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अथर्ववेद - काण्ड 19/ सूक्त 1/ मन्त्र 3
सूक्त - ब्रह्मा
देवता - यज्ञः, चन्द्रमाः
छन्दः - पङ्क्तिः
सूक्तम् - यज्ञ सूक्त
रू॒पंरू॑पं॒ वयो॑वयः सं॒रभ्यै॑नं॒ परि॑ ष्वजे। य॒ज्ञमि॒मं चत॑स्रः प्र॒दिशो॑ वर्धयन्तु संस्रा॒व्येण ह॒विषा॑ जुहोमि ॥
स्वर सहित पद पाठरू॒पम्ऽरू॑पम्। वयः॑ऽवयः। स॒म्ऽरभ्य॑। ए॒न॒म्। परि॑। स्व॒जे॒। य॒ज्ञम्। इ॒मम्। चत॑स्रः। प्र॒ऽदिशः॑। व॒र्ध॒य॒न्तु॒। स॒म्ऽस्रा॒व्ये᳡ण। ह॒विषा॑। जु॒हो॒मि॒ ॥१.३॥
स्वर रहित मन्त्र
रूपंरूपं वयोवयः संरभ्यैनं परि ष्वजे। यज्ञमिमं चतस्रः प्रदिशो वर्धयन्तु संस्राव्येण हविषा जुहोमि ॥
स्वर रहित पद पाठरूपम्ऽरूपम्। वयःऽवयः। सम्ऽरभ्य। एनम्। परि। स्वजे। यज्ञम्। इमम्। चतस्रः। प्रऽदिशः। वर्धयन्तु। सम्ऽस्राव्येण। हविषा। जुहोमि ॥१.३॥
अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
भाषार्थ -
(रूपंरूपम्) राज्य के प्रत्येक रूप पर (वयोवयः) तथा प्रत्येक प्राणि-विभाग पर (संरभ्य=संलभ्य, रलयोरभेदः) सम्यक् अधिकारलाभ करके मैं राज्यपति (एनम्) इस राज्य का (परिष्वजे) आलिङ्गन करता हूँ, इसे अपनाता हूँ। (चतस्रः प्रदिशः) राज्य के चतुर्दिक्वासी (इमम् यज्ञम्) इस राज्य की (वर्धयन्तु) वृद्धि करें। मैं राज्यपति (संस्राव्येण) संस्रावों द्वारा प्राप्य (हविषा) धन को हविरूप जान कर, इस हवि द्वारा (जुहोमि) राज्य-यज्ञ में आहुतियाँ देता हूँ।
टिप्पणी -
[रूपंरूपम्=राज्य की भूमि, राज्य की नदियाँ, तथा पर्वत, राज्य के खनिज पदार्थ तथा वन, राज्य के भवन तथा उपज आदि राज्य के विविध रूप हैं। वयोवयः=वयः का अर्थ है आयुः। मन्त्र में “वयः” द्वारा आयुवाले प्राणिवर्ग अभिप्रेत हैं, अर्थात् पशु, पक्षी, पुरुष-स्त्रियां, बच्चे आदि। मन्त्रों में राज्य को यज्ञ कहा है। राज्य के सभी प्रजाजन, राज्ययज्ञ के यजमान हैं। राज्यपति इनका प्रतिनिधि बनकर प्रजा द्वारा स्वेच्छापूर्वक दिये धन को आहुतियाँ राज्य-यज्ञ की वृद्धि के निमित्त देता है। राज्य में यज्ञभावना होने पर प्रजाजन और अधिकारी, धनलालसा तथा पदलालसा से राज्य में शासन नहीं करते, अपितु राज्य को यज्ञ जानकर, धर्म-भावना से प्रेरित होकर राज्यवर्धन करते हैं।] [विशेष वक्तव्य—(१) नदियों के प्रवाहों से नहरें निकाल कर उपजवृद्धि कर, तथा नगरवासियों को जल देकर, इन प्रवाहों में नौकाओं द्वारा व्यापार कर, धन और वृद्धि की जा सकती है।(२) (वाताः) वायुओं की अनुकूलता में पतवारों द्वारा चलाई जानेवाली समुद्रिय नौकाओं तथा हवाई जहाजों द्वारा धन कमाया जा सकता है। हवाई जहाजों द्वारा धनोपार्जन के सम्बन्ध में निम्नलिखित मन्त्र द्रष्टव्य है। यथा—“ये पन्थानो बहवो देवयाना अन्तरा द्यावापृथिवी संचरन्ति। ते मा जुषन्तां पयसा घृतेन यथा क्रीत्वा धनमाहराणि” (अथर्व० ३.१५.२)। मन्त्र में “देवयानाः पन्थानः” का अर्थ है व्यापारियों के जाने-आने के “पन्थानः” अर्थात् मार्ग। देव में “दिव्” धातु का अर्थ व्यवहार अर्थात् व्यापार। वायु-यानों के राज्याधिकारी को ‘वणिक्-इन्द्र’ कहा है। यथा “इन्द्रमहं वणिजं चोदयामि” (अथर्व० ३.१५.१)। (३) अथर्ववेदीय बृहत्सर्वानुक्रमणिका में १९.१ सूक्त के दो देवता लिखे हैं—एक यज्ञ और दूसरा चन्द्रमा। यज्ञ शब्द तो १९.१ सूक्त के मन्त्रों में पठित है, परन्तु चन्द्रमा का निर्देश इन मन्त्रों में कहीं नहीं। सम्भवतः मन्त्र में “वाताः और पतत्रिणः” शब्दों द्वारा चन्द्रमा को भी देवता कहा गया हो। चन्द्रमा के कारण समुद्रों में ज्वार-भाटा होते रहते हैं, और सम्भवतः चन्द्रमा के कारण ही समुद्रिय वायुओं में भी परिवर्तन होते रहते हों, जो कि नौकाओं द्वारा किये जानेवाले व्यापार में सहायक हों। इन वायुओं को अंग्रेजी भाषा में "Trade winds" कहते हैं। साथ ही सम्भवतः १९.१ में “पतत्रिणः” पद द्वारा समुद्री-नौकाएँ अभिप्रेत हों। ऋग्वेद मं॰ १, सू॰ ११६, मन्त्र ३-४ में “नौभिः” का विशेषण “पतङ्गैः” दिया है। पतङ्गाः और पतत्रिणः शब्द प्रायः पर्यायवाची हैं। पक्षियों की उड़ानों में “संस्राव्य-हविः” के उत्पादन की योग्यता नहीं।]