Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1388
ऋषिः - प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
6
स꣢ वी꣣रो꣡ द꣢क्ष꣣सा꣡ध꣢नो꣣ वि꣢꣫ यस्त꣣स्त꣢म्भ꣣ रो꣡द꣢सी । ह꣡रिः꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अव्यत वे꣣धा꣡ न योनि꣢꣯मा꣣स꣡द꣢म् ॥१३८८॥
स्वर सहित पद पाठसः । वी꣣रः꣢ । द꣣क्षसा꣡ध꣢नः । द꣣क्ष । सा꣡ध꣢꣯नः । वि । यः । त꣣स्त꣡म्भ꣢ । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । ह꣡रिः꣢꣯ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣣व्यत । वेधाः꣢ । न । यो꣡नि꣢꣯म् । आ꣣स꣡द꣢म् । आ꣣ । स꣡द꣢꣯म् ॥१३८८॥
स्वर रहित मन्त्र
स वीरो दक्षसाधनो वि यस्तस्तम्भ रोदसी । हरिः पवित्रे अव्यत वेधा न योनिमासदम् ॥१३८८॥
स्वर रहित पद पाठ
सः । वीरः । दक्षसाधनः । दक्ष । साधनः । वि । यः । तस्तम्भ । रोदसीइति । हरिः । पवित्रे । अव्यत । वेधाः । न । योनिम् । आसदम् । आ । सदम् ॥१३८८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1388
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
Acknowledgment
विषय - अगले मन्त्र में परमेश्वर का महत्त्व वर्णित है ॥
पदार्थ -
(सः) वह (वीरः) काम, क्रोध आदि शत्रुओं को कम्पायमान करनेवाला वीर सोम परमेश्वर (दक्षसाधनः) बल का साधक है, (यः) जो (रोदसी) द्युलोक और भूलोक को (तस्तम्भ) थामे हुए है। (वेधाः न) सूर्य के समान वह (हरिः) पापहर्ता परमेश्वर (योनिम्) आत्मा-रूप घर में (आसदम्) बैठने के लिए (पवित्रे) पवित्र अन्तःकरण में (अव्यत) आता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थ - जो बलवान् जगदीश्वर सब संसार को धारण करता है, उसकी उपासना से सीमित शक्तिवाला भी मनुष्य महान् शक्तिवाला और शत्रुओं को हराने में समर्थ हो जाता है ॥३॥
इस भाष्य को एडिट करें