Sidebar
अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 96/ मन्त्र 1
सूक्त - भृग्वङ्गिरा
देवता - वनस्पतिः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - चिकित्सा सूक्त
या ओष॑धयः॒ सोम॑राज्ञीर्ब॒ह्वीः श॒तवि॑चक्षणाः। बृह॒स्पति॑प्रसूता॒स्ता नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥
स्वर सहित पद पाठया: । ओष॑धय: । सोम॑ऽराज्ञी: । ब॒ह्वी: । श॒तऽवि॑चक्षणा: । बृह॒स्पति॑ऽप्रसूता: । ता: । न॒: । मु॒ञ्च॒न्तु॒ । अंह॑स: ॥९६.१॥
स्वर रहित मन्त्र
या ओषधयः सोमराज्ञीर्बह्वीः शतविचक्षणाः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥
स्वर रहित पद पाठया: । ओषधय: । सोमऽराज्ञी: । बह्वी: । शतऽविचक्षणा: । बृहस्पतिऽप्रसूता: । ता: । न: । मुञ्चन्तु । अंहस: ॥९६.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 96; मन्त्र » 1
भाषार्थ -
(सोमराज्ञीः) सोम-औषधी जिन में राजा है, (वह्वीः) जो बहुत अर्थात् अनेकविध हैं, (शतविचक्षणाः) सौ जिन में विख्यात हैं, (याः) ऐसी जो (ओषधः) ओषधियां (बृहस्पतिप्रसूताः) वेद विद्वान् द्वारा प्रेरित अर्थात् प्रयुक्त की जाती हैं (ता:) वे (नः) हमें (अंहसः) पाप से (मुञ्चन्तु) मुक्त करें।
टिप्पणी -
[शरीर में लगभग सौ [१०७] मर्मस्थल हैं। अतः मर्मस्थलों की दृष्टि से लगभग सौ में ओषधियों को विभक्त किया है। बुहस्पतिप्रसूताः= बृहती वेदवाक्, तस्याः पतिः, तेन प्रसूताः, (प्र + षू प्रेरणे, क्तः)। रोग पैदा होते हैं पापों से, यह वेदमन्तव्य है। पाप से मुक्त हो जाने पर तज्जन्य रोगों से मुक्त हो जाता है]।