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अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 116/ मन्त्र 2
अम॑न्म॒हीद॑ना॒शवो॑ऽनु॒ग्रास॑श्च वृत्रहन्। सु॒कृत्सु ते॑ मह॒ता शू॑र॒ राध॒सानु॒ स्तोमं॑ मुदीमहि ॥
स्वर सहित पद पाठअम॑न्महि । इत् । अ॒ना॒शव॑: । अ॒नु॒ग्रास॑: । च॒ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् ॥ सु॒कृत् । सु । ते॒ । म॒ह॒ता । शू॒र॒ । राध॑सा । अनु॑ । स्तोम॑म् । मु॒दी॒म॒हि॒ ॥११६.२॥
स्वर रहित मन्त्र
अमन्महीदनाशवोऽनुग्रासश्च वृत्रहन्। सुकृत्सु ते महता शूर राधसानु स्तोमं मुदीमहि ॥
स्वर रहित पद पाठअमन्महि । इत् । अनाशव: । अनुग्रास: । च । वृत्रऽहन् ॥ सुकृत् । सु । ते । महता । शूर । राधसा । अनु । स्तोमम् । मुदीमहि ॥११६.२॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 116; मन्त्र » 2
भाषार्थ -
(वृत्रहन्) हे पाप-वृत्रों का हनन करनेवाले परमेश्वर! (अनाशवः) शीघ्रता से रहित, अर्थात् धैर्य धारण करनेवाले, अर्थात् शीघ्र फल-प्राप्ति की व्यग्रता से हीन, (च) और (अनुग्रासः) उग्र उपायों का अवलम्बन न करनेवाले हम उपासक, (अमन्महि इत्) आपका अवश्य लगातार मनन करते रहते हैं। (शूर) हे विक्रमशील परमेश्वर! (ते) आपकी (स्तोमम् अनु) स्तुति के अनन्तर, (महता राधसा) आपके महा-धन अर्थात् आनन्दरस के द्वारा, (सकृत्) एक वार तो, (सु मुदीमहि) हम उत्तम मोद पा लें।
टिप्पणी -
[राधसा=राधस् धनम् (निघं০ २.१०)।]