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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1174
ऋषिः - अत्रिर्भौमः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
4
य꣡त्ते꣢ दि꣣क्षु꣢ प्र꣣रा꣢ध्यं꣣ म꣢नो꣣ अ꣡स्ति꣢ श्रु꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् । ते꣡न꣢ दृ꣣ढा꣡ चि꣢दद्रिव꣣ आ꣡ वाजं꣢꣯ दर्षि सा꣣त꣡ये꣢ ॥११७४॥
स्वर सहित पद पाठयत् । ते꣣ । दिक्षु꣢ । प्र꣣रा꣡ध्य꣢म् । प्र꣣ । रा꣡ध्य꣢꣯म् । म꣡नः꣢꣯ । अ꣡स्ति꣢꣯ । श्रु꣣त꣢म् । बृ꣣ह꣢त् । ते꣡न꣢꣯ । दृ꣣ढा꣢ । चि꣣त् । अद्रिवः । अ । द्रिवः । आ꣢ । वा꣡ज꣢꣯म् । द꣣र्षि । सात꣡ये꣢ ॥११७४॥
स्वर रहित मन्त्र
यत्ते दिक्षु प्रराध्यं मनो अस्ति श्रुतं बृहत् । तेन दृढा चिदद्रिव आ वाजं दर्षि सातये ॥११७४॥
स्वर रहित पद पाठ
यत् । ते । दिक्षु । प्रराध्यम् । प्र । राध्यम् । मनः । अस्ति । श्रुतम् । बृहत् । तेन । दृढा । चित् । अद्रिवः । अ । द्रिवः । आ । वाजम् । दर्षि । सातये ॥११७४॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1174
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 14; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 6; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 14; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 6; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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विषय - प्रभु का मननीय ज्ञान
पदार्थ -
हे (अद्रिवः) = सर्व अनिष्टों का विदारण करनेवाले प्रभो ! (यत्) = जो (ते) = आपका (दिक्षु) = सब दिशाओं
में, अर्थात् सर्वत्र व्याप्त प्(रराध्यम्) = प्रकृष्ट सफलता देनेवाला (मन:) = मननीय बृहत् वृद्धि का कारणभूत श्(रुतम्) = ज्ञान (अस्ति) = है; तेन उस ज्ञान के द्वारा (दृढाचित्) = अत्यन्त प्रबल भी (वाजम्) = [वज गतौ, roam about=भ्रान्ति] भ्रान्ति को - संसार में इतस्ततः भटकने की वृत्ति को (आदर्षि) = विदीर्ण कर दीजिए, जिससे (सातये) = हम आपका सम्भजन कर सकें । प्रभु-प्राप्ति तभी होती है जब मनुष्य संसार में इधर-उधर भटकना छोड़, एकाग्रवृत्ति होकर प्रभु का ध्यान करे । इधर-उधर भटकना तब समाप्त होगा जब वह अपने अज्ञान को समाप्त कर लेगा । इस अज्ञान का नाश तब होगा जब हम वेदज्ञान को अपनाएँगे । यह वेदज्ञान मननीय है, हमारी वृद्धि का कारण है, हमें सफल बनानेवाला है [प्रराध्यम्] । इस ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानान्धकार के निवृत्त होने पर यह प्रभुभक्त 'भौम' भूमि का ईश्वर बनता है, इन भौतिक पदार्थों का दास नहीं रहता । ऐसा बनने पर ही यह 'अत्रि' होता है—इसके तीनों दु:ख दूर हो जाते हैं । यह आध्यात्मिक, आधिभौतिक व आधिदैविक शान्ति प्राप्त करता है।
भावार्थ -
हम प्रभु के मननीय वेदज्ञान द्वारा अज्ञानजनित भ्रान्ति से ऊपर उठें और प्रभु को प्राप्त करनेवाले हों ।
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