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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1038
ऋषिः - मेधातिथिः काण्वः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
आ꣡ व꣢च्यस्व꣣ म꣢हि꣣ प्स꣢रो꣣ वृ꣡षे꣢न्दो द्यु꣣म्न꣡व꣢त्तमः । आ꣡ योनिं꣢꣯ धर्ण꣣सिः꣡ स꣢दः ॥१०३८॥
स्वर सहित पद पाठआ । व꣣च्यस्व । म꣡हि꣢꣯ । प्स꣡रः꣢꣯ । वृ꣡षा꣢꣯ । इ꣣न्दो । द्युम्न꣡व꣢त्तमः । आ । यो꣡नि꣢꣯म् । ध꣣र्णसिः꣢ । स꣣दः ॥१०३८॥
स्वर रहित मन्त्र
आ वच्यस्व महि प्सरो वृषेन्दो द्युम्नवत्तमः । आ योनिं धर्णसिः सदः ॥१०३८॥
स्वर रहित पद पाठ
आ । वच्यस्व । महि । प्सरः । वृषा । इन्दो । द्युम्नवत्तमः । आ । योनिम् । धर्णसिः । सदः ॥१०३८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1038
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 7; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
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विषय - ब्राह्म स्थिति
पदार्थ -
हे (इन्दो) = ज्ञानरूप परमैश्वर्य को प्राप्त करनेवाले मेधातिथे ! तू (महिप्सर:) = प्रभु के महनीय रूप का (आवच्यस्व) = निरन्तर कथन कर । प्रभु के स्वरूप का चिन्तन व कीर्तन कर | (वृषा) = शक्तिशाली बन, ३. (द्युम्नवत्तमः) = अधिक-से-अधिक ज्योतिवाला होने का प्रयत्न कर, ४. (धर्णसिः) = धारण करनेवाला— लोगों का हित करनेवाला बनकर तू (योनिम्) = अपने मूल निवासस्थान प्रभु में (आसद:) = आसीन होता है।
भावार्थ -
ब्रह्म में स्थित होने के लिए आवश्यक है कि – १. हम प्रभु के महनीय रूप का कथन करें, २. शक्तिशाली बनें, ३. उत्तम ज्ञान प्राप्त करें, ४. लोगों का धारण करनेवाले बनें ।
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