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अथर्ववेद - काण्ड 19/ सूक्त 25/ मन्त्र 1
अश्रा॑न्तस्य त्वा॒ मन॑सा यु॒नज्मि॑ प्रथ॒मस्य॑ च। उत्कू॑लमुद्व॒हो भ॑वो॒दुह्य॒ प्रति॑ धावतात् ॥
स्वर सहित पद पाठअश्रा॑न्तस्य। त्वा॒। मन॑सा। यु॒नज्मि॑। प्र॒थ॒मस्य॑। च॒। उत्ऽकू॑लम्। उ॒त्ऽव॒हः। भ॒व॒। उ॒त्ऽउह्य॑। प्रति॑। धा॒व॒ता॒त् ॥२५.१॥
स्वर रहित मन्त्र
अश्रान्तस्य त्वा मनसा युनज्मि प्रथमस्य च। उत्कूलमुद्वहो भवोदुह्य प्रति धावतात् ॥
स्वर रहित पद पाठअश्रान्तस्य। त्वा। मनसा। युनज्मि। प्रथमस्य। च। उत्ऽकूलम्। उत्ऽवहः। भव। उत्ऽउह्य। प्रति। धावतात् ॥२५.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 25; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
हे सम्राट्! (त्वा) तुझे (अश्रान्तस्य) अथक-परिश्रमी (च) और (प्रथमस्य) राष्ट्र के प्रथम पुरुष अर्थात् अग्नि (१९.८.१) सर्वाग्रणी प्रधानमन्त्री के (मनसा) विचारों के साथ (युनज्मि) मैं पुरोहित संयुक्त करता हूँ। (उत्कूलम्) ऊँचाई के उच्च-तट की ओर (उद्वहः) प्रजाजन को ऊँचे ले जानेवाला (भव) तू हो, (उदुह्य) और ऊँचे ले जाकर (प्रति) और अधिक ऊँचाई की ओर (धावतात्) तू दौड़ लगा।
टिप्पणी -
[उद्= ऊँचाई। ऊँचाई की कोई निश्चित सीमा नहीं होती। आर्थिक सामाजिक, सदाचारिक, आध्यात्मिक आदि नानाविध ऊँचाइयाँ हैं, तथा इनमें प्रत्येक की ऊँचाई असीमित है।]