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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1357
ऋषिः - पराशरः शाक्त्यः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
काण्ड नाम -
2
आ꣡ जागृ꣢꣯वि꣣र्वि꣡प्र꣢ ऋ꣣तं꣢ म꣢ती꣣ना꣡ꣳ सोमः꣢꣯ पुना꣣नो꣡ अ꣢सदच्च꣣मू꣡षु꣢ । स꣡प꣢न्ति꣣ यं꣡ मि꣢थु꣣ना꣢सो꣣ नि꣡का꣢मा अध्व꣣र्य꣡वो꣢ रथि꣣रा꣡सः꣢ सु꣣ह꣡स्ताः꣢ ॥१३५७॥
स्वर सहित पद पाठआ꣢ । जा꣡गृ꣢꣯विः । वि꣡प्रः꣢꣯ । वि । प्रः꣣ । ऋत꣢म् । म꣣तीना꣢म् । सो꣡मः꣢꣯ । पु꣣नानः꣢ । अ꣣सदत् । चमू꣡षु꣢ । स꣡प꣢꣯न्ति । यम् । मि꣣थुना꣡सः꣢ । नि꣡का꣢꣯माः । नि । का꣣माः । अध्वर्य꣡वः꣢ । र꣣थिरा꣡सः꣢ । सु꣣ह꣡स्ताः꣢ । सु꣣ । ह꣡स्ताः꣢꣯ ॥१३५७॥
स्वर रहित मन्त्र
आ जागृविर्विप्र ऋतं मतीनाꣳ सोमः पुनानो असदच्चमूषु । सपन्ति यं मिथुनासो निकामा अध्वर्यवो रथिरासः सुहस्ताः ॥१३५७॥
स्वर रहित पद पाठ
आ । जागृविः । विप्रः । वि । प्रः । ऋतम् । मतीनाम् । सोमः । पुनानः । असदत् । चमूषु । सपन्ति । यम् । मिथुनासः । निकामाः । नि । कामाः । अध्वर्यवः । रथिरासः । सुहस्ताः । सु । हस्ताः ॥१३५७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1357
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 11; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 11; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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विषय - सर्वव्यापक सोम का 'सवन'
पदार्थ -
१. (आजागृविः) = चारों ओर जागरणशील, अर्थात् सर्वत्र सावधान, सबका सदा ध्यान करनेवाले प्रभु हैं। उनसे कोई बात छिपी नहीं, कोई बात अज्ञात नहीं । २. (मतीनाम्) = मननशील पुरुषों के अन्दर (ऋत) = सत्य ज्ञान को (विप्रः) = विशेषरूप से पूरण करनेवाले हैं | हृदयस्थ रूप से वे प्रभु सदा सत्य ज्ञान दे रहे हैं । ३. (पुनानः) = इस ज्ञान के द्वारा वे प्रभु उनके जीवनों को पवित्र बना रहे हैं पवित्रता के लिए एकमात्र साधन ज्ञान ही है । ज्ञान वह अग्नि है, जिसमें सब मलिनताएँ भस्म हो जाती हैं। ४. (सोमः) = यह अत्यन्त शान्त प्रभु (चमूषु) = द्युलोक व पृथिवीलोक में, अर्थात् तदन्तर्गत प्राणिमात्र में और पदार्थमात्र में (असदत्) = रह रहे हैं, विराजमान हैं। कोई भी स्थल प्रभु की व्याप्ति से शून्य नहीं ।
ये प्रभु वे हैं—(यम्) = जिनको १. (मिथुनास:) = दम्पती - पति-पत्नी क्या पुरुष और क्या स्त्री सभी (सपन्ति) = पूजते [worship] हैं, २. (निकामा:) = विभिन्न कामनावाले पुरुष (यम्) = जिसके (सपन्ति) = सम्पर्क [contect] में आते हैं, भिन्न-भिन्न कामनाओं से पुरुष उस प्रभु को भजते हैं। प्रभु भी उसी प्रकार उसकी कामना को पूर्ण करते हैं, ३. (यम्) = जिस प्रभु को (अध्वर्यवः) = हिंसा से शून्य जीवनवाले (सपन्ति) = प्राप्त [obtain] करते हैं। पूर्ण अहिंसामय जीवन ही प्रभु-प्राप्ति का मुख्य साधन है, ४. (यम्) = जिस प्रभु को (रथिरासः) = उत्तम रथोंवाले (सपन्ति) = अन्त में छूते [touch] हैं । यह शरीररूप रथ प्रभु-प्राप्ति के लिए ही दिया गया है, इसे रथिर व्यक्ति ही यात्रा पूर्ण करके छूनेवाले होते हैं, ५. (यम्) = जिस प्रभु की (सुहस्ताः) = उत्तम हाथोंवाले– हाथों से उत्तम कर्म करनेवाले ही (सपन्ति) = [ to obey, to perform] आज्ञाओं का पालन करते हुए तदाज्ञानुसार कर्म करते हैं । प्रभु ने यही तो आज्ञा दी थी कि 'कर्मणे हस्तौ विसृष्टौ'- कर्म के लिए तुझे ये हाथ दिये गये हैं, अत: कर्म करते हुए सुहस्त उसके आदेश का पालन कर ही रहा है।
इस प्रकार प्रभु के सम्पर्क में आनेवाले ये व्यक्ति 'पराशर ' हैं – शत्रुओं को सुदूर शीर्ण करनेवाले हैं तथा ‘शाक्त्य’=शक्ति के पुतले होते हैं ।
भावार्थ -
—हम उस सर्वव्यापक सोम का ‘सवन' [पूजन] करनेवाले बनें ।
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