अथर्ववेद - काण्ड 3/ सूक्त 21/ मन्त्र 6
सूक्त - वसिष्ठः
देवता - अग्निः
छन्दः - उपरिष्टाद्विराड्बृहती
सूक्तम् - शान्ति सूक्त
उ॒क्षान्ना॑य व॒शान्ना॑य॒ सोम॑पृष्ठाय वे॒धसे॑। वै॑श्वान॒रज्ये॑ष्ठेभ्य॒स्तेभ्यो॑ अ॒ग्निभ्यो॑ हु॒तम॑स्त्वे॒तत् ॥
स्वर सहित पद पाठउ॒क्षऽअ॑न्नाय । व॒शाऽअन्ना॑य । सोम॑ऽपृष्ठाय । वे॒धसे॑ । वै॒श्वा॒न॒रऽज्ये॑ष्ठेभ्य: । तेभ्य॑: । अ॒ग्निऽभ्य॑: । हु॒तम् । अ॒स्तु॒ । ए॒तत् ॥२१.६॥
स्वर रहित मन्त्र
उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे। वैश्वानरज्येष्ठेभ्यस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत् ॥
स्वर रहित पद पाठउक्षऽअन्नाय । वशाऽअन्नाय । सोमऽपृष्ठाय । वेधसे । वैश्वानरऽज्येष्ठेभ्य: । तेभ्य: । अग्निऽभ्य: । हुतम् । अस्तु । एतत् ॥२१.६॥
अथर्ववेद - काण्ड » 3; सूक्त » 21; मन्त्र » 6
भाषार्थ -
(उक्षान्नाय) वर्षा द्वारा सींचनेवाला आदित्य जिसका अन्न है, उसके लिए, (बशान्नाय) तथा वशा जिसका अन्न है उसके लिए, (सोमपृष्ठाय) उत्पन्न जगत् का जो पृष्ठ अर्थात् आधार है उसके लिए, (वेधसे) जगत् का, या विधियों का विधान करनेवाले के लिए, (वैश्वानर-ज्येष्ठेभ्यः) समग्र नर-नारियों का हित करनेवाला परमेश्वररूप जिनमें ज्येष्ठ है, (तेथ्य: अग्निभ्य:) उन अग्नियों के लिए (एतत्) यह प्राकृतिक तथा आत्महविः (हुतम्, अरस्तु) प्रदत्त हो, अर्पित हो।
टिप्पणी -
[उक्षा= उक्ष सेचने (भ्वादिः), "आदित्याद् जायते वृष्टिः वृष्टेरन्नम्"। वशा="वशेदं सर्वमभवत, देवा मनुष्या असुराः पितर ऋषयः" (अथर्व० १०।१०।२६) अर्थात् यह दृश्यमान जगत् तथा देव, मनुष्य, असुर, पितर और ऋषि "वशा" हैं। अर्थात् उक्षा और दृश्यमान जगत्, तथा देव आदि जिसके अन्त हैं। प्रलयकाल में आदित्य तथा वशोक्त सब परमेश्वराग्नि के अन्नरूप हो जाते हैं। परमेश्वर अन्नाद है, मंत्राभिप्रेत अन्न का अदन करता है। यह सृष्टिकाल में भी हो रहा है, और महाप्रलय काल में भी। परमेश्वर अन्न भी है। उपासक इसके अन्नरस अर्थात् आनन्दरस का पान करते हैं, और यह अन्नाद भी है। यथा "अहमन्नम्, अहमन्नादः" (तैत्ति० उप० वल्ली ३।१०।६)। सोमपृष्ठाय सोम है उत्पन्न जगत् (षु प्रसवे, भ्वादिः, अदादि)। परमेश्वर उत्पन्न जगत् की पीठ है, आधार है। जैसे अश्व की पीठ अश्वारोही का आधार होती है। वैश्वानरज्येष्ठेभ्यः=परमेश्वर है वैश्वानर, सब नर नारियों का हितकारी। सबका हितकारी होने से यह सर्व ज्येष्ठ अग्नि है। अग्नि रूप होकर यह पाप-मल को भस्मीभूत कर देता है और प्रलय में जगत् को भी।]