अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 95/ मन्त्र 3
ऋषिः - भृग्वङ्गिरा
देवता - वनस्पतिः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - कुष्ठौषधि सूक्त
69
गर्भो॑ अ॒स्योष॑धीनां॒ गर्भो॑ हि॒मव॑तामु॒त। गर्भो॒ विश्व॑स्य भू॒तस्ये॒मं मे॑ अग॒दं कृ॑धि ॥
स्वर सहित पद पाठगर्भ॑: । अ॒सि॒ । ओष॑धीनाम् । गर्भ॑: । हि॒मऽव॑ताम् । उ॒त । गर्भ॑: । विश्व॑स्य । भू॒तस्य॑ । इ॒मम् । मे॒ । अ॒ग॒दम् । कृ॒धि॒ ॥९५.३॥
स्वर रहित मन्त्र
गर्भो अस्योषधीनां गर्भो हिमवतामुत। गर्भो विश्वस्य भूतस्येमं मे अगदं कृधि ॥
स्वर रहित पद पाठगर्भ: । असि । ओषधीनाम् । गर्भ: । हिमऽवताम् । उत । गर्भ: । विश्वस्य । भूतस्य । इमम् । मे । अगदम् । कृधि ॥९५.३॥
भाष्य भाग
हिन्दी (5)
विषय
विद्वानों के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
[हे परमेश्वर !] तू (ओषधीनाम्) ताप रखनेवाले [सूर्य आदि] लोकों का (गर्भः) स्तुतियोग्य आधार (उत) और (हिमवताम्) शीतस्पर्शवाली [जल मेघ आदि] का (गर्भः) ग्रहण करनेवाला और (विश्वस्य) सब (भूतस्य) प्राणिसमूह का (गर्भः) आधार (असि) है। (मे) मेरे लिये (इमम्) इस [संसार] को (अगदम्) नीरोग (कृधि) तू कर ॥३॥
भावार्थ
जो मनुष्य परमेश्वर के उत्पन्न पदार्थों का गुण जान कर प्रयोग करते हैं, वे संसार में सुख भोगते हैं ॥३॥ यह मन्त्र कुछ भेद से आ चुका है−अ० २५।५।७ ॥
टिप्पणी
३−(गर्भः) अ० ३।१०।१२। गरणीयः। स्तुत्यः। ग्रहीता। आधारः। (ओषधीनाम्) अ० १।२३।१। ओष+डुधाञ् धारणपोषणायोः−कि। ओषस्य तापस्य धारकाणां सूर्यादिलोकानाम् (हिमवताम्) शीतस्पर्शवतां जलमेघादीनाम् (उत) अपि च (भूतस्य) प्राणिजातस्य (इमम्) दृश्यमानं संसारम् (अगदम्) अ० ४।१७।८। नीरोगम् (कृधि) कुरु। अन्यद् गतम्−अ० ५।२५।७ ॥
विषय
कुष्ठ
पदार्थ
व्याख्या द्रष्टव्य-५.४.३-४।
१. हे अग्ने-परमात्मन्! आप (ओषधीनाम्) = [ओष: धीयते आस] परिपाक जिनमें धारण किया जाता है, उन सब ओषधियों के (गर्भः असि) = गर्भ हो-गर्भ की भाँति उनमें अवस्थित हो। (उत) = और (हिमवताम्) = शीत स्पर्शवाली अन्य वनस्पतियों को भी (गर्भ:) = गर्भ के समान धारण करनेवाले हो। २. आप वस्तुत: (विश्वस्य) = सारे (भूतस्य) = प्राणिसमूह के व ब्राह्माण्ड के अन्दर (गर्भ:) = गर्भवत् अवस्थित हो। ऐसे आप (मे) = मेरे (इमम्) = इस व्यक्ति को (अगदं कृधि) = नीरोग कीजिए। आप इसके अन्दर भी उसी प्रकार अवस्थित हुए इसे नीरोग करनेवाले होओ।
भावार्थ
प्रभु आग्नेय व सौम्य पदार्थों में गर्भवत् स्थित हैं। हमारे अन्दर भी स्थित होते हुए प्रभु हमें नीरोग करें।
पदार्थ
शब्दार्थ = हे परमेश्वर ! आप ( ओषधीनाम् ) = ताप रखनेवाले सूर्यादि लोकों का ( गर्भ: ) = स्तुति योग्य आश्रय ( उत ) = और ( हिमवताम् ) = शीत स्पर्शवाले जल मेघादि का ( गर्भ: ) = ग्रहण करनेवाले ( विश्वस्य भूतस्य ) = सब प्राणी समूह का ( गर्भ: ) = आधार ( असि ) = हैं ( मे ) = मेरे लिए ( इमम् ) = सब संसार को ( अगदम् ) = नीरोग ( कृधि ) = कर दो ।
भावार्थ
भावार्थ = जो मनुष्य परमेश्वर से उत्पन्न हुए पदार्थों का गुण जान कर प्रयोग करते हैं वे संसार में सुख भोगते हैं। इसलिए हम सबको चाहिए कि सूर्यादि उष्ण और जल, मेघ आदि शीत पदार्थों के आश्रय परमात्मा की भक्ति करते और ईश्वर रचित पदार्थों से अपना काम लेते हुए सुख को भोगें ।
भाषार्थ
