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अथर्ववेद के काण्ड - 6 के सूक्त 95 के मन्त्र

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  • अथर्ववेद - काण्ड 6/ सूक्त 95/ मन्त्र 1
    ऋषि: - भृग्वङ्गिरा देवता - वनस्पतिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - कुष्ठौषधि सूक्त
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    अ॑श्व॒त्थो दे॑व॒सद॑नस्तृ॒तीय॑स्यामि॒तो दि॒वि। तत्रा॒मृत॑स्य॒ चक्ष॑णं दे॒वाः कुष्ठ॑मवन्वत ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒श्व॒त्थ: । दे॒व॒ऽसद॑न: । तृ॒तीय॑स्याम् । इ॒त: । दि॒वि । तत्र॑ । अ॒मृत॑स्य । चक्ष॑णम् । दे॒वा: । कुष्ठ॑म् । अ॒व॒न्व॒त॒ ॥९५.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अश्वत्थो देवसदनस्तृतीयस्यामितो दिवि। तत्रामृतस्य चक्षणं देवाः कुष्ठमवन्वत ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अश्वत्थ: । देवऽसदन: । तृतीयस्याम् । इत: । दिवि । तत्र । अमृतस्य । चक्षणम् । देवा: । कुष्ठम् । अवन्वत ॥९५.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 6; सूक्त » 95; मन्त्र » 1
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    पदार्थ -
    (देवसदनः) विद्वानों के बैठने योग्य (अश्वत्थः) वीरों के ठहरने का देश [अधिकार] (तृतीयस्याम्) तीसरी [निकृष्ट और मध्यम अवस्था से परे, श्रेष्ठ] (दिवि) गति में (इतः) प्राप्त होता है। (तत्र) उसमें (अमृतस्य) अमृत [पूर्ण सुख] के (चक्षणम्) दर्शन (कुष्ठम्) गुणपरीक्षक पुरुष को (देवाः) महात्माओं ने (अवन्वत) मांगा है ॥१॥

    भावार्थ - विद्वान् लोग इस ईश्वरनियम को निश्चय करके मानते हैं कि अति विद्वान् पुरुषार्थी मनुष्य उच्च अधिकार के योग्य होता है ॥१॥ (अश्वत्थः) पीपल के वृक्ष को भी कहते हैं, इसका गुण−अ० ३।६।१। में वर्णन हो चुका है। (कुष्ठ) कूट ओषधि विशेष भी है, देखो−अ० ५।४।१ ॥


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    Meaning -
    High up in the third region from here, in heaven, there is the Ashvattha tree, seat of divinities. Thereon shines the light of immortality, and there from the light, the divines obtained the Kushtha herb.


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