admirable in its essence, which is present in the earth and which is the source of movements. Grant us the laudable possessions. O extraordinarily intelligent ones! lead and conduct us in our yajnas and let the stream of ghee full of sweetness flow.

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    Translation

    O learned persons, sing the praise of God, the Friend of souls, bestow on us excellent possessions, equip this soul of ours with divinity, let sweet streams of knowledge flow everywhere!

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(अभि) सर्वतः (अर्चत) पूजयत (सुष्टुतिम्) अतिस्तुतियुक्तम् (गव्यम्) तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। गो-यत्। गवे पृथिव्यै स्वर्गाय वा हितम् (आजिम्) अज्यतिभ्यां च। उ० ४।१३१। अज गतिक्षेपणयोः-इण। प्रापणीयं परमात्मानम् (अस्मासु) (भद्रा) सुखानि (द्रविणानि) बलानि धनानि च (धत्त) धारयत (इमम्) प्रसिद्धम् (यज्ञम्) पूजनीयं परमेश्वरम् (नयत) प्रापयत (देवता) स्वार्थे तल्। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति विभक्तेर्लुक्। देवताः। यूयं प्रकाशमानाः (घृतस्य) प्रकाशितस्य बोधस्य (धाराः) धारणशक्तयः प्रवाहा वा (मधुमत्) प्रशस्तविज्ञानयुक्तं कर्म (पवन्ताम्) शोधयन्तु ॥

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