(ओषधीनाम्) ओषधियों का (गर्भः१) गर्भरूप (असि) तू है, (उत) तथा (हिमवताम्) हिम प्रदेशों वाले औषधों का (गर्भः) गर्भरूप है। (विश्वस्य भूतस्य) समग्र प्राणियों का (गर्भः) गर्भरूप है, (मे) मेरे (इमम्) इस रोगी को (अगदम्) रोगरहित (कृधि) तू कर।
टिप्पणी
[प्रकरण की दृष्टि से कुष्ठ-ओषध का वर्णन प्रतीत होता है।] [१. जैसे गर्भस्थ शिशु, माता के गर्भ से, पोषण तथा गुण ग्रहण करता है, वैसे कुष्ठ में मानो सब औषधों की पूष्टियां तथा गुण विद्यमान हैं।]
विषय
कुष्ठ औषधि और सर्वव्यापक परमात्मा का वर्णन।
भावार्थ
हे अग्ने ! परमात्मन् ! तू (ओषधीनां) ओष = ताप, परिपाक शक्ति को धारण करनेवाले लोकों का (गर्भः) उत्पत्तिस्थान (उत) और (हिमवताम्) हिमवाले अतिशीत लोकों का भी (गर्भम्) उत्पत्ति स्थान है। (विश्वस्य भूतस्य) और तू तो समस्त उत्पन्न विश्व का (गर्भः) उत्पत्ति स्थान हैं, तू (मे) मेरे (इमम्) इस आत्मा को (अगदम्) गद = रोग, जरा, जन्म, मरण आदि भव-बाधाओं से रहित (कृधि) कर।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भृग्वङ्गिरा ऋषिः। वनस्पतिर्मन्त्रोक्ता च देवता। अनुष्टुभः। तृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Kushtha
Meaning
O Kushtha, you are the essence of herbs. You are the essence of mountain snows. You are the essence and life of all objects of nature. Pray cure this patient of leprosy and make him hale and hearty.
Translation
You are the womb of herbs, O kustha, a child of the snowy mountains, the youngest of all existence. May you be gracious enough to make this man free from disease for me. (cf.Av. .V.25.7)
Translation
This Kustha is the store of medicinal properties, this is the store of the medicinal substances of cold Properties, and it is the store of other curative qualities and let it make my man free from diseases.
Translation
O God, Thou art the Creator of the plants, the Maker of the snowy hills: the Bringer to life of everything that exists. Free this my soul from sin and the pangs of birth and death.
Footnote
See Atharva, 5-25-7.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
३−(गर्भः) अ० ३।१०।१२। गरणीयः। स्तुत्यः। ग्रहीता। आधारः। (ओषधीनाम्) अ० १।२३।१। ओष+डुधाञ् धारणपोषणायोः−कि। ओषस्य तापस्य धारकाणां सूर्यादिलोकानाम् (हिमवताम्) शीतस्पर्शवतां जलमेघादीनाम् (उत) अपि च (भूतस्य) प्राणिजातस्य (इमम्) दृश्यमानं संसारम् (अगदम्) अ० ४।१७।८। नीरोगम् (कृधि) कुरु। अन्यद् गतम्−अ० ५।२५।७ ॥
बंगाली (1)
পদার্থ
গর্ভো অস্যোষধীনাং গর্ভো হিমবতামুত।
গর্ভো বিশ্বস্য ভূতস্যেমং মে অগদং কৃধি ।।৬৪।।
(অথর্ব ৬।৯৫।৩)
পদার্থঃ হে পরমেশ্বর! তুমি (ওষধীনাম্) তাপ প্রদানকারী সূর্য প্রভৃতি লোক সমূহের (গর্ভঃ) আধার (উত) এবং (হিমবতাম্) শীতলতা প্রদানকারী জল-মেঘ প্রভৃতিরও (গর্ভঃ) আধার স্বরূপ। তুমি (বিশ্বস্য) সমগ্র বিশ্বের (ভূতস্য) সকল প্রাণীদের (গর্ভঃ অসি) আধার স্বরূপ। হে পরমাত্মা! (মে) আমার জন্য (ইমম্) এই সংসারকে (অগদম্) নীরোগ (কৃধি) করে দাও।
ভাবার্থ
ভাবার্থঃ যে মানুষ পরমেশ্বরের সৃষ্ট পদার্থ সমূহের গুণ অবগত হয়ে তা নিজের জীবনে প্রয়োগ করেন, তিনিই এই সংসারে সুখ ভোগ করে ।।৬৪।।
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal & Sri Ashish Joshi
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
Sri Amit Upadhyay
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal