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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 96 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 96/ मन्त्र 1
    ऋषिः - भृग्वङ्गिरा देवता - वनस्पतिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - चिकित्सा सूक्त
    74

    या ओष॑धयः॒ सोम॑राज्ञीर्ब॒ह्वीः श॒तवि॑चक्षणाः। बृह॒स्पति॑प्रसूता॒स्ता नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    या: । ओष॑धय: । सोम॑ऽराज्ञी: । ब॒ह्वी: । श॒तऽवि॑चक्षणा: । बृह॒स्पति॑ऽप्रसूता: । ता: । न॒: । मु॒ञ्च॒न्तु॒ । अंह॑स: ॥९६.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    या ओषधयः सोमराज्ञीर्बह्वीः शतविचक्षणाः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    या: । ओषधय: । सोमऽराज्ञी: । बह्वी: । शतऽविचक्षणा: । बृहस्पतिऽप्रसूता: । ता: । न: । मुञ्चन्तु । अंहस: ॥९६.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 96; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    ओषधियों के गुणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (सोमराज्ञीः) बड़े ऐश्वर्यवाले परमेश्वर वा चन्द्रमा वा सोमलता को राजा रखनेवाली, (शतविचक्षणाः) सैकड़ों कथनीय और दर्शनीय शुभ गुणोंवाली और (बृहस्पतिप्रसूताः) बृहस्पतियों बड़े विद्वानों द्वारा काम में लायी गयीं, (बह्वीः) बहुत सी (याः) जो (औषधयः) ताप नाश करनेवाली ओषधि हैं, (ताः) वे (नः) हमको (अंहसः) रोग से (मुञ्चन्तु) मुक्त करें ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य ईश्वररचित ओषधियों का यथावत् परीक्षणपूर्वक सेवन करके स्वस्थ रह कर आनन्द पावें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−म० १०।९७।१८, १५ और यजु० १२।९२, ८९ ॥

    टिप्पणी

    १−(याः) (ओषधयः) अ० १।२३।१। ओष+धेट् पाने−कि। ओषस्य तापस्य पिबन्त्यो नाशयित्र्यः (सोमराज्ञीः) सर्वैश्वर्ययुक्तः परमेश्वरश्चन्द्रः सोमो वा राजा शासको यासां ताः (बह्वीः) बह्व्यः। अनेकविधाः (शतविचक्षणाः) चक्षिङ् व्यक्तायां वाचि दर्शने च−ल्यु। बहुकथनीया दर्शनीयशुभगुणाः (बृहस्पतिप्रसूताः) विद्वद्भिः प्रेरिता विनियुक्ताः (ताः) ओषधयः (नः) अस्मान् (मुञ्चन्तु) मोचयन्तु (अंहसः) रागात् ॥

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    विषय

    सोमराज्ञी', ओषधयः

    पदार्थ

    १. (या:) = जो (सोमराज्ञी:) = सोम ओषधि जिनकी मुखिया है, ऐसी (बही:) = बहुत-सी (शतवि चक्षणा:) = शतवर्षपर्यन्त हमारा ध्यान करनेवाली (ओषधयः) = ओषधियाँ हैं, ऐसी (ता:) = वे ओषधियाँ (बृहस्पतिप्रसूता:) = उस सर्वज्ञ प्रभु से पैदा की गई तथा ज्ञानी वैद्य से प्रयुक्त हुई-हुई (न:) = हमें (अंहसः मुञ्चन्तु) = कष्टों से मुक्त करें।

    भावार्थ

    प्रभु ने संसार में विविध ओषधियों को जन्म दिया है। सोमलता इनमें प्रमुख है। इन ओषधियों का ठीक प्रयोग हमें सब कष्टों से मुक्त करता है।

     

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    भाषार्थ

    (सोमराज्ञीः) सोम-औषधी जिन में राजा है, (वह्वीः) जो बहुत अर्थात् अनेकविध हैं, (शतविचक्षणाः) सौ जिन में विख्यात हैं, (याः) ऐसी जो (ओषधः) ओषधियां (बृहस्पतिप्रसूताः) वेद विद्वान् द्वारा प्रेरित अर्थात् प्रयुक्त की जाती हैं (ता:) वे (नः) हमें (अंहसः) पाप से (मुञ्चन्तु) मुक्त करें।

    टिप्पणी

    [शरीर में लगभग सौ [१०७] मर्मस्थल हैं। अतः मर्मस्थलों की दृष्टि से लगभग सौ में ओषधियों को विभक्त किया है। बुहस्पतिप्रसूताः= बृहती वेदवाक्, तस्याः पतिः, तेन प्रसूताः, (प्र + षू प्रेरणे, क्तः)। रोग पैदा होते हैं पापों से, यह वेदमन्तव्य है। पाप से मुक्त हो जाने पर तज्जन्य रोगों से मुक्त हो जाता है]।

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Herbs and Freedom from

    Meaning

    All the herbs of many forms and profuse growth and hundreds of medicinal efficacies, receiving their power and splendour from the moon, developed and reinforced by sagely scholars of the God-given gift of herbal medicine may, we pray, save us and cure us of all diseases, evil and sin.

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    Subject

    Vanaspatih (herb)

    Translation

    The herbs which are numerous are of a hundred appearances and among whom the Chief is Soma. May those, impelled (prescribed) by the Lord supreme, free us from the malady.

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    Translation

    Let these medicinal herbs and plants which receive their splendor and vigor from the moon, which are many in quality and forms, which possess many curative properties and which are prepared by the man of medical science or which are produced by God, the Lord of speech, deliver us from the diseases.

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    Translation

    The many plants of hundred uses, that Soma rules as King, administered by a learned physician, possessing Vedic knowledge, deliver us from grief and sorrow.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(याः) (ओषधयः) अ० १।२३।१। ओष+धेट् पाने−कि। ओषस्य तापस्य पिबन्त्यो नाशयित्र्यः (सोमराज्ञीः) सर्वैश्वर्ययुक्तः परमेश्वरश्चन्द्रः सोमो वा राजा शासको यासां ताः (बह्वीः) बह्व्यः। अनेकविधाः (शतविचक्षणाः) चक्षिङ् व्यक्तायां वाचि दर्शने च−ल्यु। बहुकथनीया दर्शनीयशुभगुणाः (बृहस्पतिप्रसूताः) विद्वद्भिः प्रेरिता विनियुक्ताः (ताः) ओषधयः (नः) अस्मान् (मुञ्चन्तु) मोचयन्तु (अंहसः) रागात् ॥

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