Sidebar
अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 111/ मन्त्र 1
यत्सोम॑मिन्द्र॒ विष्ण॑वि॒ यद्वा॑ घ त्रि॒त आ॒प्त्ये। यद्वा॑ म॒रुत्सु॒ मन्द॑से॒ समिन्दु॑भिः ॥
स्वर सहित पद पाठयत् । सोम॑म् । इ॒न्द्र॒ । विष्ण॑वि । यत् ॥ वा॒ । घ॒ । त्रि॒ते । आ॒प्त्ये ॥ यत् । वा॒ । म॒रुत्ऽसु॑ । मन्द॑से । सम् । इन्दु॑ऽभि: ॥१११.१॥
स्वर रहित मन्त्र
यत्सोममिन्द्र विष्णवि यद्वा घ त्रित आप्त्ये। यद्वा मरुत्सु मन्दसे समिन्दुभिः ॥
स्वर रहित पद पाठयत् । सोमम् । इन्द्र । विष्णवि । यत् ॥ वा । घ । त्रिते । आप्त्ये ॥ यत् । वा । मरुत्ऽसु । मन्दसे । सम् । इन्दुऽभि: ॥१११.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 111; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
(इन्द्र) हे परमेश्वर! (विष्णवि) विष्णु अर्थात् सूर्य में (यत्) जो (सोमम्) भक्तिरस है, उसका आप (मन्दसे) आनन्द लेते हैं। (यद् वा घ) और जो (त्रिते) तीसरे लोक द्युलोक में (सोमं मन्दसे) भक्तिरस है उसका आप आनन्द लेते हैं। (आप्त्ये) अप् अर्थात् जलवाले अन्तरिक्षलोक में (यत् सोमं मन्दसे) जो भक्तिरस है उसका आप आनन्द लेते हैं। (वा) तथा (मरुत्सु) मानसून तथा वायुओं में (यत् सोमं मन्दसे) जो भक्तिरस है उसका आप आनन्द लेते हैं। (इन्दुभिः) इन सब भक्तिरसों द्वारा आप (सम् मन्दसे) सम्यक् रूप से प्रसन्न होते हैं।
टिप्पणी -
[इन्दुभिः=उनत्तेर्वा (निरु০ १०.४.४१)। “इन्दु” शब्द की व्युत्पत्ति में निरुक्त में “उन्द” धातु का निर्देश किया है। जिसका अर्थ है क्लेदन, अर्थात् गीला करना। मन्त्र में कवितारूप में कहा गया है कि इन भक्तिरसों द्वारा परमात्मा स्नेहार्द्रहृदय हो जाता है। मन्त्र में यह दर्शाया है कि सभी संसार मानो परमेश्वर के प्रति भक्तिरस में उमड़ा हुआ, परमेश्वर के प्रति आत्म-समर्पण कर रहा है।]