अथर्ववेद - काण्ड 2/ सूक्त 18/ मन्त्र 1
सूक्त - चातनः
देवता - अग्निः
छन्दः - द्विपदा साम्नीबृहती
सूक्तम् - शत्रुनाशन सूक्त
भ्रा॑तृव्य॒क्षय॑णमसि भ्रातृव्य॒चात॑नं मे दाः॒ स्वाहा॑ ॥
स्वर सहित पद पाठभ्रा॒तृ॒व्य॒ऽक्षय॑णम् । अ॒सि॒ । भ्रा॒तृ॒व्य॒ऽचात॑नम् । मे । दा॒: । स्वाहा॑ ॥१८.१॥
स्वर रहित मन्त्र
भ्रातृव्यक्षयणमसि भ्रातृव्यचातनं मे दाः स्वाहा ॥
स्वर रहित पद पाठभ्रातृव्यऽक्षयणम् । असि । भ्रातृव्यऽचातनम् । मे । दा: । स्वाहा ॥१८.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 2; सूक्त » 18; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
(भ्रातृव्यक्षयणम् असि) भाई के पुत्र का क्षय करनेवाला तू है, (भ्रातृव्यचातनम् ) भाई के पुत्र के विनाश करने का सामर्थ्य (मे दाः) मुझे दे, (स्वाहा) सु आह ।
टिप्पणी -
[सूक्त १६, मन्त्र (५) से विश्वम्भर का अन्वय अभिप्रेत है। सूक्त १८ में अन्य किसी देवता का नाम नहीं। मन्त्र में जीवारमा की उक्ति है। जीवात्मा शरीर का स्वामी है, और मन है उसका भाई, उसके कार्यों का भरण-पोषण करने वाला मन भरण-पोषण न कर जब विरोधी कर्म करने वाला हो जाता है, तब इसके विरोधी विचार और कर्म भ्रातृव्य अर्थात् मन के पुत्र कहलाते हैं। जीवात्मा इनके क्षय करने का सामर्थ्य विश्वम्भर परमेश्वर से प्रार्थित करता है।]