अथर्ववेद के काण्ड - 8 के सूक्त 2 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 8/ सूक्त 2/ पर्यायः 0/ मन्त्र 1
    ऋषि: - ब्रह्मा देवता - आयुः छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् सूक्तम् - दीर्घायु सूक्त
    पदार्थ -

    [हे मनुष्य !] (अमृतस्य) अमृत की (इमाम्) इस (श्नुष्टिम्) प्राप्ति को (आ) भली-भाँति (रभस्व) ग्रहण कर, (अच्छिद्यमाना) बिना कटती हुई (जरदष्टिः) स्तुति की व्याप्ति [फैलाव] (ते) तेरे लिये (अस्तु) होवे। (ते) तेरे (असुम्) बुद्धि और (आयुः) जीवन को (पुनः) बार-बार (आ) अच्छे प्रकार (भरामि) मैं पुष्ट करता हूँ, (रजः) रजोगुण और (तमः) तमोगुण को (मा उप गाः) मत प्राप्त हो और (मा प्र मेष्ठाः) मत पीड़ित हो ॥१॥

    भावार्थ -

    मनुष्य प्रयत्नपूर्वक सत्त्वगुण के प्रतिबन्धक रजोगुण और हित-अहित ज्ञान के बाधक तमोगुण को छोड़कर सात्त्विक होकर जीवन को सफल करें ॥१॥

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