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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1561
ऋषिः - गोतमो राहूगणः
देवता - अग्निः
छन्दः - उष्णिक्
स्वरः - ऋषभः
काण्ड नाम -
5
अ꣢ग्ने꣣ वा꣡ज꣢स्य꣣ गो꣡म꣢त꣣ ई꣡शा꣢नः सहसो यहो । अ꣣स्मे꣡ दे꣢हि जातवेदो꣣ म꣢हि꣣ श्र꣡वः꣢ ॥१५६१॥
स्वर सहित पद पाठअ꣡ग्ने꣢꣯ । वा꣡ज꣢꣯स्य । गो꣡म꣢꣯तः । ई꣡शा꣢꣯नः । स꣣हसः । यहो । अस्मे꣡इति꣢ । दे꣣हि । जातवेदः । जात । वेदः । म꣡हि꣢꣯ । श्र꣡वः꣢꣯ ॥१५६१॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो । अस्मे देहि जातवेदो महि श्रवः ॥१५६१॥
स्वर रहित पद पाठ
अग्ने । वाजस्य । गोमतः । ईशानः । सहसः । यहो । अस्मेइति । देहि । जातवेदः । जात । वेदः । महि । श्रवः ॥१५६१॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1561
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 15; खण्ड » 3; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 15; खण्ड » 3; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
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विषय - प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ९९ क्रमाङ्क पर परमात्मा, विद्वान् और राजा को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ आचार्य से प्रार्थना करते हैं ॥
पदार्थ -
हे (अग्ने) छात्रों को उन्नत करनेवाले विद्वान् आचार्यवर ! हे (सहसः यहो) आत्मबल के पुत्र अर्थात् अतिशय आत्मबल से युक्त ! हे (जातवेदः) उत्पन्न पदार्थों के ज्ञाता ! (गोमतः वाजस्य) वेदवाणी से युक्त ऐश्वर्य के (ईशानः) अधीश्वर आप (अस्मे) हमारे लिए (महि श्रवः) महान् शास्त्रज्ञान और उससे उत्पन्न यश (देहि) प्रदान करो ॥१॥
भावार्थ - आचार्य के पास से विविध विद्याओं का ज्ञान पाकर शिष्य विद्वान् और कीर्तिमान् बनें ॥१॥
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