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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 941
ऋषिः - अग्निश्चाक्षुषः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - उष्णिक् स्वरः - ऋषभः काण्ड नाम -
3

धी꣣भि꣡र्मृ꣢जन्ति वा꣣जि꣢नं꣣ व꣢ने꣣ क्री꣡ड꣢न्त꣣म꣡त्य꣢विम् । अ꣣भि꣡ त्रि꣢पृ꣣ष्ठं꣢ म꣣त꣢यः꣣ स꣡म꣢स्वरन् ॥९४१॥

स्वर सहित पद पाठ

धी꣣भिः꣢ । मृ꣣जन्ति । वाजि꣡न꣢म् । व꣡ने꣢꣯ । क्री꣡ड꣢꣯न्तम् । अ꣡त्य꣢꣯विम् । अ꣡ति꣢꣯ । अ꣣विम् । अभि꣢ । त्रि꣣पृष्ठ꣢म् । त्रि꣣ । पृष्ठ꣢म् । म꣣त꣡यः꣢ । सम् । अ꣣स्वरन् ॥९४१॥


स्वर रहित मन्त्र

धीभिर्मृजन्ति वाजिनं वने क्रीडन्तमत्यविम् । अभि त्रिपृष्ठं मतयः समस्वरन् ॥९४१॥


स्वर रहित पद पाठ

धीभिः । मृजन्ति । वाजिनम् । वने । क्रीडन्तम् । अत्यविम् । अति । अविम् । अभि । त्रिपृष्ठम् । त्रि । पृष्ठम् । मतयः । सम् । अस्वरन् ॥९४१॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 941
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 18; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 6; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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पदार्थ -
उपासक लोग (वाजिनम्) बलवान्, (वने क्रीडन्तम्) ब्रह्माण्डरूप वन में क्रीडा करते हुए, (अत्यविम्) अबुद्धिगम्य उस पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्ता परमात्मा को (धीभिः) ध्यानवृत्तियों से (मृजन्ति) अपने अन्तरात्मा में अलङ्कृत करते हैं। वे (मतयः)मननशील उपासक (त्रिपृष्ठम्) पृथिवी-अन्तरिक्ष-द्यौरूप अथवा आत्मा-मन-प्राणरूप तीन स्तरों में निवास करनेवाले उस परमात्मा को (अभि) लक्ष्य करके (समस्वरन्) मिलकर स्तुतिगीत गाते हैं ॥२॥

भावार्थ - जो परमेश्वर जड़-चेतन से परिपूर्ण ब्रह्माण्डरूप वन को रचकर उसमें क्रीडा करता हुआ जगत् का सञ्चालन कर रहा है, उस सर्वान्तर्यामी को अपने आत्मा का अलङ्कार बनाकर योगी जन जब उसका ध्यान करते हैं तब वे सब सिद्धियाँ पा लेते हैं ॥२॥

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