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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1175
ऋषिः - प्रतर्दनो दैवोदासिः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
काण्ड नाम -
4
शि꣡शुं꣢ जज्ञा꣣न꣡ꣳ ह꣢र्य꣣तं꣡ मृ꣢जन्ति शु꣣म्भ꣢न्ति꣣ वि꣡प्रं꣢ म꣣रु꣡तो꣢ ग꣣णे꣡न꣢ । क꣣वि꣢र्गी꣣र्भिः꣡ काव्ये꣢꣯ना क꣣विः꣡ सन्त्सोमः꣢꣯ प꣣वि꣢त्र꣣म꣡त्ये꣢ति꣣ रे꣡भ꣢न् ॥११७५॥
स्वर सहित पद पाठशि꣡शु꣢꣯म् । ज꣣ज्ञान꣢म् । ह꣣र्यत꣢म् । मृ꣣जन्ति । शुम्भ꣡न्ति꣢ । वि꣡प्र꣢꣯म् । वि । प्र꣣म् । मरु꣡तः꣢ । ग꣣णे꣡न꣢ । क꣣विः꣢ । गी꣣र्भिः꣢ । का꣡व्ये꣢꣯न । क꣣विः꣢ । सन् । सो꣡मः꣢꣯ । प꣣वि꣡त्र꣢म् । अ꣡ति꣢꣯ । ए꣣ति । रे꣡भ꣢꣯न् ॥११७५॥
स्वर रहित मन्त्र
शिशुं जज्ञानꣳ हर्यतं मृजन्ति शुम्भन्ति विप्रं मरुतो गणेन । कविर्गीर्भिः काव्येना कविः सन्त्सोमः पवित्रमत्येति रेभन् ॥११७५॥
स्वर रहित पद पाठ
शिशुम् । जज्ञानम् । हर्यतम् । मृजन्ति । शुम्भन्ति । विप्रम् । वि । प्रम् । मरुतः । गणेन । कविः । गीर्भिः । काव्येन । कविः । सन् । सोमः । पवित्रम् । अति । एति । रेभन् ॥११७५॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1175
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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विषय - प्रभु की प्राप्ति
पदार्थ -
(मरुतः) = [मरुतः=प्राणाः] प्राणसाधना करके प्राणों के पुञ्ज बने हुए विद्वान् लोग (गणेन) = [गण संख्याने] उस प्रभु के संख्यान व चिन्तन के द्वारा (सोमम्) = अपनी सोम शक्ति को (मृजन्ति) = शुद्ध करते हैं—उसके अन्दर वासना-जन्य उबाल नहीं आने देते। इस सोमरक्षण के द्वारा अपने जीवन को (शुम्भन्ति) = [शोभयन्ति] अलंकृत करते हैं । यह सोम कैसा है ? १. (शिशुम्) = [ शो तनूकरणे] यह बुद्धियों को सूक्ष्म बनानेवाला २. (जज्ञानम्) = यह हमारा सर्वतोमुखी विकास–प्रादुर्भाव करनेवाला है, ३. (हर्यतम्) = [हर्य गतिकान्त्योः] यह हमारे जीवनों को गतिमय बनानेवाला है, अतएव चाहने योग्य है तथा ४. (विप्रम्) = विशेषरूप से हमारा पूरण करनेवाला है— न्यूनताओं को दूर करके पूर्णता प्राप्त कराता है।
इस सोम की रक्षा करनेवाला पुरुष १. (कविः) = क्रान्तदर्शी बनता है— सूक्ष्म-दृष्टिवाला बनकर वस्तुतत्त्व को देखनेवाला होता है । २. (गीर्भिः) = वेदवाणियों के द्वारा तथा (काव्येन) = कवित्व के द्वारा (कविः) =[कौति सर्वा विद्याः] सब ज्ञानों का उपदेष्टा (सन्) = होता हुआ यह (सोमः) = शान्तस्वभाव पुरुष (रेभन्) = प्रभु-नाम का जप करता हुआ (पवित्रम्) = उस पवित्र करनेवाले प्रभु को (अति) = अतिशयेन (एति) = प्राप्त होता है। बड़े पूजित प्रकार से यह प्रभु की ओर जाता है । यह दैवोदासि = प्रभु का दास बनता है और वासनाओं का संहार करनेवाला होने से 'प्रतर्दन' बन जाता है ।
भावार्थ -
सोमरक्षा द्वारा हम सोम-प्रभु के प्रिय बनें ।
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