अथर्ववेद के काण्ड - 7 के सूक्त 99 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 99/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - अथर्वा देवता - वेदिः छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् सूक्तम् - वेदी सूक्त
    पदार्थ -

    [हे विद्वान् !] (वेदिम्) विद्या [वा यज्ञभूमि] (परि) सब ओर (स्तृणीहि) फैला और (परि) सब ओर (धेहि) पुष्टकर (अमुया) उस [विद्या] के साथ (शयानाम्) वर्तमान (जामिम्) गति को (मा मोषीः) मत लूट। (होतृषदनम्) दाता का घर (हरितम्) हरा-भरा [स्वीकारयोग्य] और (हिरण्यम्) सोने से भरा [होता है], (एते) यह सब (निष्काः) सुनहले अलङ्कार (यजमानस्य) यजमान [विद्वानों के सत्कार करनेवाले] के (लोके) घर में [रहते हैं] ॥१॥

    भावार्थ -

    जो मनुष्य विद्या प्राप्त करके उसकी प्रवृत्ति नहीं रोकता, वह महाधनी होकर सुखी रहता है ॥१॥

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